Friday, January 21, 2022

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जीत गया लोकतंत्र, हार गयी तानाशाही

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लोकतंत्र आज एक बार फिर जीत गया। लोकतंत्र की वह डोर जो छूटती जा रही थी जनता ने आज फिर से उसे मजबूती से पकड़ ली। सत्ता की तमाम संस्थाएं जब अपनी जवाबदेहियों से पीछे हट रही थीं और एक के बाद एक संसद में विधेयकों के जरिये जनता से उसके अधिकारों को छीना जा रहा था तब किसानों ने आकर अपनी एड़ी लगा दी। वह संसद जो जनता के सशक्तीकरण के लिए बनी थी और उसका काम जनता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना था उसने एकाएक चेहरा बदल कर चंद पूंजीपतियों के हितों में काम करना शुरू कर दिया। यह इतिहास के पूरे चक्र को ही पलटने सरीखा था। जिस तरह से संसद के भीतर कृषि कानूनों को तमाम विपक्ष की आवाजों को दबाकर बलात तरीके से पारित कराया गया। मानो वह कारपोरेट की सत्ता पर कू हो। एक तरह से सत्ता के नेतृत्व में लोकतंत्र का वह तख्तापलट था जिसके जरिये देश पर कॉरपोरेट के कब्जे का खुला आगाज किया गया हो। लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी यहीं मात खा गए। इस बात का उन्हें ज्ञान नहीं था या फिर इसकी उनको समझ नहीं थी कि किसान अपनी जमीन से कितना प्यार करता है? 

वह एक गट्ठा जमीन के लिए खड़े-खड़े अपनी कुर्बानी दे देता है लेकिन जमीन नहीं जाने देता। और यहां तो संगठित तरीके से सत्ता के संरक्षण में कारपोरेट के कब्जे का पूरा अभियान था जिसमें संसद से बाकायदा कानून पारित करा कर उसे संवैधानिक तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा था। ऐसे में किसानों के पास सड़क पर उतरने और जीवन-मरण के रास्ते से होकर गुजरने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था। किसानों ने इस काम को भरपूर तरीके से अंजाम दिया। पिछले एक साल के भीतर केंद्रीय सत्ता और किसानों के बीच यह अपने तरीके का युद्ध था। जिसे सड़क पर लड़ा जा रहा था। किसानों ने इस लड़ाई में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। पंजाब के रास्ते हरियाणा और फिर दिल्ली तक पहुंचने में उसे जिन हालातों से गुजरना पड़ा वह किसी हिमालय की चढ़ाई से कम नहीं था। सत्ता कदम-कदम पर उसके रास्ते में रोड़े अटका रही थी। लेकिन किसानों ने भी जैसे कसम खा ली हो। जांबाज नौजवान जब अपने ट्रैक्टरों को हथियार बनाकर आगे बढ़े तो पुलिस और सुरक्षा बलों के सारे पैंतरे धरे के धरे रह गए। रास्ते में पड़ने वाले सैकड़ों बैरिकेट्स को तोड़ते हुए देखते ही देखते किसान राजधानी पहु्ंच गए। और उन्होंने चारों तरफ से उसे घेर लिया। लेकिन यह क्या जो दिल्ली देश की राजधानी है। जिस पर हर किसी का बराबर हक है। जितना सत्ता की है उससे ज्यादा जनता की।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। लेकिन उसी जनता को दिल्ली में घुसने की इजाजत नहीं दी गयी। फिर क्या था किसानों ने भी बॉर्डर पर ही मोर्चा खोल दिया। और फिर पिछले एक साल में उन्होंने लू के थपेड़ों, सर्दी की गलन और बारिश की बौछारों को झेलते हुए जिस तरह से इस आंदोलन को राष्ट्रव्यापी बनाया वह अपने आप में इतिहास बन गया है। इस बीच सत्ता ने उसे झुकाने और धराशाही करने के लिए हर तरह के षड्यंत्र का सहारा लिया। लेकिन किसानों ने न केवल उसके षड्यंत्रों को नाकाम किया बल्कि तुर्की ब तुर्की उसके सारे सवालों का जवाब देता रहा। लाक्षणिक रूप से कहा जाए तो किसानों के लिए यह सत्ता किसी बिगड़ैल बैल की तरह थी। और यह बात हमें नहीं भूलनी चाहिए कि किसानों को बिगड़ैल से बिगड़ैल बैल को भी ठीक करने की महारत हासिल होती है। मौजूदा बिगड़ैल सत्ता के साथ भी उन्होंने यही किया। उसे चौतरफा नथ दिया। फिर क्या था वह किसानों के सामने झुकने के लिए मजबूर हो गयी। उसके पास शायद अब इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था। क्योंकि चुनाव-दर चुनाव किसान आंदोलन बीजेपी की लुटिया डुबो रहा था। ऐसे में किसी भी चुनाव में जाने से पहले किसान उसके सामने खड़े हो जाते थे। और उनका उसके पास कोई जवाब नहीं होता था।

किसानों ने अभी तक सत्ता को न केवल तीनों कानूनों को वापस लेने के लिए मजबूर किया है बल्कि इस दौरान अपने खिलाफ दर्ज हुए सारे मुकदमों को वापस लेने और एमएसपी की गारंटी को जारी रखने की बात भी उसने मनवा ली है। इसके साथ ही एमएसपी पर कानून बनाने के लिए कमेटी के गठन के प्रस्ताव को पारित कराने में भी वह सफल रहा है। इस कमेटी में किसान मोर्चा के लोगों को भी सदस्य के रूप में शामिल करने की बात कही गयी है। और अगर किसान एमएसपी एक्ट बनवाने में सफल हो गए तो फिर यह देश के सभी किसानों के लिए अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि साबित होगी।

लेकिन यह आंदोलन इन मांगों से इतर एक बड़ी भूमिका निभा रहा था। वह था लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष। जैसा कि मैंने ऊपर बताया एक के बाद एक जब अधिकार छीने जा रहे थे तब उसने न केवल उस प्रक्रिया को रोका बल्कि उसकी पूरी धारा ही पलट दी। और छीने गए अधिकारों की पुनर्बहाली का रास्ता साफ कर दिया। और इसका नतीजा यह है कि दूसरे तबके भी अब अपने अधिकारों को लेकर न केवल जागरूक हो गए हैं बल्कि अपने हकों की लड़ाई को जीतने का उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा हो गया है। वह इस उम्मीद और भरोसे से लबालब हैं कि कोई भी लड़ाई जीती जा सकती है सत्ता चाहे कितनी ही क्रूर और अत्याचारी हो। उसको दबाया और झुकाया जा सकता है। जनता की ताकत के आगे कॉरपोरेट की थैली बौनी हो जाती है। 

दरअसल किसान आंदोलन ने कुछ और नहीं बल्कि अपने इतिहास की जड़ों को ही तलाशने की कोशिश की है। आज़ादी की लड़ाई की सफलता का बुनियादी सूत्र ही जनता की गोलबंदी थी। अधनंगा फकीर सर्वशक्तिमान अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ न केवल जनता की ताकत के सहारे खड़ा हुआ बल्कि उसे हर मोर्चे पर धूल चटाया। और देश की यह विरासत आज़ादी मिलने के साथ ही समाप्त हो गयी अगर कोई ऐसा सोचता है तो उस पर सिर्फ तरस ही खाया जा सकता है। जनता इतिहास की जिस चेतना से गुजर चुकी होती है उसकी आने वाली पीढ़ी उससे आगे बढ़ी होती है। ऐसे में इस देश के भीतर तानाशाही लागू करने के मंसूबे पालने वालों को हमेशा इस बात को याद रखना चाहिए कि देश में लोकतंत्र केवल शब्द नहीं बल्कि एक स्थायी सच है जो लोगों की जेहन का हिस्सा बन गया है। और जो भी उसे खारिज करने या फिर समाप्त करने की कोशिश करेगा वह खुद देश से खारिज हो जाएगा।

यह आंदोलन एक और मामले में तमाम आंदोलनों से अलग है। जो दुनिया के स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहा है। अभी तक नवउदारवादी व्यवस्था के खिलाफ हुए आंदोलनों ने इस तरह की कोई जीत हासिल नहीं की थी। यह बात सही है कि लैटिन अमेरिका समेत तमाम देशों में सरकारें ज़रूर बदली हैं लेकिन कोई आंदोलन ऐसा हो जो अपने दौर की सरकार को इस तरह से झुकाने में कामयाब रहा हो ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती। भारत के किसानों ने वह दर्जा हासिल कर लिया है। जिसमें वह अब एक स्थायी प्रेशर ग्रुप में तब्दील हो गया है। और आने वाले समय में अगर सत्ता फिर से कोई गलत रास्ता अख्तियार करती है तो वह एक बार फिर सिर उठाकर उसके सामने खड़ा हो जाएगा। और वैसे भी किसी एक ताकत से हारने वाली सत्ता दोबारा उसका सामना करने का नैतिक साहस नहीं जुटा पाती है। ऐसे में जनता की इच्छा के अधीन रहना अब सत्ता की मजबूरी हो गयी है और यही असली लोकतंत्र होता है। जिसमें सब कुछ जनता के लिए होता है। 

किसानों के आंदोलन की अगर कोई समीक्षा की जाएगी या फिर उसके जीत को याद किया जाएगा तो उसका श्रेय उसके केंद्रीय नेतृत्व को दिए बगैर अधूरा रहेगा। यह अपने किस्म का अनूठा आंदोलन था। जिसमें कोई एक नेता नहीं था। उसका कोई एक चेहरा नहीं था। वह सैकड़ों संगठनों के हजारों नेताओं के सहारे आगे बढ़ रहा था। लेकिन उसके कोर में बैठे नेतृत्व को हजारों-हजार सलाम जिसने इतने धैर्यपूर्वक इतनी मजबूत और षड्यंत्रकारी सत्ता से लोहा लिया। वह न केवल साहसपूर्वक टकराया बल्कि हर मोर्चे पर उसने उसे मात दी। यह उसकी राजनीतिक सूझ-बूझ का ही नतीजा था कि अंत में सत्ता को उसके सामने समर्पण करना पड़ा। और अब जीत के जश्न के साथ अपने आंदोलन की पहली पारी का वह समापन कर रहा है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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