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तबलीगी मरकज और सरकार की मुर्दा हरकत उर्फ “माफी युग”

मरकज यानी मीटिंग और यह तबलीगी जमात द्वारा दिल्ली के हज़रत निजामुद्दीन औलिया के दयार में पूरे साल चलता ही रहता है  यहाँ पूरे साल भर देश विदेश से जमाती मुस्लिम आते रहते हैं। मरकज में एक सप्ताह के आस पास रुक कर चले जाते हैं ।

यह सब विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय की देख रख में स्थानीय शासन प्रशासन के ताल मेल से होने वाली अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई है!

अब आप गौर करें तो सारा खेल समझ सकते हैं कि यह कोई लुका छिपी या छुपन छुपाई का खेल नहीं बल्कि भारत सरकार की तय सरकारी योजना का हिस्सा है।

उस पर भी इस मामले में मरकज की भूमिका बहुत साफ और सरकारी भूमिका पूरी संदिग्ध दिखती है।

दिल्ली स्थित तबलीगी मरकज के मौलाना यूसुफ ने 25 मार्च 2020 को प्रशासन को चिट्ठी लिखकर अपनी ओर से सूचित किया था कि मरकज से 1500 लोगों को बाहर भेजा जा चुका है मगर करीब 1000 लोग अभी भी वहां फंसे हैं। जो कि लॉक डाउन की वजह से नहीं जा सके हैं। उनको भेजने के लिए वाहन पास जारी किए जाएं । मौलाना जी ने चिट्ठी के साथ वाहनों की सूची भी लगाई थी। मगर केवल मौलाना जी के चाहने से क्या होता है। प्रशासन ने चिट्ठी पर पत्थर रखा और वाहन पास जारी नहीं किए ।

इस संदर्भ में दिल्ली मरकज ने पुलिस और SDM को जो चिट्ठी लिखी उसे यहां दिया गया है। अब दिल्ली की महान पुलिस और बेमुरौवत प्रशासन से कुछ प्रश्न :

*लॉक डाउन के पहले तक मरकज 1500 लोगों को निकाल चुका था जो 1000 लोग बचे थे वो पुलिस और प्रशासन की जानकारी में था। क्योंकि चिट्ठी लिखी जा चुकी थी?

*क्या मरकज यह काम चोरी छिपे कर रहा था और साथ में चिट्ठी लिख कर बता भी रहा था?

*जब देश में लॉक डाउन की घोषणा की गई थी तब एक ख़ास बात बोली गई थी कि जो जहाँ है वहीं रुक जाए। इस हिसाब से जैसा कि इस पत्र

के माध्यम से पता चलता है कि 1500 लोग जा चुके थे 1000 लोग बचे थे तो क्या वे बाहर जा कर लॉक डाउन तोड़ते या जैसे जहां रुके थे वहां रुक कर सरकार के आदेश का पालन करते, जो कि उन्होंने किया भी, तो 1000 लोग इस वजह से वहीं रुक गए ?

*क्या शासन प्रशासन की जानकारी के बिना मरकज में मलेशिया इंडोनेशिया से भी लोग आए? क्या आने वालों को वीजा भारत सरकार ने नहीं दिया? निश्चित रूप से भारत सरकार ने ही दिया है? यदि वीजा दिया तो इसका मतलब वहां कोई गैर कानूनी और छुप कर कोई गैर कानूनी काम तो नहीं हो रहा होगा ? पुलिस भी भारत सरकार के गृह मंत्रालय के कंट्रोल में ही आती है ?

*पुलिस थाना मरकज से कुल पचास से साठ कदमों की दूरी पर है और पुलिस के सभी सिपाही अपनी चाय वहीं पीते हैं। जो दिल्ली और मरकज के आसपास का भूगोल जानते हैं वे इसकी पुष्टि कर सकते हैं? तो पुलिस मरकज के सामने चाय सुड़कती रही पर उस ने कार्रवाई नहीं की? क्यों नहीं की यह कौन बताएगा ? गृह मंत्रालय या स्थानीय चाय बेचने वाला?

*सच्चाई यह है कि सरकार को किसी की रक्षा सुरक्षा से कोई दरकार सरोकार नहीं है। उसके साथ भारतीय बेदम मीडिया को भी हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाला एक मौका दिखा, जो कि मूल रूप से गृह मंत्रालय की नाकामी कही जाएगी। क्योंकि फंसे लोग विदेशी हैं। उनकी सुरक्षा से खेलना बहुत महंगा पड़ेगा उन करोड़ों भारतीयों के लिए जो अभी भी विदेशों में फंसे हैं!

*आप अपने यहां के विदेशियों को छुपा कहेंगे तो आपके करोड़ों लोग भी छुपे बताए जाएंगे। जो आप दिल्ली में या भारत में कहीं भी करेंगे वही आव भगत आपके लोगों को विदेश में मिलेगी। तो आपको इस प्रशासनिक असफलता को उजागर करने की जगह एक सांप्रदायिक रंग देने का यह एक सुनहरा मौका मिल गया है जिसे शायद सरकार भी भुनाना चाहे। लेकिन सरकार आपके दिमाग और दिल में वे लोग होने चाहिए जो अभी भी बाहर फंसे हैं और आपके लॉक डाउन तक वहां फंसे रहेंगे।

*देखिए कल तक पूरा मीडिया जो कोरोना पर देश को जागरूक और लगातार सावधान कर जानकारी दे रहा था अब उनका पूरा फोकस मरकज निजामुद्दीन और “खेल” पर चला गया है। क्योंकि उसका चरित्र ही सनसनी की राख से रंगा पुता और काफी कुछ राख से बना हुआ है।

*मरकज और वहां रह रहे विदेशी मेहमानों ने अगर कानून तोड़ने का अपराध किया है तो उन्हें पूरी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन क्या आपने अपने विदेशी मेहमानों की खोज खबर ली? क्या विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय ने यह सोचा की मरकज में ठहरे विदेशी मेहमान कैसे हैं? उनकी सुरक्षा का खयाल क्यों नहीं आया?

* सरकार के कारकून भी मंद बुद्धि या सांप्रदायिक सोच से भर गए हैं और दूर की नहीं सोच पा रहे हैं? यदि इस लापरवाही में “लाठी बुद्धि” वाली पुलिस और ठस स्थानीय प्रशासन और जाहिल विदेश मंत्रालय के साथ काहिल गृह मंत्रालय भी लिप्त है तो उन पर भी कार्रवाई अवश्य की जानी चाहिए ।

*हालांकि आप सब उम्मीद पर खरे कब उतरे हैं। और एक नया दौर भी चल गया है “माफी युग” तो शायद कल विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, दिल्ली पुलिस कमिश्नर और प्रशासन के लोग माफी मांग कर मरकज के ठीहे पर चाय सुड़कते पाए जाएं!

दुनिया बेगैरतों का बाजार हो गई है जो! लेकिन किसी ने कहा है कि गैर के साथ वही व्यवहार करो जो तुम अपने साथ होते देखना चाहते हो! तुम्हारे करोड़ों बच्चे युवा बुजुर्ग बाहर के देशों में हैं! जो करो, जो कहो उनकी सुरक्षा और सम्मान की चिंता करके कहो करो!

जैसा दोगे पक्का वैसा ही मिलेगा। चोट पर चोट प्यार पर प्यार!

(बोधिसत्व हिंदी के प्रसिद्ध कवि हैं और आजकल मुंबई में रहते हैं।)

This post was last modified on March 31, 2020 7:27 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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