ग्राउंड रिपोर्ट: बीमारी और महंगाई ने छीना दिवाली पर बाज़ारों की रौनक 

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प्रयागराज। घर में बीमारी, जेब में महंगाई , सूना त्योहार, सूना बाज़ार। यही इस साल की दीपावली त्योहार का दृश्य है। बाज़ार में पटाखों, मूर्तियों, सजावटी सामानों, मिठाइयों की दुकानों के सामने ग्राहकों की भीड़ नहीं महंगाई और बीमारी का सन्नाटा है। पांच दिवसीय त्योहार के पहले तीन त्योहार यानि धनतेरस, नर्क चतुर्दशी और दीपावली में बाज़ार से लोगों की रौनक एक सिरे से ग़ायब है। 

प्राची हॉस्पिटल के जनरल वॉर्ड में अपने  मरीज को लेकर भर्ती फाफामऊ के प्रमोद कुमार दुखी गले से दर्द दबाकर कहते हैं जब घर का कोई प्राणी अस्पताल में पड़ा हो तो क्या दिवाली और क्या फगुआ भाई। हां बच्चों के लिये भले ही मन मारकर कोई कुछ कर दे लेकिन खुशी मन का त्योहार होता है दुखी मन का नहीं। 

मरीज़ की तीमारदारी में लगी एक नर्स को जब मरीज़ ने हैप्पी दिवाली बोला तो उसके चेहरे पर मुस्कान की सप्तपर्णी खिल उठी। वो थोड़ा भावुक होकर बोली – सुबह तीन चार मरीजों से हैप्पी दिवाली बोली किसी ने रिस्पांस नहीं किया तो बहुत बुरा लगा कि मैं बेवजह ही बोले जा रही हूँ। नर्स आगे कहती हैं कि हम भी समझते हैं कि मरीज़ बीमार है तकलीफ़ में हैं तभी तो हॉस्पिटल में हैं। बोलने-चालने का आशय उसके मानसिक तनाव और अवसाद को तोड़ना है। 

गौरतलब है कि इस समय इलाहाबाद समेत आस पास के विभिन्न जिलों में डेंगू, मलेरिया, टायफाएड, चिकनगुनिया और वाइरल बीमारियों का प्रकोप फैला हुआ है। गंगा किनारे के गांव, शहरों और बस्तियों में तो घर-घर में बीमारी का राज है। क्या सरकारी, क्या प्राइवेट। अस्पतालों में वॉर्ड और कमरों में जगह नहीं है। गलियों में बेड डालकर मरीजों को भर्ती किया जा रहा है। 

वहीं किसानों की दिवाली फसल देखकर खिलती है। अक्टूबर महीने की शुरुआत में आंधी के साथ हुई मूसलाधार बारिश ने धान की फसल को बहुत नुकसान पहुंचाया है। पूरी की पूरी पकी हुई फ़सल गिरकर चौपट हो गई है। रामबली अपने खेत के गिरे हुये धान की फ़सल को दिखाते हुए कहते हैं कि जाने कौन सनकी ये कह गया है कि – ‘धान गिरे धनवाने के, गेंहू गिरे अभागे के। धान की फ़सल भी गिर जाती है तो चौपट हो जाती है। रामबली अपने दुख के सिरे को पकड़ते हुये बताते हैं कि पिछले तीन साल से यही हो रहा है जब धान की बालियां पकने को होती हैं या पककर कटने के लिये तैयार होती हैं ठीक उसी समय कई-कई दिनों तक बारिश और आंधी आकर किसानों की उम्मीदों, को मटियामेट कर देती हैं। 

राहुल यादव इकॉम एक्सप्रेस में कार्यरत हैं और फ्लिपकार्ट, एमेजोन, मिंट्रा, एजियो, टाटा क्लिक, मीशू आदि ई कॉमर्स कंपनियों के लिये सामानों को घर-घर पहुंचाने का काम यानि होम डिलीवरी करते हैं। इस साल कैसा रिस्पांस है दीपावली पर ऑनलाइन ख़रीददारी का पूछने पर राहुल यादव बताते हैं कि बीते वर्षों की अपेक्षा कुछ नरम है। सामान्य दिनों में ऑनलाइन शॉपिंग की तुलना में दीपावली सेल के बावजूद ऑनलाइन शॉपिंग में बहुत ज़्यादा इजाफ़ा नहीं हुआ है।

राहुल बताते हैं कि कोरोना के बाद से कमोवेश यही स्थिति बनी हुई है। आपको क्या लगता है, क्या कारण है, इसके पीछे। पूछने पर राहुल बताते हैं कि लोगों के पास पैसा नहीं है। कोई सामान 100 रुपये के बजाय 50 रुपये में मिल रहा है, लेकिन यदि मेरी जेब बिल्कुल खाली है तो मैं उसे नहीं खरीदूंगा भले ही आप 50% की छूट दें या 80% की। वहीं अगर मेरे जेब में 500 रुपये हों तो मैं 100 रुपये देकर भी वस्तु को उसके मूल दाम में ही ख़रीद लूंगा, तो कुल मिलाकर मामला अपनी जेब के रुपये का है। 

बता दें कि नवरात्र व दशहरा पर (23-30 सितंबर) फ्लिपकार्ट पर ‘बिग बिलियन डेज’ की सेल्स और एमेजोन पर  ‘ग्रेट इंडियन फेस्टिवल’ के नाम से और फिर दीपावली सेल (19-23 अक्टूबर) के दरम्यान किसी न किसी नाम से पिछले एक महीने से लगातार चल रहा है। अभी कल 12 बजे रात ‘बिग दिवाली सेल’ ख़त्म होने के बाद फ्लिपकार्ट आज ‘हर दिन उत्सव’ टैग लाइन के साथ अपनी साइट पर हर चीज उसी दाम और छूट के साथ बेंच रहा है जिस छूट के साथ उसने ‘बिग बिलियन डेज’ और ‘बिग दिवाली सेल’ पर बेंचा है। यानि मामला बहुत साफ है ई कॉमर्स साइट पर इस साल उस तरह से दिवाली बिक्री नहीं हुई है। 

वहीं ज़मीनी ख़रीदारी की बात करें तो धनतेरस पर बर्तनों की बिक्री के बाबत पूछने पर थरवई बाज़ार में बर्तन की दुकान लगाने वाले तुलसीराम ठठेरी बताते हैं कि लोग चम्मच या एक गिलास या एक कटोरी ख़रीद कर ले गये हैं। किसान के पास न पैसा है, न गल्ला (अनाज), तो बर्तन ख़रीदे कहां से। किसान बताते हैं वो इस धनतेरस पर कोई बर्तन नहीं ख़रीदे सिर्फ़ एक झाड़ू ख़रीदकर लाये। लोक समाज में झाड़ू को लक्ष्मी माना जाता है। 

(प्रयागराज से जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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