मोदी-योगी सत्ता में मंदिर उद्योग क्या बने, बढ़ गयी भीख मांगने वालों की कतार

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उत्तर प्रदेश। विंध्यवासिनी देवी मंदिर के निर्माणाधीन दिव्य और भव्य गेट के ठीक नीचे दर्जन भर बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग हाथ फैलाये मंदिर आने जाने वाले हर श्रद्धालु से करुणा, दया और भीख की गुहार लगाते हैं। 331 करोड़ रुपये की लागत से विंध्यवासिनी देवी के मंदिर और यहां तक आने वाले मार्गों का कायाकल्प हो रहा है। पर इन 331 करोड़ रुपये के विकास में इन बेसहारा भिखारियों के लिए कहां जगह है इसकी योजना सरकार ने नहीं बनाई है।

विंध्याचल शहर मिर्ज़ापुर जिले का प्रमुख शहर है। इसकी मुख्य पहचान यहां मौजूद विंध्यवासिनी देवी का प्राचीन मंदिर है। मंदिर के आस-पास आबादी की बसावट बहुत ही सघन है। छोटी-छोटी संकरी गलियों में छोटी छोटी दुकानों का जाल सा बिछा हुआ है। इन्हीं संकरी गलियों से गुज़रकर व्यक्ति के मन में अपनी लघुता का बोध पनपता है और आस्था का संचार होता है। सबसे बड़ी बात की इन संकरी गलियों में चलने वाले हजारों दुकानों से हज़ारों परिवारों का पेट पलता आ रहा है।

लेकिन सूबे की योगी सरकार ने काशी विश्वनाथ की प्रचीन पहचान मिटाकर बनाये गये काशी कॉरिडोर की तर्ज़ पर विंध्यवासिनी मंदिर को भी भव्यता देने के लिए विंध्य कॉरिडोर की योजना पर काम युद्ध स्तर पर शुरु कर दिया है। जिसके तहत मंदिर के चारों ओर से आने वाले सभी रास्तों गलियों के चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण का काम शुरु किया गया है। तीन शिफ्टों में डेढ़-दो सौ मज़दूर रात दिन काम कर रहे हैं। सड़क के दोनों ओर 6-10 फुट तक दुकानों, मकानों को तोड़ दिया गया है। मंदिर तक आने वाली चारों दिशा में चार भव्य गेट का निर्माण हो रहा है। साथ इन चारों दिशाओं की सड़कों पर बसी दुकानों को उजाड़ दिया गया है।

निर्माणाधीन गेट के नीचे भिखारी

विंध्यवासिनी मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल 7 मार्ग हैं। थाना कोतवाली, न्यू वीआईपी, पुरानी वीआईपी, पक्का घाट, जैपुरिया गली, पाठक जी की गली, भट्ट जी की गली। इनमें से चार प्रमुख मार्गों पुरानी वीआईपी, थाना कोतवाली, न्यू वीआईपी और पक्का घाट की गली पर भव्य गेट का निर्माण कार्य ज़ोरों पर चल रहा है। इसके अलावा एक परिक्रमा पथ भी बनाया जा रहा है। परिक्रमा पथ पर 130 पिलर का निर्माण कराया गया है। 50 फिट का यह परिक्रमा पथ दो मंजिला बन रहा है। इसमें राजस्थान के अहरौरा के गुलाबी पत्थरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। केवल परिक्रमा पथ के निर्माण के लिए अनुमानित लागत 19 करोड़ 41 लाख रुपये का बजट आवंटित किया गया है।

वहीं मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट के तौर पर पेश किये जा रहे विंध्य कॉरिडोर प्रोजेक्ट की कुल लागत 331 करोड़ रुपये निर्धारित की गयी है। विकास पटेल की नारियल चुनरी प्रसाद की दुकान निर्माणाधीन गेट के अंदर विंध्यवासिनी देवी मंदिर से बिल्कुल सटा हुआ है। दरअसल वो ज़मीन मंदिर का ही है। किसी ने अपनी ज़मीन मंदिर को दान कर दिया था। जिसे मंदिर प्रबंधन ने एक छोटी सी दुकान के तौर पर विकास को किराये पर दे रखा है। गेट और परिक्रमा पथ का निर्माण पूरा हो जाने के बाद आप की दुकान बंद हो जाएगी तब कहां जाएंगे, क्या करेंगे। पूछने पर विकास उदास होकर कहते हैं तब जेब ज़्यादा ढीली करनी पड़ेगी और क्या।

वो बताते हैं कि बाहर सड़क के किनारे जो दुकानें हैं वहां ज़्यादा पैसा देकर किसी की दुकान किराये पर ले लेंगे। विकास पटेल के इस बात में एक आक्रोश निहित है। वो यह कि भव्यता और सौदर्यीकरण के इस प्रोजेक्ट में बची खुची दुकानों और जगहों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी जिससे इनका किराया बेतहाशा बढ़ेगा। ज़्यादा किराया होने पर छोटी पूंजी वाले लोगों की दुकानें बंद हो जाएंगी और उनकी जगह बड़ी पूंजी वाले लोग ले लेंगे। मंदिर के मुख्य गेट से लगी सड़कों को 25 फुट चौड़ा किया गया है। निर्माणाधीन भव्य गेट के बाहर मुख्य मार्ग पर सुनील कुमार यादव गमछा और प्रसाद की दुकान लगाते हैं वो बताते हैं चार महीने पहले तक वो 20 हजार रुपये महीना किराया देते थे।

विकास पटेल की दुकान

लेकिन तोड़फोड़ के बाद अब जगह खत्म हो गयी है। बहुत कम जगह बची है किसी तरह पन्नी डालकर दुकान चला रहे हैं। इसके एवज में 50 हजार रुपये महीने किराया देना पड़ता है। क्या इतनी कमाई हो जाती है कि आपका परिवार 50 हजार रुपये हर महीने दुकान का किराया वहन कर सके। जवाब में सुनील यादव बड़े व्यवहारिक ढंग से बताते हैं कि किसी महीने ज़्यादा पैसा आएगा किसी महीने कम आएगा। चार-छः महीने बैलेंस बनाकर चलना है। नफा-नुकसान का आकलन करके देखेंगे, अभी से क्या कहें।

सुनील के ठीक अपोजिट साइड में अभिषेक की दुकान है। वो महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधन और पत्थर के सिलबट्टे, चकली आदि घर के रोज़मर्रा के सामान बेचते हैं। सुनील भी बताते हैं कि तोड़-फोड़ के बाद ज़मीन के मालिक ने किराया बढ़ा दिया है। ऑफ सीजन में किराया निकालना मुश्किल हो रहा है। महीने का आखिर आते-आते सिरदर्द और टेंशन होने लगती है कि किराया कैसे देंगे। वहीं मंदिर तक आने वाली मुख्य पक्की सड़क हर शहरी सड़क की तरह दोनों तरफ दो मंजिला तीन मंजिला घरों से आबाद है। इन मकानों में पीछे लोग रहते हैं और आगे दुकानें लगती हैं। अधिकांश लोगों की खुद की दुकानें हैं।

बहुत कम लोग हैं जिन्होंने आगे का कमरा अन्य दुकानदारों को किराये पर दे रखा है। कुछ लोगों ने दूसरे-तीसरे मंजिले पर दूर दराज से आने और ठहरने वाले श्रद्धालुओं के लिए गेस्टरूम जैसा बना रखा है। मंदिर तक आने वाली इस सड़क को भी चौड़ी करने की योजना है। इसी सड़क पर विष्णु क्लॉथ भंडार नाम से कपड़े की दुकान चलाने वाले एक सज्जन दुकानदार पूछने पर उदास हो जाते हैं। मुआवजा भी तो दे रही है सरकार, पूछने पर वो कहते हैं क्या मुआवजा दे रही है। 6 हजार रुपये वर्ग फुट की दर से मुआवज़ा दिया जा रहा है। फिर उस मुआवजे से क्या मिलेगा। न दुकान मिलेगी, न जमीन मिलेगी। न रोटी कमाने का ज़रिया मिलेगा।

सुनील यादव की दुकान पर भक्त नरेंद्र तिवारी

अपने घर के आगे एक छोटे से खोखेनुमा कमरे में चाय की दुकान चलाने वाले पप्पू चाय छानते हुए बताते हैं कि अधिकांश लोगों के पास दो या तीन कमरे के मकान हैं। लेकिन जिनके पास दो ही कमरे का मकान है और आपने एक कमरा तोड़ दिया वो क्या करेगा। वो उसमें रहेगा कि दुकान चलाएगा। इसी सड़क पर पान की दुकान लगाने वाले मुन्नू सड़क चौड़ी करने की योजना से इत्तेफाक़ नहीं रखते हैं। वो कहते हैं कि शहर की पहचान, शहर की दुकानें, शहर के लोग ही उजड़ जायें ऐसी सनक किस काम की। वहीं दूसरे शहरों और जिलों से आये भक्तों और श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया भी मिली जुली हुई है।

गोरखपुर से आये एक अधेड़ उम्र के श्रद्धालु विंध्यावासिन देवी के मंदिर और विंध्याचल में हो रहे बदलाव से दुखी नज़र आये। वो कहते हैं कि विंध्याचल देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इसका मूल स्वरूप ही वास्तविक स्वरूप है। भक्तगण इसके उसी पुराने स्वरूप की श्रद्धा और भक्ति भावना में चले आते हैं। वो आगे कहते हैं कि जो भक्त है, तपस्वी है, श्रद्धालु है वो जानते हैं कि देवीधाम पहुंचने का अर्थ तपस्या करना है, कष्ट सहना है। इसीलिए तो तमाम प्राचीन देवी मंदिर पहाड़ों पर स्थित हैं। बुजुर्ग अपना गुस्सा ज़ाहिर करते हुए कहते हैं कि सरकार देवी के स्थान से नहीं लोगों की आस्था से खिलवाड़ कर रही है।

जौनपुर से ही आयी एक अधेड़ महिला जिनका नाम शान्ति देवी है वो कहती हैं कि प्राचीन देवी मंदिर जो देश के करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है उसे पिकनिक स्पॉट या टूरिस्ट प्लेस में बदल देना लोगों की आस्था पर चोट करना है। वो दलील देती हैं कि सरकार को धार्मिक टूरिस्ट प्लेस ही बनाने हैं तो नये मंदिर बनाकर उसे पिकनिक स्थल के रूप में विकसित करे। पैसे वाले एलीट लोगों की सुविधा के लिए उनकी लक्जरी कारों को सीधे मंदिर के दरवाजे तक पहुंचाने के लिए हिंदू समुदाय की आस्था पर चोट करना ठीक नहीं है।  

मुख्य सड़क जिसके किनारे घरों को टूटना है

वहीं नये उम्र के सुविधापसंद श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया इससे अलग है। प्रयागराज जिले के निवासी नरेंद्र तिवारी इसे ‘फैंटास्टिक’ बताते हुए कहते हैं कि इससे नवरात्रि के दिनों में उमड़ने वाली भीड़ को हैंडिल करने में सहूलियत होगी। मंदिर को भव्यता मिलेगी तो इससे देशी के साथ साथ विदेशी दर्शक भी खिंचे चले आएंगे। विंध्याचल का नाम देश के साथ साथ विदेश के नक्शे पर भी दूर से ही चमचमाता दिखेगा।

(मिर्जापुर से सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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