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फ़ासीवाद की बेड़ियां और आज़ादी का मतलब

आज़ादी के बाद जो लोग अब तक यह सोचते रहे कि चिंतन और चुनाव के लिए मनुष्य आज़ाद है और उसकी यह आज़ादी ही उनके चिंतन का मूल है या फ़िर जिन्होंने ऐसा कभी सोचा ही नहीं और हमेशा व्यवस्था की बजाए हाकिम का विकल्प ढूंढते रहे उनके लिए भी और उनके लिए भी जो यह मानने लगे हैं कि अभिव्यक्ति की आज़ादी ही नहीं मनुष्य का अस्तित्व ही ख़तरे में है, इसी 5 सितंबर को आज़ादी की पुनर्व्याख्या करती अरुंधति रॉय की नई किताब आई है- आज़ादी। जैसा कि अरुंधति ने प्रस्तावना में भी इस बात का ज़िक्र किया है यह किताब अरुंधति रॉय के 2018 से 2020 के दरम्यान लिखे निबंधों का संग्रह है। 

किताब के प्रकाशक साइमन प्रोस्सर ने किताब के शीर्षक के बारे में अरुंधति से सवाल किया था तो उन्होंने इसका जवाब जो भी दिया वह इस किताब में दर्ज़ है लेकिन अगर आप अरुंधति रॉय के अब तक के सृजन और चिंतन पर एक नज़र डालें तो यह बात साफ हो जाता है कि उनका समूचा व्यक्तित्व जिस एक शब्द के साथ बहुत गहरे जुड़ा हुआ है वह ‘आज़ादी’ ही है।

हर तरह के डंडे, झंडे और सरहद से दूर एक विश्व-नागरिक की तरह समूची मनुष्यता के लिए फिक्रमंद उन लोगों में अरुंधति रॉय भी एक हैं जिसे क़त्लगाह की ओर हाँकी जा रही अलग-अलग रंगों में रंगी भेड़ों के रेवड़ को देखने पर अलग-अलग देशों के झंडे दिखाई देते हैं और हर भेड़ का बाड़ा एक अलग देश। ऐसे लोग हमेशा इस बात को लेकर भी चिंतित रहते हैं कि इंसान खुद को इन भेड़ों से अलग करके देखने का प्रयास करे। 

न्यायपूर्ण या विषमता मुक्त भौतिक परिवेश की रचना जिस किसी संवेदनशील एवं विवेकशील मानव का सनातन स्वप्न रहा है, अपने निबंधों में अरुंधति उसी के साथ खड़ी दिखाई देती हैं। अरुंधति को पढ़ते हुए अपने उन प्रिय लेखकों या सदा के लिए बिछड़ गए मित्रों की याद आ जाना स्वाभाविक है जो अरुंधति की तरह सोचते थे या अरुंधति जिनकी तरह बोलती या लिखती हैं।

अरुंधति रॉय बड़ी सहजता से जिस रोचक शैली में लिखती हैं उसे पढ़ते हुए अक्सर कवि-मित्र पाश याद आ जाते हैं। (वैसे याद दिला दूँ कि आज 9 सितंबर है और 23 मार्च 1988 को पाश अगर खालिस्तानियों की गोलियों का शिकार न हुए होते तो आज अपना 70वां जन्मदिन मना रहे होते।) 

अपने पहले निबंध की शुरुआत अरुंधति एक दिलचस्प घटना से करती हैं। एक बार जब कोलकाता में ‘द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ (मामूली चीजों का देवता) का पाठ करने गईं तो वहाँ एक मातृभाषा-प्रेमी ने (इस वजह से कि उन्होंने अपना यह उपन्यास अंग्रेजी में लिखा था) बड़ी तल्ख़ी से उनसे पूछा कि ‘क्या किसी लेखक ने कभी बेगानी भाषा में कोई कालजयी कृति लिखी है?’

ज़ाहिर है उसके इस सवाल ने तमाम मातृभाषा-प्रेमी बांग्ला-भाषियों का ध्यान अपनी ओर खींचा। लेकिन जब अरुंधति ने जवाब में व्लादिमीर नाबोकोव का नाम क्रुद्ध व्यक्ति के सामने रखा तो वह बिदक कर हॉल से बाहर चला गया क्योंकि उसे ख़बर होगी कि नाबोकोव ने अपने पहले 9 उपन्यास मातृभाषा रूसी में लिखे थे जिन्हें कोई पाठक नसीब नहीं हुआ था जबकि ‘लोलिता’ सहित कई उपन्यास उन्होंने अंग्रेजी में लिखे जिनका शुमार सर्वश्रेष्ठ कृतियों में होता है। 

इसी किताब में अरुंधति हमें याद दिलाती हैं कि कैसे अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने मोदी को ‘फादर ऑफ द नेशन’ (राष्ट्रपिता) कह दिया था जब कि यह पदवी पहले गांधी को हासिल थी। अरुंधति कहती हैं कि मैं गांधी की प्रशंसक तो नहीं हूं पर कम से कम मोदी के गले में यह तमगा शोभा नहीं देता। 

पाश भी अपने विद्रोही संकल्प को बड़े चुटीले अंदाज़ में सामने रखते थे। जेल में लिखी उसकी एक कविता की यह चार पंक्तियाँ हैं-

अब वक़्त आ गया है-

ताकि अपने आपसी सम्बन्धों का इक़बाल करें

और विचारों की लड़ाई 

मच्छरदानी से बाहर आकर लड़ें 

हत्या-सत्ता से खौफ़ज़दा बुद्धिजीवियों के लिए पाश के यह शब्द आज के हिंसक दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। पाश के जुझारू अंदाज़ में लिखने वालों में अरुंधति की यह किताब पता नहीं बुद्धिजीवियों को कितना झिंझोड़ पाएगी अलबत्ता सियारों की हुआं-हुआं सुनने को मिले तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। सत्ता के लिए बड़ी चुनौती की संभावना जिस युवा पीढ़ी से मिलने की उम्मीद की जा सकती है उसे तो हिन्दू-मुस्लिम के चक्रव्यूह में बांध कर अपने अतीत से ऐसा काट दिया गया है कि वह इस बात से भी अनभिज्ञ है कि 2002 में गुजरात में क्या हुआ था। इतालवी लोकतंत्रवादी सालविनी ने सही कहा था कि –‘घटनाओं को लेकर बढ़ती अनभिज्ञता अन्याय को मुख्य रूप से आश्रय देती है।‘

अरुंधति की यह किताब हमें याद दिलाती है 11 सितंबर के हमले से तीन सप्ताह बाद 7 अक्तूबर 2001 का वह मनहूस दिन। भाजपा के बाकायदा चुने हुए मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को हटा कर आरएसएस के आजीवन-सदस्य और उभरते हुए सितारा संघ-प्रचारक नरेंद्र मोदी की किस तरह ताजपोशी हुई और फ़िर गोधरा की प्रायोजित हिंसा में हजारों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

यह किताब हमें सूफ़ी शायर वली दक्क्नी/वली गुजराती की याद दिलाती है। जिसकी सैंकड़ों साल पुरानी मुक़द्दस दरग़ाह पर लाखों लोग हर साल सज़्दा करने जाया करते थे, मटियामेट कर दी गयी और उसके ऊपर चौराहा खींच दिया गया, जहां खड़ी होकर पवित्र गायें रोज गोबर करती हैं और जिसके ऊपर से हजारों वाहन आज भी दनदनाते हुए गुजरते हैं। 

के. आसिफ़ की मुगले-आज़म में बादशाह अकबर का एक संवाद था-‘हम अपने बेटे के धड़कते हुए दिल के लिए हिंदुस्तान की तकदीर नहीं बदल सकते’। लेकिन अपने एक चेले के मंत्री-पद के लिए मचलते हुए दिल के लिए आरएसएस ने 7 अक्तूबर को इस देश की तकदीर बदल दी। जरा सोचिए, आरएसएस ने उस दिन अगर केशुभाई को हटाकर मोदी को सत्ता सौंपने का वह फैसला न किया होता तो आज देश पर क्या औघड़ साधु-सपेरों और महंतों का राज होता? कम-अज़-कम लंपटों को ‘जय श्री राम’ का नारा लगाते हुए हम बेगुनाहों को क़त्ल करते हुए और इन क़ातिलों को मंत्रियों के हाथों सम्मानित होने के दृश्य हम कभी नहीं देखते। नहीं देखते गांधी के पुतले पर गोलियां दागते नेताओं को और सत्ताधारियों के मुंह से गोडसे का गुणगान तो नहीं ही सुनते।  

अरुंधति अपने बचपन से लेकर कई पड़ावों से गुजरीं अपनी जीवन यात्रा के लंबे सफर को याद करते हुए हमें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती हैं जब उनका पहला निबंध संग्रह ‘द एंड ऑफ इमेजिनेशन’ (कल्पनाशीलता का अंत) प्रकाशित हुआ था। उस पहले संग्रह से ही अरुंधति के परों की जुम्बिश और लंबी परवाज़ का अंदाज़ा लग गया था। जब वह लिखती हैं कि ‘पागलपन की इस हद का कोई क्या कर सकता है?

अगर आप किसी ऐसे पागलखाने में फँस गए हों जहां सारे डॉक्टर बावले हों तो आप क्या कर सकते हैं? इन पकटियों को पढ़ते हुए  कहानीकार सआदत हसन मंटो का याद आना स्वाभाविक है जब पागलखाने से सेहतयाब होकर लौटने के बाद एक पत्रकार ने उनसे पूछा था कैसा महसूस कर रहे हैं तो उनका जवाब था- छोटे पागलखाने से निकलकर बड़े पागलखाने में आ गया हूँ।

इस किताब का दूसरा निबंध है-‘इलेक्शन सीज़न इन ए डेंजरस डेमोक्रेसी’ (घातक लोकतन्त्र में चुनावी मौसम)। शीर्षक पढ़ते ही गोरख पाण्डेय याद आ जाते हैं और उनकी छोटी-सी कविता- 

इस बार दंगा बहुत बड़ा था
खूब हुई थी
ख़ून की बारिश
अगले साल अच्छी होगी
फसल
मतदान की

…..

वैसे यह निबंध 29 अगस्त, 2018 को पाँच बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी के खिलाफ़ दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में #मैं_भी_अर्बन_नक्सल के नारे के साथ दिया गया वक्तव्य है। किताब में शामिल निबंध हमें जस्टिस लोया की भी याद दिलाते हैं और बाबू बजरंगी की भी जिसे अदालत ने नरोदा पटिया के 97 मुसलमानों के क़त्ल का दोषी पाया था और जिसे आप यू ट्यूब पर कहते सुन सकते हैं कि उसे ‘नरेंद्र भाई’ ने कैसे जजों के साथ सेटिंग करके बचाया। इस किताब में फासीवादियों के संरक्षण में खड़ा कपिल मिश्रा ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को’ के नारे लगाता और आज़ाद घूमता दिखाई देता है। गृह मंत्री अमित शाह की हिंसक बाजीगिरी के भी दृश्य शामिल हैं। 

बेशक अभी तक किताब को मैं पूरी तरह तो नहीं पढ़ पाया हूँ पर एक सरसरी नज़र डालने पर यही जान पड़ता है कि कुल मिलकर अरुंधति की यह किताब, पिछले छह सालों में हुई बेशुमार हिंसा और दमन की बमबारी की अलग-अलग अंतहीन कहानियों के खिलाफ़ लिखा गया एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जो हमें नोटबंदी से लेकर नागरिकता संशोधन कानून तक के साये में दिये जा रहे आघात हन्ना आरंट के शब्दों में याद दिलाने की कोशिश करता है कि नागरिकता खुद हमें अधिकार हासिल करने का अधिकार देती है और हमें खुद के नागरिक होने के एहसास को किसी भी कीमत पर मरने नहीं देना है। यह साधु-सपेरों-महंतों की सरकार जो ‘आज़ादी’ जैसे पवित्र शब्द को राज-द्रोह के दायरे में ले आई है दरअसल हमें इसी फ़ासीवाद से आज़ादी वापस हासिल करनी है। फ़ासीवाद की बेड़ियों को तोड़कर ही हमें आज़ादी हासिल होगी और आज़ादी हासिल करने के लिए हमें फ़ासीवाद की बेड़ियाँ तोड़नी होंगी।  

अरुंधति रॉय को उनकी इस शानदार कृति के लिए बधाई। 

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल लुधियाना में रहते हैं।)

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This post was last modified on September 9, 2020 4:53 pm

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