Monday, August 8, 2022

ग्राउंड रिपोर्ट: अबूझमाड़ के मूल निवासियों को शहर आने पर कभी भी गिरफ्तारी की रहती है आशंका

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नारायणपुर। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ में रहने वाले मूल निवासियों को शहर आने पर सुरक्षाबल के जवान कथित तौर पर जेलों में भरने का काम कर रहे हैं। यह आरोप नारायणपुर जिले के ओरछा ब्लॉक में स्थित ग्राम पंचायत कोड़नार और धुरबेड़ा के युवाओं ने लगाया है।

आलम यह है कि बालक आश्रम में रसोइया का काम करने वाले एक युवा ने इस डर से पिछले एक साल से अपनी तनख़्वाह नहीं निकाली है और न ही उसने अपने खाते में जमा हुए मेहनताना का जायज़ा लिया है।

उसका कहना है कि वह अगर अपना वेतन निकालने शहर जाएगा तो उसे पुलिस नक्सली या फिर उनके समर्थक होने के आरोप में जेल भेज देगी। इसलिए वह शहर आकर अपनी पगार नहीं निकालता। लेकिन वह अपना काम रोजाना पूरी ईमानदारी से करता है। आख़िर उसके अपने और आस-पास गांवों के 35 बच्चे आश्रम में रहकर अपनी पढ़ाई कर रहे हैं।

शहर जाते-जाते जेल पहुंचने वाले युवाओं में आश्रम के रसोइया ही नहीं हैं। इस इलाके में रहने वाले हर दूसरे युवा की कुछ ऐसी ही कहानी है। वहां के युवाओं ने चौंकाते हुए बताया है कि; कई बार वे अपने गांव-घर में परिवार जनों के साथ बैठे हुए होते हैं। अचानक सुरक्षाबल के जवान उनके गांव में दाखिल होते हैं और उन्हें उनके परिवार वालों के सामने से नक्सली या फिर उनका समर्थक बताते हुए अपने साथ शहर ले जाकर जेल में डाल देते हैं।

कमलू

ओरछा ब्लॉक के ग्राम कोड़नार में अपनी पत्नी और चार बेटियों के साथ रहने वाले पांडु बताते हैं कि; वह साल 2018 में एक रोज़ दोपहर में अपनी पत्नी और बेटियों के साथ बैठे हुए थे। इस दौरान सर्चिंग में आए जवान उसे अपने साथ उठाकर ले आए। पांडु के मुताबिक; जवानों ने उस पर नक्सली होने का आरोप लगाया था और उसे नारायणपुर में 5 दिनों तक शारीरिक प्रताड़ना देते हुए पूछताछ की थी। इसके बाद कोर्ट में पेशकर उसे जगदलपुर जेल भेज दिया गया था।

पांडु आगे बताते हैं कि; एक साल जेल में रहने के बाद उसे कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाते हुए दोषमुक्त कर दिया। बेक़सूर होते हुए भी पांडु को जेल में सजा भुगतनी पड़ी सो अलग उसे पेशी में हुए खर्च के लिए अपनी गाय और रिश्तेदारों और परिचितों से क़र्ज़ लेना पड़ा सो अलग। उसका कहना है; वह अभी भी तीन साल बाद भी क़र्ज़ से नहीं उभर पाया है।

ग्राम पंचायत धुरबेड़ा में स्थित बालक आश्रम के रसोइया कमलू बताते हैं कि; एक वर्ष पहले वह अपना वेतन निकालने के लिए अपने गांव के ही एक युवक के साथ नारायणपुर के लिए निकले थे। लेकिन नारायणपुर के मार्ग में पड़ने वाले सुरक्षा कैम्प में उन्हें हिरासत में ले लिया गया। एक हफ़्ते तक उनसे हल्की मारपीट से लेकर थर्ड डिग्री शारीरिक प्रताड़ना की गई। उन पर नक्सली समर्थक होने का आरोप लगाया गया। इसके बाद उन्हें छोड़ दिया गया। छूटकर लौटने के बाद दोबारा कमलू और उसके साथी ने शहर की ओर जाने की हिम्मत नहीं की।

कमलू बताते हैं कि; आदिम जाति कल्याण विभाग की ओर से हर माह उनके खाते में पैसे जमा हो रहे हैं। पर वह अपने मेहनत की कमाई नहीं निकाल पा रहा है। फिर भी वह निरंतर अपने काम पर आता है और आश्रम में रहकर पढ़ने वाले बच्चों को खाना बनाकर खिलाता है। वह बच्चे उसके गांव और आस-पड़ोस में रहने वाले गांव के हैं। इसके अलावा वह अपने परिवार को पालने के लिए अनाज उगाता है और वनोपज का सहारा लेता है।

कमलू के साथ ही रसोइया का काम करने वाले कौशल कुमार धुरवा बताते हैं; डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) उनके गांव में आकर मारपीट की घटना को अंजाम देते हैं। वे नक्सली केस बनाकर यहां के लोगों को जेल में ठूंस देते हैं। कौशल कुमार आगे बताते हैं कि: उन्हें भी डीआरजी की टीम घर से उठा ले गई थी। इतना ही नहीं इसका विरोध करने वाले उनकी पत्नी के साथ डीआरजी की टीम ने मारपीट भी की। कौशल के अलावा डीआरजी ने उनकी छोटी बहन और धुरबेड़ा के ही युवक फागू को भी जवान अपने साथ ले गए थे। कौशल ने बताया कि नारायणपुर में 9 दिनों तक पूछताछ के बाद उसे दो साल के लिए फर्जी नक्सली प्रकरण में आरोपी बनाकर जेल भेज दिया गया।

कौशल धुरवा के मुताबिक; गांव में ऐसे दर्जन भर लोग हैं, जिन्हें सुरक्षाबल के जवान नक्सली बताकर जेल में डाल चुके हैं। इसलिए वे अब नारायणपुर शहर जाने से परहेज करते हैं और गांव में ही बड़े सीमित संसाधनों के साथ अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

पांडु

अबूझमाड़ ही नहीं इन इलाकों में भी युवाओं को गांव के बाहर निकलने पर पुलिस करती है गिरफ्तार

यह मसला केवल और केवल अबूझमाड़ का नहीं है। बस्तर के प्रत्येक जिले में अंदरूनी गांवों के युवाओं के साथ पुलिस इसी तरह का व्यवहार करती है। उनके शहर आने पर सुरक्षा बल उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज देते हैं। इस तरह के मामले में उन इलाकों में ज्यादा पाए जाते हैं, जहां नक्सलियों का प्रभाव अधिक है। ऐसे में बस्तर के अंदरूनी इलाकों में रहने वाले लोग आज़ादी के 70 बरस बीत जाने के बाद भी पुलिस और नक्सलियों के बीच पिस रहे हैं, जिनकी सुनने वाला कोई नहीं है।

कांग्रेस के घोषणा पत्र में था वादा, फर्जी गिरफ्तारी पर होगी रोक और जेल में बंद आदिवासी होंगे रिहा

बस्तर के अंदरूनी गांव में रहने वाले मूल निवासियों को नक्सली बताकर जेल में ठूंस देने का सिलसिला भाजपा की रमन सरकार से चला आ रहा है। इस तरह की घटना न उस वक़्त थमी थी और न अब थमी है। लेकिन यह मसला बस्तर में वोट बैंक की खातिर राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है। रमन सिंह के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस इस मसले को गंभीरता से उठाती थी। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने फर्जी नक्सली मामले में बंद आदिवासी को जेल से निकालने और फर्जी प्रकरणों पर रोक लगाने का वायदा की थी। पर सत्ता में आये कांग्रेस को साढ़े तीन साल से भी अधिक का वक्त हो गया, लेकिन न तो फर्जी नक्सली प्रकरण में कोई कमी आयी और न ही नक्सल प्रकरण में जेल जाने वाले आदिवासियों की रिहाई हुई। पर हां इस बहाने सरकार ने छः महीनों में छूट जाने वाले जुआ, सट्टा और अवैध नशे के कारोबार के आरोप में जेल बंद आदिवासियों को जरुर जेल से बाहर निकलवाने का काम किया।

(बस्तर से श्रीकांत बाघमारे की रिपोर्ट।)

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