Sat. Apr 4th, 2020

कोरोनाः अस्पतालों में ग्लव्स-मास्क की कमी की बात मत कीजिए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है सरकार अच्छा काम कर रही है, तो बजाइये ताली

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उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को यह प्रमाणपत्र (सर्टिफिकेट) जारी कर दिया है कि कोरोना के खिलाफ सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है। इसका अर्थ यह है कि इसके बाद यदि देश में कोरोना का कहर तीसरे स्टेज में पहुंचता है और बड़े पैमाने पर लोग काल के गाल में समाते हैं तो यह लोगों की गलती मानी जाएगी सरकार की नहीं। भले ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा कोरोना वायरस संकट के मद्देनजर जारी आंकड़ों के अनुसार देश में 84,000 लोगों पर एक आइसोलेशन बेड और 36,000 लोगों पर एक क्वारंटाइन बेड हो।

प्रति 11,600 भारतीयों पर एक डॉक्टर और 1,826 भारतीयों के लिए अस्पताल में एक ही बेड हो। भले ही यूपी सहित अधिकांश राज्यों में सरकार की तरफ से डॉक्टरों को न ग्लब्स दिए गए हों न मास्क दिए गए हों, एक थर्मामीटर पकड़ा कर उनकी टीम को कोरोना की रोकथाम की ड्यूटी में लगा दिया गया हो। भले ही देश के सबसे बड़े राज्य यूपी और राज्यों के सभी जिलों में कोरोना टेस्ट की कोई सुविधा न हो मगर जब उच्चतम न्यायालय कह रहा है तो देश में कोरोना के खिलाफ सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है।

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कोरोना वायरस के प्रकोप से बचने के लिए सरकार को दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध करने वाली जनहित याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने कोई आदेश देने से इनकार कर दिया। सोमवार को चीफ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की पीठ ने कोरोना के खिलाफ सरकार की कोशिशों की तारीफ की। पीठ ने कहा कि सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है। उसके आलोचक तक यही कह रहे हैं। उन्हें काम करने दीजिए।

चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें बताया गया है कि सरकार इस मुद्दे पर काफी सक्रिय है और इस मामले में कई ठोस कदम उठाए गए हैं। हर आदमी कह रहा है कि सरकार पूरी जिम्मेदारी से अच्छा काम कर रही है। सरकार को काम करने दें। इसके साथ ही अदालत ने याचिका को सरकार को सौंप दिया और विचार करने को कहा।

भारत के पड़ोसी देश चीन में कोरोना पोज़िटिव के मामले दिसम्बर 2019 में ही सामने आए थे। भारत में आधिकारिक तौर पर कोरोना पोज़िटिव पाए जाने का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में पाया गया था। भारत सरकार के प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो के ज़रिये यह मामला प्रकाश में आया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसकी पहचान सात जनवरी को कर दी थी, जबकि चीन ने 11 जनवरी के दिन अपने यहां पहली मौत की जानकारी दी थी, लेकिन तब सरकार दुनिया के सर्वशक्तिमान अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की फरवरी के अंतिम सप्ताह में होने वाली अश्वमेध यात्रा की तयारियों में पूरी निष्ठा से तल्लीन थी।

फिर मध्य प्रदेश में कांग्रेस में दलबदल कराकर आपरेशन विभीषण (शिवराज ने कहा है) में भी सरकारी मशीनरी लगी थी। इसलिए कोरोना की भयावहता को नजरअंदाज किया गया या सरकार यह सोच रही थी कि यह चीन में है यहां नहीं आएगा, क्योंकि गाय गोबर और गोमूत्र से पूरा देश पहले से ही सैनिटाइज है। 

देश के शासक यह मान कर चल रहे थे कि यह एक चीनी वायरस है और यह उनका घरेलू मामला है। जब कोरोना का संक्रमण आक्रामक तौर पर यूरोप में फैलने लगा तब भी भारत में व्यवस्था सीएए और एनपीआर की बहस में मशगूल थी और भाजपा की राज्य सरकारें देशद्रोह का मुकदमा और वसूली नोटिसें जारी कर रही थीं। फरवरी के अंत तक तो दिल्ली में नफरत और हिंसा को ही भड़काया जा रहा था।

देश में जबसे इसके लक्षण दिखने शुरू हुए थे, तब से लेकर लगभग एक माह  का समय हो रहा है, लेकिन इसके व्यापक फैलाव के रोकथाम को लेकर सावधानी बरतने के कोई उपाय नहीं किए गए और अपर्याप्त चिकित्सा सुविधा को लेकर कोई एहतियाती कदम नहीं उठाए गए।

देश में अचानक होली के बाद मोदी सरकार की तंद्रा टूटी और कोरोना से निपटने के लिए एक के बाद एक कदम उठाने की घोषणाएं की जाने लगीं और प्रधानमंत्री ने अचानक 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का एलान कर दिया। दूसरी और कोरोना के डर से उच्च न्यायपालिका पहले ही मैदान छोड़कर भागने लगी, नतीजतन पूरे देश में कोरोना से डर का ऐसा माहौल बनने लगा कि यदि तीसरा स्टेज आया तो कोरोना वायरस का कहर बड़े पैमाने पर टूटेगा और इससे हजारों, लाखों को जान से हाथ धोना पड़ सकता है।

इसके बाद एक संदेश सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगा कि भारतीय सेना सामूहिक अंतिम संस्कारों को करने की ट्रेनिंग ले रही है। हालांकि सेना ने इसे फर्जी बताते हुए सिरे से खारिज किया है।

पिछले कुछ हफ्तों से, ये आशंका जताई जा रही है कि कोरोना वायरस देश में थर्ड स्टेज पर पहुंच जाएगा, जिसका अर्थ है सामुदायिक संक्रमण, यानी आम जनजीवन के बीच जाने-अनजाने इस संक्रमण का फैलना। अभी ये वायरस भारत  में सेकेंड स्टेज पर है। हालांकि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के वैज्ञानिक यह पता लगाने में लगे हुए हैं कि भारत में सामुदायिक संक्रमण शुरू हुआ है या नहीं।

आईसीएमआर के अनुसार कोरोना वायरस फैलने के चार स्टेज हैं। पहले स्टेज में वह लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए जो दूसरे देश से संक्रमित होकर भारत में आए हैं। ये स्टेज भारत पार कर चुका है। दूसरे चरण में स्थानीय स्तर पर संक्रमण फैलता है, लेकिन ये वे लोग होते हैं जो किसी न किसी ऐसे संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आते हैं, या फिर संक्रमित देश से यात्रा करके लौटे हैं। इसका तीसरा स्टेज सामुदायिक संक्रमण यानी  कम्यूनिटी ट्रांसमिशन है।

तीसरी  स्टेज पहले और दूसरी स्टेज से ज्यादा खतरनाक है। ये ऐसी स्टेज है, जिसे कंट्रोल  करना काफी मुश्किल है और इस स्टेज में लोगों के संक्रमित होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है। सामुदायिक संक्रमण में कोई व्यक्ति किसी ज्ञात संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए बिना या वायरस से संक्रमित देश की यात्रा किए बिना ही इसका शिकार हो जाता है। यानी संक्रमण लोगों के बीच जाने-अनजाने में फैलना शुरू हो जाता है। इसके बाद फिर तीसरे चरण में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि संक्रमित व्यक्ति को संक्रमण कहां और किससे फैला है।

इस संक्रमण को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जाते हैं। इस वायरस की फोर्थ स्टेज भी है जिससे इटली और चीन गुजर चुके हैं। इसमें ये वायरस एक ऐसी महामारी का रूप ले लेता है जिसमें लाखों लोगों की मौत हो सकती है। कुछ देशों में ये वायरस फोर्थ स्टेज पर आ चुका है। देश में इस संक्रमण को रोकने के लिए कई राज्यों में लॉकडाउन और कर्फ्यू लागू किया गया है। लोगों से अपील की गई है कि वो घर में रहें।

एक ओर विकसित और अमीर देश बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद कोरोना संकट का मुकाबला करने में हैरान परेशान हैं। 135 करोड़ आबादी वाले हमारे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा बेहद घटिया स्तर की है और निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा पैसा कमाने की कफ़न खसोट सेवा है। ऐसे में कोरोना संकट ने पूरे देश को महामारी के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।

पप्पू के नाम से भाजपा नेता राहुल गांधी की खिल्ली उड़ाते हैं जबकि राहुल गांधी ने 12 फरवरी के दिन जब भारत में इसका पहला मामला प्रकाश में आया था तो अपने ट्वीट में कहा था, “कोरोना वायरस हमारे लोगों और हमारे देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक होने जा रहा है। कांग्रेस के दिनों से ही बुनियादी जन स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ता-हाल अवस्था पर ऊंगली उठाते रहने का कोई मतलब नहीं है। आज जब संकट हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है तो हमें आज से और अभी से इसको लेकर ज़रूरी कार्रवाई करने की आवश्यकता आन पड़ी है”।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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