Wednesday, October 27, 2021

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महिलाओं और नागरिकों को लेकर नर्म पड़ा तालिबान का रवैया, अमेरिका ने चेताया

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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के प्रभावशाली होने के बाद सबसे ज़्यादा चिंता महिलाओं की स्थिति को लेकर जतायी जा रही है। गौरतलब है कि 20 साल पहले अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता में आने के बाद उन्होंने महिलाओं पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी थीं। दरअसल तालिबान इस्लाम की कट्टर धारा में यकीन रखते हैं और महिलाओं पर इस्लामी पाबंदियों के हिमायती रहे हैं। 

तालिबान के बढ़ते क़ब्जे के बीच पिछले दिनों राजधानी काबुल में दुकानों के बाहर से महिलाओं के पोस्टरों और तस्वीरों को हटाया गया था। 

लेकिन मंगलवार को फिजा कुछ बदली-बदली सी लगी। जब ‘टोलो न्यूज़’ के हेड ने ट्वीट करके बताया कि “हमने आज महिला एंकरों के साथ अपना प्रसारण फिर से शुरू किया।” 

सीएनएन की एक महिला पत्रकार Clarissa ward ने आज काबुल की सड़कों से लाइव कार्यक्रम पेश किया। इसके अलावा टोलो न्यूज़ की एक महिला रिपोर्टर ने भी काबुल की सड़कों से आज लाइव रिपोर्टिंग की। 

वहीं टोलो न्यूज के स्टूडियो में आज एक अफ़गान महिला प्रस्तोता ने तालिबान अधिकारी का साक्षात्कार लिया। टोलो न्यूज़ की मालिक कंपनी मोबीग्रुप के निदेशक साद मोहसेनी ने भी तस्वीरों को ट्वीट किया है। साथ ही एक महिला रिपोर्टर की अफ़ग़ानिस्तान की सड़कों से रिपोर्टिंग करती तस्वीर भी साझा की है। 

उन्होंने साथ ही लिखा है, “टोलो न्यूज़ और तालिबान एक बार फिर से इतिहास बनाते हुए। तालिबान के वरिष्ठ प्रतिनिधि अब्दुल हक़ हम्माद, आज सुबह हमारी प्रेज़ेंटर बाहिश्ता से बात करते हुए। दो दशक पहले जब वो सत्ता में पहली दफ़ा आए थे, तो ये सोचना भी नामुमकिन था।”

तालिबान ने सभी राज्य कर्मचारियों के लिए राज-क्षमा  (प्राण रक्षा) की घोषणा की 

मुल्ला याकूब ने एक ऑडियो संदेश में तालिबान लड़ाकों को निर्देश दिया, “किसी को भी किसी के घर जाने का अधिकार नहीं है। पूर्व अधिकारियों के घरों से वाहनों के हथियार लेने का अधिकार किसी को नहीं है। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें।”

बता दें कि मुल्ला याक़ूब मुल्ला उमर का सबसे बड़ा बेटा है।

वहीं तालिबान ने सभी राज्य कर्मचारियों के लिए राज-क्षमा  (प्राण रक्षा) की घोषणा की है।

सुरक्षा परिषद की बैठक में संघर्ष का राजनीतिक हल निकालने पर ज़ोर 

सोमवार को अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति पर चर्चा के लिए बुलायी गयी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की विशेष बैठक में तालिबान से अपील की गई कि वो इस संघर्ष का अंत राजनीतिक हल निकाल कर करे और अफ़ग़ानिस्तान को एक बार फिर चरमपंथियों की पनाहगाह ना बनने दे। 

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि वहाँ किसी की भी स्वीकार्यता और वैधता के लिए ये ज़रूरी है कि ‘वहाँ एक राजनीतिक समाधान निकले और जो कि महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का पूरी तरह से समाधान करता हो।”

वहीं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में चीन के प्रतिनिधि ज़ांग जुन ने अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा हालत पर चिंता जताई और सदस्य देशों से वहाँ मानवीय आपदा की स्थिति को रोकने की अपील की। गौरतलब है कि भारत के अध्यक्षता ग्रहण करने के बाद 10 दिनों के भीतर सुरक्षा परिषद को दूसरी बार अफ़ग़ानिस्तान पर आपात बैठक करनी पड़ी है।

चीन के स्थायी प्रतिनिधि ज़ांग जुन ने साथ ही बैठक में पाकिस्तान को शामिल नहीं किए जाने पर अफ़सोस प्रकट करते हुये कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध की समाप्ति केवल अफ़ग़ान लोग ही नहीं चाहते बल्कि ये पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की इच्छा है।”

दरअसल, पाकिस्तान भी इस बैठक में शामिल होना चाहता था मगर उसे एक बार फिर इससे रोक दिया गया। पिछले सप्ताह भी सुरक्षा परिषद ने अफ़ग़ानिस्तान पर आपात बैठक बुलाई थी और उसमें भी पाकिस्तान को आने से रोक दिया गया था। पाकिस्तान इसके लिए खुले तौर पर भारत को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है क्योंकि भारत अगस्त महीने के लिए सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष है। 

सोमवार को भी परिषद की बैठक के बाद संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी दूत मुनीर अकरम ने कहा, “अफ़ग़ानिस्तान की शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान की एक अहम भूमिका है, मगर भारत जान-बूझकर हमें अफ़ग़ानिस्तान के बारे में नहीं बोलने दे रहा। “

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने भी एक बार फिर भारत की आलोचना करते हुये ट्वीट कर लिखा है- “अफ़ग़ानिस्तान की नियति के इस अहम मौक़े पर भारत की पक्षपातपूर्ण और बाधा डालने वाली हरकतें और इस बहुसदस्यीय मंच का बार-बार राजनीतिकरण करना, जिसका मक़सद ही शांति लाना है, ये दिखाता है कि अफ़ग़ानिस्तान और इस क्षेत्र को लेकर उनका इरादा क्या है।”

काबुल पर तालिबान का कब्ज़ा होने के बाद अधिकतर देशों ने वहाँ से अपने दूतावास कर्मचारियों को बाहर निकालना शुरू कर दिया है। भारत ने भी मंगलवार को काबुल में अपने राजदूत और दूतावास कर्मचारियों को वापस बुलाने का फ़ैसला किया है। 

इसके बाद अब अफ़ग़ानिस्तान में केवल तीन देश रूस, चीन और पाकिस्तान के दूतावास ख़ुले रह जायेंगे। वहीं इंडोनेशिया ने कहा है कि वो अफ़ग़ानिस्तान का अपना दूतावास बंद करेगा, लेकिन वहां पर एक ‘छोटा कूटनीतिक मिशन’ रखना जारी रखेगा।”

वहीं काबुल पर तालिबान के क़ब्ज़े के एक दिन बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को बाहर निकालने के अपने फ़ैसले का समर्थन किया है। 

बाइडेन ने चेतावनी देते हुए कहा है कि “यदि तालिबान ने अमेरिकी सैनिकों पर हमला किया तो अमेरिका ‘पूरी विध्वंसक शक्ति के साथ अपने लोगों की रक्षा करेगा। “

अमेरिकी सेना के काबुल हवाई अड्डे का नियंत्रण अपने हाथ में लेने के बाद वहां से उड़ानों को दोबारा चालू किया गया। गौरतलब है कि पिछले दो दिन से काबुल हवाई अड्डे पर विशेष कर कल पूरे दिन अफ़रातफ़री का माहौल रहा। अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना चाह रहे हज़ारों लोग हवाई अड्डे पहुंचे 

अफ़ग़ानिस्तान में फंसे अपने नागरिकों को निकालने के लिए अमेरिका ने 1,000 अतिरिक्त सैनिक वहां भेजे हैं। 60 से अधिक देशों ने एक साझा बयान जारी कर तालिबान से आम लोगों को नुक़सान न पहुंचाने की अपील की है और कहा है कि जो लोग जाना चाहें उन्हें सुरक्षित जाने दिया जाए। बता दें कि रविवार को राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के देश छोड़ कर भागने के बाद तालिबान ने राजधानी काबुल पर कब्ज़ा कर लिया था।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।) 

  

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