Saturday, November 27, 2021

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- किसानों का प्रदर्शन राष्ट्रीय मुद्दा है, शाहीन बाग से तुलना ठीक नहीं

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देशव्यापी किसान आंदोलन की जिस हकीकत को उच्चतम न्यायालय ने तत्काल समझ लिया उसे मोदी सरकार अपने अहंकार और जिद में समझ कर भी समझना नहीं चाहती। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि दिल्ली और आसपास के इलाकों में किसानों का विरोध प्रदर्शन शीघ्र ही एक राष्ट्रीय मुद्दे में तब्दील हो सकता है और इसलिए न्यायालय इस मामले का बातचीत और सर्वमान्य तरीके से समाधान के लिए एक समिति गठित करने का प्रस्ताव कर रही है। ये मामला राष्ट्रीय महत्व का बन गया है और इसे बातचीत से हल किया जाना जरूरी है।

शाहीन बाग़ का मामला कानून व्यवस्था का था जबकि किसानों का मामला उससे पूरी तरह अलग है, कहते हुए चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमणियन की पीठ ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार और किसानों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत से अपेक्षित नतीजा नहीं निकला है। पीठ ने कहा कि किसानों और उनके संगठनों की एक कमेटी का गठन किया जाएगा। सरकार के नामित व्यक्ति भी होंगे।

किसानों के प्रदर्शन के कारण दिल्ली बॉर्डर बंद किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान पीठ ने केंद्र, दिल्ली, यूपी, हरियाणा और पंजाब को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा है। याचिकाकर्ता लॉ स्टूडेंट और दो अन्य की ओर से अर्जी दाखिल कर कहा गया कि बॉर्डर सील कर दिया गया है। शाहीनबाग केस में दिए फैसले का हवाला देकर कहा गया है कि वहां से किसानों को हटाया जाना चाहिए और बॉर्डर खाली कराया जाना चाहिए।

चीफ जस्टिस बोबडे ने सवाल किया कि आप बॉर्डर ओपन कराना चाहते हैं। याची ने कहा कि इस मामले में नोटिस जारी होना चाहिए। पीठ  ने याची से कहा कि आप किसानों के संगठन को भी पार्टी बनाएं। हम नहीं जानते कि कौन से संगठन हैं। एडवोकेट जीएस मनी ने इस दौरान कहा कि इस मामले में आपसी बातचीत से मामले को निपटाया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि ज्यादातर अर्जी सही तरह से नहीं रखी गई है।

चीफ जस्टिस ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा है कि किसने किसानों को दिल्ली आने से रोका है। क्या आपने रोका है? तब तुषार मेहता ने कहा कि पुलिस ने उन्हें रोक रखा है। तुषार मेहता ने कहा कि सरकार किसानों से बात कर रही है। भारतीय किसान यूनियन और अन्य संगठन मौके पर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन कुछ अन्य एलिमेंट ने भी प्रदर्शन में भाग ले लिया है। सरकार किसानों के खिलाफ कुछ भी नहीं कर रही है।

चीफ जस्टिस ने तब कहा कि आपने बातचीत की है, लेकिन वह फेल हुई है और फिर भी आप बातचीत के लिए तैयार हैं, जो सराहनीय है। पीठ ने कहा कि हम मामले में नोटिस जारी करते हैं और सुनवाई के लिए गुरुवार की तारीख तय करते हैं। पीठ ने कहा कि किसानों और उनके संगठनों की एक कमेटी का गठन किया जाएगा। सरकार के नामित व्यक्ति भी होंगे।

पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है। पीठ ने तुषार मेहता से कहा कि हम आपको बताना चाहते हैं कि हम कुछ प्लानिंग कर रहे हैं। हम एक कमेटी का गठन करने जा रहे हैं जो मामले में विवाद का निपटारा करेगा। इसमें भारतीय किसान यूनियन, भारत सरकार और अन्य किसान संगठनों के प्रतिनिधि होंगे। हम किसान संगठनों से कहेंगे कि वह इस कमेटी के पार्ट बनें, क्योंकि ये मुद्दा जल्दी ही राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा बनने जा रहा है।

पीठ ने याचिकाकर्ता की अर्जी पर केंद्र, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और यूपी को नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई के लिए गुरुवार की तारीख तय कर दी है साथ ही याचिकाकर्ता से कहा है कि वह किसानों के संगठनों को पार्टी बनाए।

याचिकाकर्ता के वकील जीएस मणि ने कहा कि अदालत ने शाहीन बाग केस के वक्त कहा था कि सड़कें जाम नहीं होनी चाहिए। बार-बार शाहीन बाग का हवाला देने पर चीफ जस्टिस ने वकील को टोका। उन्होंने कहा कि वहां पर कितने लोगों ने रास्ता रोका था? कानून व्यवस्था के मामलों में मिसाल नहीं दी जा सकती है।

वकील जीएस मणि ने कहा कि मैं किसान परिवार से आता हूं, इसलिए अपील की है। जिस पर अदालत ने उनसे जमीन के बारे में पूछा, वकील ने बताया कि उनकी ज़मीन तमिलनाडु में है। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि तमिलनाडु की स्थिति को पंजाब-हरियाणा से नहीं तौला जा सकता है। पीठ ने कहा कि वो किसान संगठनों का पक्ष सुनेंगे। हम कल आंदोलनकारी संगठनों को भी सुनेंगे।

संसद ने किसानों से जुड़े 3 अधिनियम पारित किए हैं। इनके नाम हैं, फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स एक्ट, फार्मर्स एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेस एक्ट और एसेंशियल कमोडिटीज (अमेंडमेंट) एक्ट। राष्ट्रपति की मुहर के बाद तीनों बिल कानून बन गए हैं। इनमें किसानों को कृषि मंडी के बाहर फसल बेचने, निजी कंपनियों और व्यापारियों से फसल के उत्पादन और बिक्री का कॉन्ट्रेक्ट करने जैसी स्वतंत्रता दी गई है। किसान संगठन इसे किसान विरोधी बता रहे हैं। उनकी मांग है कि तीनों कानून वापस लिए जाएं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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