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‘संवैधानिक कर्तव्यों से विमुख हो गए हैं सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश’

उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने कहा है कि मैं अपनी न्यायपालिका से प्यार करता हूं और मैं अपने न्यायाधीशों से प्यार करता हूं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं उनकी आलोचना नहीं करूंगा। न्यायाधीश किसी निर्जन द्वीप में रहते हैं, वे विचारों के लिए खुले नहीं हैं। वे आलोचना नहीं सुनना चाहते हैं, वे आइना नहीं देखना चाहते हैं। उन्हें आइना दिखाना नागरिकों का कर्तव्य है।

उच्चतम न्यायालय के कंधों पर बड़ी ज़िम्मेदारी है और प्रार्थना है कि उच्चतम न्यायालय में इसकी संवेदना वापस आए। कोई भी यह नहीं कहता है कि सरकार जो कुछ भी करती है, उसे रद्द कर देना चाहिए, लेकिन इसका न्यायिक परीक्षण जरूर किया जाना चाहिए। एक संस्थान के रूप में उच्चतम न्यायालय को वास्तव में अपने संवैधानिक कर्तव्य को निभाने की आवश्यकता है, जिसमें परीक्षण करना और संतुलन जरूरी है।

वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने बुधवार को मंथन इंडिया द्वारा ‘द कॉन्स्टीट्यूशन, रूल ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस इन कोविड 19’ के दौरान आयोजित एक वेबिनार पर उक्त बातें कहीं। एटिफ़ेफ़ जहज़ाग को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को खुले समाजों के माध्यम से निर्मित किया जाना चाहिए जो जानकारी साझा करते हैं। जब जानकारी होती है, तो ज्ञान होता है। जब बहस होती है, तो समाधान होते हैं। जब सत्ता का कोई साझाकरण नहीं होता है, कोई नियम कानून नहीं होता है, कोई जवाबदेही नहीं होती है, तो दुर्व्यवहार, भ्रष्टाचार, पराधीनता और आक्रोश होता है।

दवे ने देश की वर्तमान स्थिति पर कहा कि वह स्थिति है, जहां हम आज हो सकते हैं। भारत जानकारी के अभाव में हलकान है। देश में सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर बहस चलाई जा रही है। हमें लड़ाकू राफेल जेट विमानों के बारे में बताया गया है और हम इन चीजों के बारे में जानकारी से प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि हमने निज़ामुद्दीन मर्क़ज़ पर हफ्तों तक बहस की, जिसका नतीजा यह रहा है कि बीमारी का अपराधीकरण हुआ और विदेशियों के विरुद्ध एफआईआर और गिरफ्तारी हुई।

दवे ने कहा कि जब भारत में कोविड-19 का संक्रमण फैलना शुरू हुआ, तब हम एक समुदाय का खलनायकीकरण कर रहे थे। क्या यह राष्ट्र-विरोधी नहीं है? बॉम्बे हाईकोर्ट ने नफरत फैलाने में मीडिया की भूमिका के बारे में कहा है।

दवे ने बहस और बातचीत के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भागीदारी लोकतंत्र एक ऐसी चीज है, जो बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह संवैधानिक नैतिकता को प्रभावित करती है। दवे ने कहा कि भारत में लोकतंत्र केवल मिट्टी की ऊपरी सतह जैसी है, इसके बाद का अनिवार्य रूप से अलोकतांत्रिक है। संविधान की ताकत प्रत्येक नागरिक के बचाव में निहित है।

दवे ने यह कहते हुए कि जवाबदेही का अत्यधिक महत्व है, एडीएम जबलपुर मामले का हवाला दिया और कहा कि यह उन अपमानजनक निर्णयों में से एक था, जिसे हमारे देश ने कभी देखा है और एकमात्र न्यायाधीश जो उस समय भी न्याय के पक्ष में डट कर खड़े रहे, वह जस्टिस खन्ना थे।

दवे ने कहा कि कुछ बेहतरीन कानूनी दिमाग रखने वाले जज उनसे सहमत नहीं थे, जिसमें न्यायमूर्ति भगवती और न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ भी शामिल थे। अपनी मृत्यु से पहले, दोनों ने निर्णय के लिए राष्ट्र से माफी मांगी थी, लेकिन जब हमें आपातकाल के खिलाफ खड़े होने वाले न्यायाधीशों की आवश्यकता थी तब वे वहां नहीं थे। वह इतिहास का सबसे घिनौना फैसला था। केवल जस्टिस खन्ना ही थे, जो डटे रहे।

दवे ने महामारी जैसे संकट में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 को लागू करने में सरकार की शिथिलता की ओर से इशारा किया। उन्होंने कहा कि जैविक आपदा के महीनों के बाद भी सरकार के पास महामारी से निपटने के लिए कोई व्यापक राष्ट्रीय योजना नहीं है। दवे ने पूछा कि लॉकडाउन से वास्तव में देश को क्या फायदा हुआ? उन्होंने कहा कि लॉकडाउन से हमारी अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ी क्षति हुई। उन्होंने कहा कि न केवल सरकार, बल्कि नागरिक भी उन मुद्दों पर बहस करने के लिए तैयार नहीं हैं, जो इस समय हमारे देश के सामने मुंह बाए खड़े हैं।

आज, इस चुनौती को पूरा करने के लिए तो सरकार पूरी तरह से तैयार है और इससे भी अधिक कि राष्ट्र इस पर बहस करने के लिए तैयार नहीं है। एक भी विपक्षी नेता ने राष्ट्रीय योजना के प्रभावित नहीं होने के सवाल उठाए हैं? हमारे देश ने सरकार से यह नहीं पूछा कि वे कानून का पालन क्यों नहीं कर रहे हैं?

उन्होंने विस्तार से बताया कि किस तरह से तालाबंदी से हमारी अर्थव्यवस्था को अपरिवर्तनीय क्षति हुई थी और यह सवाल किया था कि इसने वास्तव में देश की क्या सेवा की थी। उन्होंने कहा कि जबकि कुछ देशों ने न्यूजीलैंड जैसे थोड़े-बहुत लॉकडाउन के साथ एक उल्लेखनीय काम किया, क्योंकि उन्होंने 1 फरवरी से अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को बंद कर दिया था, हमारा देश मार्च की शुरुआत में ट्रम्प और गुजराती व्यापारियों का स्वागत कर रहा था।

इसके अलावा, दवे ने मोदी सरकार के कुछ फैसलों जैसे डिमोनेटाइजेशन की आलोचना की और कहा कि उच्चतम न्यायालय चेक और बैलेंस की अवधारणा को बनाए रखने के अपने कर्तव्य में विफल रहा। दवे ने कहा कि उच्चतम न्यायालय इस बुरे दौर में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहा है। उच्चतम न्यायालय नागरिकों के आंसू पोंछने में विफल रहा है। विचारों की स्वतंत्रता को गहरा झटका लगा है।

उन्होंने कहा कि देश में सूचना की कमी ने गलत सूचना की संस्कृति को बढ़ावा ‌दिया है। दवे ने कहा कि आज भारत की वास्तविक स्थिति को कोई नहीं जानता है। व्यक्तिगत भलाई, आर्थिक या चीन सीमा मुद्दे, क्योंकि हमें इसके बारे में जानकारी नहीं दी जा रही है। राष्ट्र जानने का हकदार है और मीडिया चैनल्स जो कहते हैं कि नेशन वॉन्ट्स टू नो को पूछना चाहिए।

उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण के साथ अपनी बात समाप्त की। उन्होंने कहा कि वह स्वर्ग से सोच रहे होंगे कि उन्होंने जो कविता लिखी थी उसका क्या हुआ। दवे ने अंत में कहा कि प्रशांत भूषण की अवमानना के मामले से नागरिकों को न्यायपालिका की आलोचना करने से नहीं रुकना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on August 30, 2020 11:18 am

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