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जनता के ऊँट में निर्मला का जीरा: भारत ने प्रतिव्यक्ति 1200 और अमेरिका ने दिया 4.55 लाख रुपये

मोदी सरकार ने गरीबों के लिए 1.70 लाख करोड़ के पैकेज का कुछ उसी तरह ऐलान किया है जैसे बजट में सब्जबाग दिखाए जाते हैं। पूरे देश में लगभग 75 फीसद आर्थिक गतिविधियाँ ठप हैं क्योंकि लॉकडाउन चल रहा है। ऐसे में मनरेगा के काम भी बंद हैं। फिर वित्तीय वर्ष का अंतिम समय चल रहा है जिसमें मनरेगा के लिए नया फंड नहीं मिला है। ऐसे में जब फंड ही नहीं है और लॉकडाउन की स्थिति में किसी भी तरह का काम मनरेगा के तहत नहीं हो रहा तो मनरेगा मज़दूरी में किया गया इज़ाफा महज़ प्रतीकात्मक है। क्योंकि जब तक उन्हें कोई काम ही नहीं दिया जाएगा तो उन्हें  किसी भी तरह की मज़दूरी नहीं मिलेगी और नतीजतन उन्हें कोई फायदा नहीं  मिलेगा।

मनरेगा के तहत मज़दूरी में महज़ बीस रुपये की बढ़ोत्तरी की गई। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने दावा किया कि ग्रामीण इलाकों में हर मज़दूर को इससे दो हज़ार रुपये मिलेंगे, लेकिन यह दावा फ़र्ज़ी है। दरअसल यह दो हज़ार रुपये तब मिलेंगे, जब पूरे 100 दिनों तक काम मिलता रहेगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़, इस साल औसतन एक मज़दूर को 48 दिन का काम मिल रहा है। पिछले साल यह औसत 51 था। पिछले कुछ सालों से यह आंकड़ा इसी के आसपास घूमता है। इसलिए यह संभव ही नहीं है कि मज़दूरों को दो हज़ार रुपये की अतिरिक्त आय होगी। फिर आय जब होगी तब होगी, फिलहाल तो मनरेगा में कोई काम ही नहीं चल रहा है।

इसके पहले सीतारमन ने दावा किया था कि ”ग़रीब कल्याण योजना” नाम के इस पैकेज में 1.7 लाख करोड़ रुपये ख़र्च किए जाएंगे। इसमें 80 करोड़ लोगों को लाभ मिलेगा और इसे तुरंत लागू किया जाएगा। इस पैकेज के तहत मनरेगा की मज़दूरी 182 रुपये से बढ़ाकर 202 रुपये कर दी गई, इनकम सपोर्ट स्कीम के तहत दर्ज सभी किसानों को 2000 रुपये दिए जाएंगे, जन धन योजना अकाउंट होल्डर महिला को तीन महीने तक 500 रुपये प्रति महीने के हिसाब से पैसा दिया जाएगा, ग़रीब विधवा-विक्लांगों और बुजुर्ग लोगों को एकमुश्त एक हज़ार रुपये दिए जाएंगे, उज्जवला का लाभ लेने वालों को फ्री सिलेंडर उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके अलावा कुछ दूसरे उपाय भी किए गए हैं।

इसी तरह इनकम सपोर्ट स्कीम के तहत दर्ज सभी किसानों को 2000 रुपये दिए जाने की बात वित्त मंत्री ने की और कहा कि किसानों के लिए 17,380 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि ज़ारी  की जा रही है। दरअसल यह भी पूरी तरह छलावा है। वास्तव में प्रधानमन्त्री किसान योजना के तहत  यह पहले से ही 2020-21 के लिए बजट में है, लेकिन सरकार 2,000 रुपये के पहले किश्त के भुगतान का फ्रंट-लोडिंग कर रही है। पीएम किसान योजना के तहत बजट में प्रति किसान 6,000 रुपये का बजट है।

फिलवक्त देश के अलग-अलग हिस्सों में गेहूं, सरसों और विभिन्न दालों की फसल पक कर कटने के लिए तैयार हैं या अगले दो हफ़्तों में तैयार हो जाएंगी। लॉकडॉउन का मतलब है कि किसान ज़रूरी संख्या में मज़दूरों से काम नहीं ले पाएंगे, न ही अपने दोस्तों और परिवारों को फ़सल काटने के लिए ले जा पाएंगे। तो किसान क्या करें? खड़ी फ़सल को सड़ने के लिए छोड़ दे? वह ऐसा कभी नहीं होने देंगे, फसल उनके खून से उपजाई हुई होती है। अगर किसान फसल काट भी लेते हैं, तो उन्हें आगे थ्रेसिंग और फटकने जैसी क्रियाएं भी करनी होंगी। इसके बाद उन्हें स्थानीय मंडियों या व्यापारियों तक पहुंचाना होगा। वह लॉकडॉउन में ऐसा कैसे करेंगे? किसानों के लिए एक सही राहत यह होती कि सरकार सीधे गांवों या उनके समूहों से फ़सल ख़रीदती। पंजाब में कई बार इसी तरीक़े से गेंहू की ख़रीद की जाती है। इसी तरह अंगूर की फसल पक कर तैयार है और लॉकडाउन के कारण सड़ने को अभिशप्त हो गयी है।

वित्तमंत्री के राहत पैकेज में कहा गया है कि निर्माण क्षेत्र से जुड़े 3.5 करोड़ रजिस्टर्ड वर्कर जो लॉकडाउन की वजह से आर्थिक दिक्कतें झेल रहे हैं, उन्हें मदद दी जाएगी। इनके लिए 31000 करोड़ रु. का फंड रखा गया है। यह भी शब्दों की बाजीगरी है। दरअसल निर्माण श्रमिकों के लिए पैसा भी सरकार को अतिरिक्त उधार लेने की आवश्यकता नहीं है। निधि का कोष वास्तव में निर्माण और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा एक प्रतिशत उपकर से प्राप्त होता है, जैसा कि भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण उपकर अधिनियम, 1996 के तहत अनिवार्य है। राज्यों और संघ शासित प्रदेशों ने 45,473.1 करोड़ एकत्र किए थे। और 30 सितंबर, 2019 तक 17,591.59 करोड़ रुपये खर्च किए। इस तरह इसमें लगभग 28 हजार करोड़ सरकारी खजाने में बचे हुए हैं ।

दरअसल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा कमजोर वर्गों, किसानों, महिलाओं, निर्माण श्रमिकों, वरिष्ठ नागरिकों, विधवाओं और विक्लांगों के लिए घोषित 1.7 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज भारत के जीडीपी के 1 प्रतिशत से कम है।इसे भूल भी जाएं तो असल मुद्दा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए मौद्रिक हस्तांतरण की तात्कालिकता का है, जिन्होंने न केवल अपनी नौकरी और आय खो दी है, बल्कि जिन्हें एक बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

इस राहत पॅकेज में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों जैसे धोबियों, रिक्शा चालकों, नाइयों, ग्रामीण मजदूरों, आदि की कोई योजना है, भले ही वे राज्य सरकारों के साथ पंजीकृत हों। इसमें उन निर्माण श्रमिकों के लिए जो राज्यों के साथ पंजीकृत नहीं हैं के लिए भी कोई राहत नहीं है। इन दोनों श्रेणी के कामगार किसी भी भुगतान के लिए पात्र नहीं होंगे।

गौरतलब है कि भारत सरकार इस पैकेज के जरिए एक नागरिक पर औसतन करीब 1200 रुपए खर्च करेगी। यह पैकेज अमेरिकी राहत पैकेज के एक दिन बाद आया है। बुधवार को अमेरिकी संसद सीनेट ने कोरोना संकट के बीच देश के करीब 30 करोड़ लोगों के लिए 2 ट्रिलियन डॉलर (151 लाख करोड़ रुपए)  का राहत पैकेज जारी किया था। इसके जरिए ट्रम्प सरकार एक नागरिक पर औसतन 4.55 लाख खर्च करेगी। यह अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा राहत पैकेज है। भारत सरकार का राहत पैकेज अमेरिका की तुलना में कहीं नहीं ठहरता है।अमेरिकी राहत पैकेज की तुलना में भारत का पैकेज महज 1.1 फीसद है। भारत सरकार राहत पैकेज के जरिए एक नागरिक पर औसतन 1200 रुपए खर्च करेगी जबकि अमेरिकी सरकार पैकेज से एक नागरिक पर औसतन 4.55 लाख खर्च करेगी।

अमेरिका का राहत पैकेज सबसे बड़ा (151 लाख करोड़ रुपए या 2 लाख करोड़ डॉलर) है। वहीं, अगर देशों की आबादी और प्रति व्यक्ति मदद के हिसाब से देखें तो कतर का पैकेज सबसे बड़ा हो जाता है। करीब 28 लाख की आबादी वाले कतर ने 2300 करोड़ डॉलर का पैकेज जारी किया है। इस तरह यह पैकेज प्रति व्यक्ति 8214 डॉलर (करीब 6.18 लाख रुपए) का हो जाता है। इसके बाद जर्मनी (5.48 लाख रुपए) का नंबर आता है। यूरोपियन यूनियन ने सदस्य देशों के लिए 82,000 करोड़ डॉलर का पैकेज जारी किया है। फ्रांस सहित ईयू के कई देशों ने अपने यहां अलग पैकेज भी दिए हैं।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on March 27, 2020 6:19 pm

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