Wednesday, December 7, 2022

‘अंग्रेज़ों! भारत छोड़ो’ आंदोलन और गांधी जी का यादगार भाषण

Follow us:

ज़रूर पढ़े

1942 के पहले जब 1938–39 में इस बात की संभावना बन गयी थी कि द्वितीय विश्वयुद्ध होगा ही, तब नेताजी सुभाष का विचार था कि युद्ध के समय पर ही अंग्रेजों के खिलाफ आज़ादी की एक निर्णायक जंग छेड़ी जाय। पर तब गांधी सहमत नहीं थे। वे अंतरराष्ट्रीय और देश के भीतरी स्थिति को समझ रहे थे। 1939 में जैसे ही युद्ध की घोषणा हुई, ब्रिटिश सरकार ने बिना भारत की चुनी हुयी सरकारों की सहमति या परामर्श के भारत को युद्ध मे शामिल कर लिया। इसके विरोध में सभी कांग्रेसी सरकारों ने त्यगपत्र दे दिया। एमए जिन्ना की मुस्लिम लीग अंग्रेजी हुकूमत के साथ रही और हिंदू महासभा के डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी बंगाल की फजलुल हक सरकार में वित्तमंत्री बने रहे। 1942 आते आते गांधी जी का ब्रिटिश सदाशयता से मोहभंग हो गया और वे अंतिम और निर्णायक जनआंदोलन छेड़ने की योजना बनाने लगें। इस प्रकार 8 अगस्त 1942 को भारत के स्वाधीनता संग्राम के सबसे बड़े और निर्णायक जनआंदोलन की शुरुआत हुयी।

8 अगस्‍त 1942 को गांधी जी द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत के साथ ही अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर करने के लिए एक सामूहिक सिविल नाफरमानी आंदोलन :करो या मरो’ आरंभ करने का निर्णय लिया गया। इस आंदोलन का आह्वान, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बम्बई अधिवेशन द्वारा किया गया था। युसूफ मेहर अली ने इस प्रस्तावित आंदोलन को, ‘क्विट इंडिया’ नाम सुझाया और यही नाम इतिहास के इस सबसे बड़े आंदोलन के साथ दर्ज हो गया। गांधी जी ने इसे करो या मरो की प्रेरणा से शुरू करने की बात कही। गांधी ने अपने समर्थकों को स्पष्ट कर दिया था कि वह युद्ध के प्रयासों का समर्थन तब तक नहीं करेंगे, जब तक कि भारत को आजादी न दे दी जाए। यह संदेश ब्रिटिश हुक़ूमत तक स्पष्ट शब्दों में दृढ़ता से पहुंचा भी दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया था कि इस बार यह आंदोलन बंद नहीं होगा। उन्होंने सभी कांग्रेसियों और भारतीयों को अहिंसक रूप से करो या मरो के संकल्प के साथ  आजादी के लिए अनुशासित होकर जुट जाने को कहा।

10 08 2022 02

बम्बई में भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा होते ही, 9 अगस्त को सुबह 5 बजे गांधी जी को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया और साथ ही कांग्रेस के सभी बड़े नेता 9 और 10 अगस्त तक गिरफ्तार कर के जेलों में डाल दिये गए। उस समय इंडियन नेशनल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद थे। 9 अगस्त 1942 को दिन निकलने से पहले ही कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बम्बई में मौजूद लगभग सभी सदस्य गिरफ्तार हो चुके थे और कांग्रेस को विधिविरुद्ध संस्था घोषित करके प्रतिबंधित कर दिया गया था।

यह आंदोलन एक जन आंदोलन बन गया। जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया, अरुणा आसफ अली जिन्होंने 1937 में कांग्रेस के अंदर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नाम से एक अलग संगठन बना लिया था, ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। रेल की पटरियां उखाड़ी गयीं, तार काटे गए। अंग्रेजों के दमन नीति के बाद भी यह आंदोलन नहीं रुका और लोग ब्रिटिश शासन के प्रतीकों के खिलाफ प्रदर्शन करने सड़कों पर निकल पड़े और उन्‍होंने सरकारी इमारतों पर कांग्रेस के झंडे फहराने शुरू कर दिये।

विद्यार्थी और कामगार हड़ताल पर चले गये। बंगाल के किसानों ने करों में बढ़ोतरी के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। सरकारी कर्मचारियों ने भी काम करना बंद कर दिया, यह एक ऐतिहासिक क्षण था। वर्ष 1857 के बाद देश की आजादी के लिए चलाए जाने वाले सभी आंदोलनों में सन् 1942 का आंदेालन एक व्यापक और मज़बूत आंदोलन साबित हुआ। जिसके कारण भारत में ब्रिटिश राज की नींव पूरी तरह से हिल गई थी। आंदोलन का ऐलान करते वक़्त गांधी जी ने कहा था, मैंने कांग्रेस को बाजी पर लगा दिया। यह जो लड़ाई छिड़ रही है वह एक सामूहिक लड़ाई है। इस अवसर पर गांधी जी ने जो भाषण दिया उसे पढा जाना चाहिए।

भाषण, अविकल रूप से प्रस्तुत है-

“प्रस्ताव पर चर्चा शुरू करने से पहले मैं आप सभी के सामने एक या दो बात रखना चाहूँगा, मैं दो बातों को साफ़-साफ़ समझना चाहता हूँ और उन दो बातों को मैं हम सभी के लिये महत्वपूर्ण भी मानता हूँ। मैं चाहता हूँ की आप सब भी उन दो बातों को मेरे नजरिये से ही देखे, क्योंकि यदि आपने उन दो बातों को अपना लिया तो आप हमेशा आनंदित रहेंगे।

यह एक महान जवाबदारी है। कई लोग मुझसे यह पूछते है की क्या मैं वही इंसान हूँ जो मैं 1920 में हुआ करता था और क्या मुझमे कोई बदलाव आया है। ऐसा प्रश्न पूछने के लिये आप बिल्कुल सही हो। मैं जल्द ही आपको इस बात का आश्वासन दिलाऊंगा की मैं वही मोहनदास गांधी हूँ जैसा मैं 1920 में था।

मैंने अपने आत्मसम्मान को नही बदला है।आज भी मैं हिंसा से उतनी ही नफरत करता हूँ जितनी उस समय करता था। बल्कि मेरा बल तेज़ी से विकसित भी हो रहा है। मेरे वर्तमान प्रस्ताव और पहले के लेख और स्वभाव में कोई विरोधाभास नहीं है। वर्तमान जैसे मौके हर किसी की जिंदगी में नहीं आते, लेकिन कभी-कभी एक-आध की जिंदगी में जरुर आते है। मैं चाहता हूँ की आप सभी इस बात को जाने की अहिंसा से ज्यादा शुद्ध और कुछ नहीं है, इस बात को मैं आज कह भी रहा हूँ और अहिंसा के मार्ग पर चल भी रहा हूँ।

हमारी कार्यकारी समिति का बनाया हुआ प्रस्ताव भी अहिंसा पर ही आधारित है, और हमारे आन्दोलन के सभी तत्व भी अहिंसा पर ही आधारित होंगे। यदि आप में से किसी को भी अहिंसा पर भरोसा नहीं है तो कृपया करके इस प्रस्ताव के लिये वोट न करें। मैं आज आपको अपनी बात साफ़-साफ़ बताना चाहता हूँ। भगवान ने मुझे अहिंसा के रूप में एक मूल्यवान हथियार दिया है। मैं और मेरी अहिंसा ही आज हमारा रास्ता है।

वर्तमान समय में जहाँ धरती हिंसा की आग में झुलस चुकी है और वही लोग मुक्ति के लिये रो रहे है, मैं भी भगवान द्वारा दिये गए ज्ञान का उपयोग करने में असफल रहा हूँ, भगवान मुझे कभी माफ़ नही करेगा और मैं उनके द्वारा दिये गए इस उपहार को जल्दी समझ नही पाया। लेकिन अब मुझे अहिंसा के मार्ग पर चलना ही होगा।

10 08 2022 04

अब मुझे डरने की बजाए आगे देखकर बढ़ना होगा।हमारी यात्रा ताकत पाने के लिये नहीं बल्कि भारत की आज़ादी के लिये अहिंसात्मक लड़ाई के लिए है। हिंसात्मक यात्रा में तानाशाही की संभावनाए ज्यादा होती है जबकि अहिंसा में तानाशाही के लिये कोई जगह ही नही है। एक अहिंसात्मक सैनिक खुद के लिये कोई लोभ नहीं करता, वह केवल देश की आज़ादी के लिये ही लड़ता है। कांग्रेस इस बात कोलेकर बेफिक्र है कि आज़ादी के बाद कौन शासन करेगा।

आज़ादी के बाद जो भी ताकत आएँगी उसका संबंध भारत की जनता से होगा और भारत की जनता ही ये निश्चित करेंगी की उन्हें ये देश किसे सौपना है। हो सकता है की भारत की जनता अपने देश को पेरिस के हाथो सौंपे। कांग्रेस सभी समुदायों को एक करना चाहती है न की उनमें फूट डालकर विभाजन करना चाहती है।

आज़ादी के बाद भारत की जनता अपनी इच्छानुसार किसी को भी अपने देश की कमान सँभालने के लिये चुन सकती है। और चुनने के बाद भारत की जनता को भी उसके अनुरूप ही चलना होगा। मैं जानता हूँ की अहिंसा परिपूर्ण नहीं है और ये भी जानता हूँ की हम अपने अहिंसा के विचारो से फ़िलहाल कोसों दूर है लेकिन अहिंसा में ही अंतिम असफलता नहीं है। मुझे पूरा विश्वास है, छोटे-छोटे काम करने से ही बड़े-बड़े कामो को अंजाम दिया जा सकता है।

ये सब इसलिए होता है क्योंकि हमारे संघर्षो को देखकर अंततः भगवान भी हमारी सहायता करने को तैयार हो जाते हैं। मेरा इस बात पर भरोसा है की दुनिया के इतिहास में हमसे बढ़कर और किसी देश ने लोकतांत्रिक आज़ादी पाने के लिये संघर्ष किया होगा। जब मै पेरिस में था तब मैंने कार्लाइल फ्रेंच प्रस्ताव पढ़ा था और पंडित जवाहरलाल नेहरु ने भी मुझे रशियन प्रस्ताव के बारें में थोडा बहुत बताया था। लेकिन मेरा इस बात पर पूरा विश्वास है की जब हिंसा का उपयोग कर आज़ादी के लिये संघर्ष किया जायेगा, तब लोग लोकतंत्र के महत्व को समझने में असफल होंगे।

जिस लोकतंत्र का मैंने विचार कर रखा है, उस लोकतंत्र का निर्माण अहिंसा से होगा, जहाँ हर किसी के पास समान आज़ादी और अधिकार होंगे। जहाँ हर कोई खुद का शिक्षक होंगा और इसी लोकतंत्र के निर्माण के लिये आज मै आपको आमंत्रित करने आया हूँ। एक बार यदि आपने इस बात को समझ लिया तब आप हिन्दू और मुस्लिम के भेदभाव को भूल जाओंगे। तब आप एक भारतीय बनकर खुद का विचार रखोगे और आज़ादी के संघर्ष में साथ दोगे।अब प्रश्न ब्रिटिशों के प्रति आपके रवैये का है। मैंने देखा है की कुछ लोगों में ब्रिटिशों के प्रति नफरत का रवैया है।

10 08 2022 05

कुछ लोगो का कहना है की वे ब्रिटिशों के व्यवहार से चिढ़ चुके हैं। कुछ लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद और ब्रिटिश लोगों के बीच के अंतर को भूल चुके हैं। उन लोगों के लिये दोनों ही एक समान है। उनकी यह घृणा जापानियों की आमंत्रित कर रही है। यह काफी खतरनाक होगा। इसका मतलब वे एक गुलामी की दूसरी गुलामी से अदला बदली करेंगे।

हमें इस भावना को अपने दिलो-दिमाग से निकाल देना चाहिये। हमारा झगड़ा ब्रिटिश लोगों के साथ नही हैं बल्कि हमें उनके साम्राज्यवाद से लड़ना है। ब्रिटिश शासन को खत्म करने का मेरा प्रस्ताव गुस्से से पूरा नही होने वाला।

यह किसी बड़े देश जैसे भारत के लिये कोई ख़ुशी वाली बात नही है कि ब्रिटिश लोग जबरदस्ती हमसे धन वसूल रहे है। हम हमारे महापुरुषों के बलिदानों को नही भूल सकते। मैं जानता हूँ की ब्रिटिश सरकार हमसे हमारी आज़ादी नही छीन सकती, लेकिन इसके लिये हमें एकजुट होना होगा। इसके लिये हमें खुद को घृणा से दूर रखना चाहिए।

खुद के लिये बोलते हुए, मैं कहना चाहूँगा की मैंने कभी घृणा का अनुभव नही किया। बल्कि मैं समझता हूँ कि मैं ब्रिटिशों के सबसे गहरे मित्रो में से एक हूँ।आज उनके अविचलित होने का एक ही कारण है, मेरी गहरी दोस्ती। मेरे दृष्टिकोण से वे फ़िलहाल नरक की कगार पर बैठे हुए है। और यह मेरा कर्तव्य होगा कि मैं उन्हें आने वाले खतरे की चुनौती दूँ। इस समय जहाँ मैं अपने जीवन के सबसे बड़े संघर्ष की शुरुआत कर रहा हूँ, मैं नहीं चाहता की किसी के भी मन में किसी के प्रति घृणा का निर्माण हो।”

सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जनान्दोलन में 940 लोग मारे गए थे और 1630 घायल हुए थे जबकि 60229 लोगों ने गिरफ्तारी दी थी। कई इलाकों ने खुद को ही स्वतंत्र घोषित कर दिया। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के आंदोलनकारियों ने चित्तू पांडेय के नेतृत्व में खुद को आज़ाद घोषित कर दिया और लगभग एक माह तक यह स्थिति बनी रही। अंग्रेजों ने सपने में भी नही सोचा था कि, उन्हें इतने व्यापक आंदोलन का सामना करना पड़ेगा। आज 9 अगस्त को हम उस महान आंदोलन के पवित्र संकल्प को याद कर रहे हैं। इस अवसर पर, स्वाधीनता संग्राम के समस्त ज्ञात अज्ञात सेनानियों, भारतीय जन की जिजीविषा और उनकी संकल्प शक्ति को याद किया जाना चाहिए और उन सबका विनम्रतापूर्वक स्मरण।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

क्यों ज़रूरी है शाहीन बाग़ पर लिखी इस किताब को पढ़ना?

पत्रकार व लेखक भाषा सिंह की किताब ‘शाहीन बाग़: लोकतंत्र की नई करवट’, को पढ़ते हुए मेरे ज़हन में...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -