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Saturday, September 25, 2021

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झारखंड: साही के शिकार के चक्कर में कोरवा जनजाति के तीन युवकों ने गंवाई जान

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झारखंड के गढ़वा जिले में स्थित टेटूका जंगल में पिछले 31 अगस्त, 2021 को कोरवा जनजाति के तीन युवकों की उस वक्त जान चली गई जब वे एक साही के शिकार के चक्कर में एक गुफा में घुस गए, जहां इनकी दम घुटने से मौत हो गई।

जानकारी के मुताबिक कोरवा आदिम जनजाति के नौ युवक जंगल में शिकार करने गए थे। उनमें से तीन शिकार की तलाश में गुफा में चले गए। गुफा संकरी होने के कारण तीनों का शव निकालने में समय लगा। एक का दिन में ही शव बरामद कर लिया गया, जबकि दो अन्य का शव देर शाम निकाला गया। सभी मेराल थाना क्षेत्र से सटे डंडई थाना क्षेत्र के चकरी गांव के निवासी थे।

बता दें कि झारखंड के गढ़वा जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर स्थित इस जंगल में चकरी गांव के नौ युवक वहां शिकार करने गए थे, देर तक शिकार हाथ न लगने पर छह युवक लौट गए, जबकि तीन शिकार की तलाश में लगे रहे। पहले दो युवकों ने टेटूका के पकवा बांध पहाड़ पर स्थित गुफा में प्रवेश किया। तीसरा गुफा में जाने का प्रयास कर ही रहा था कि बेहोश हो गया। आस पास मवेशी चरा रहे चरवाहों ने देखा तो शोर मचाया। इसके बाद लोग जमा हो गये। हालांकि जब तक युवक को निकाला जाता तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। उसकी पहचान उपेंद्र कोरवा के रूप में हुई है। घटना की सूचना तुरंत पुलिस को दी गई। ग्रामीणों के सहयोग से पुलिस गुफा में घुसे दो युवकों का पता लगाने में दिन भर जुटी रही। हालांकि गुफा में घुसने की किसी की हिम्मत नहीं हुई। बाद में देर शाम पुलिस ने ग्रामीणों के सहयोग से दो और शव निकाले। इनकी पहचान श्याम बिहारी कोरवा और उमेश कोरवा के रूप में हुई।

बता दें कि मेराल और इंडई थाना क्षेत्र के सीमावर्ती जंगल तिसरटेटूका के पकवा बांध पहाड़ क्षेत्र में ये युवक अक्सर शिकार के लिए निकलते थे। वे इलाके के भूगोल से परिचित थे। इसके बावजूद गुफा में तीनों युवकों की मौत होने से इलाके के लोग सन्न हैं।

एक युवक का शव मिलने के बाद गुफा में घुसने की किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी लिहाजा बाकी लापता दो युवकों की तलाश में गुफा के पास जेसीबी की मदद से खुदाई कराई गई। रात करीब पौने नौ बजे दोनों युवकों के शव निकाले गये।

इससे पहले सुबह हादसे के बाद घटना की सूचना इलाके में जंगल की आग की तरह फैली। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग गुफा के आस पास पूरे दिन जमे रहे। राहत-बचाव कार्य में लोग पुलिस की मदद करने में जुटे हुए थे। गुफा की खुदाई के लिए दो-दो जेसीबी मशीनें लगाई गईं। बताया जाता है कि गुफा में फंसे युवकों में श्याम बिहारी कोरवा और उमेश कोरवा काफी अंदर घुस गये थे। लोगों ने बताया कि पहाड़ में पत्थर होने के कारण जेसीबी को भी खोदने में परेशानी हो रही थी। लोगों के कहने पर पुलिस ने एनडीआरएफ से भी मदद मांगी। लेकिन एनडीआरएफ के पहुंचने से पहले ही सभी शव निकाल लिए गए।

घटना के संबंध में ग्रामीणों ने बताया कि डंडई थाना क्षेत्र के चकरी गांव से आदिम जनजाति परिवार के नौ युवक जंगल में शिकार करने अपने-अपने घर से निकले। युवक अक्सर जंगली जानवरों का शिकार करने निकलते थे। शिकार की तलाश में वह निकटवर्ती मेराल थाना क्षेत्र के तिसरटेटका के पकवा बांध पहाड़ क्षेत्र में चले गए। वहां एक गुफा में साही होने की भनक मिली। उसके बाद सभी युवक गुफा के पास बैठकर साही के बाहर निकलने का इंतजार करने लगे। काफी समय तक जब शिकार हाथ नहीं लगा तो छह युवकों ने घर लौटने का निर्णय लिया।

वहीं बाकी तीन युवकों ने बगैर शिकार किए घर वापस लौटने से इंकार कर दिया। छह युवकों के वापस लौटने के बाद तीनों युवकों ने गुफा के अंदर ही घुसकर साही का शिकार करने का मन बनाया। पहले दो युवक गुफा के अंदर चले गए। पीछे से तीसरा युवक जैसे ही गुफा के दरवाजे पर पहुंचा उसका दम घुटने लगा। वह जब तक निकलने की कोशिश करता तब तक बेहोश हो चुका था। उसके बाद सभी की मौके पर ही मौत हो गई।

पास मवेशी चरा रहे चरवाहे और ग्रामीणों को घटना की जानकारी मिलने के बाद उन लोगों ने शोर मचाया। शोर सुनकर अन्य लोग भी मौके पर पहुंचे। उसके बाद पुलिस को उसकी जानकारी दी। सूचना पाकर मेराल और डंडई पुलिस घटनास्थल पर पहुंची। वहां पहुंचने के बाद पुलिस ने ग्रामीणों के सहयोग से राहत और बचाव कार्य शुरू किया। उसी क्रम में एक युवक उपेंद्र कोरवा का शव बरामद कर लिया गया। बताया जाता है कि गुफा की गहराई 20 फीट से भी अधिक थी। मेराल थाना प्रभारी शिवलाल कुमार गुप्ता, एसआई अजीत कुमार और डंडई पुलिस ने ग्रामीणों के सहयोग जंगल में राहत बचाव कार्य चलाया।

उक्त घटना पर शोक व्यक्त करते हुए कोरवा भाषा का शब्दकोश लिखने वाले हीरामन कोरवा ने कहा कि वैसे आदिम जनजाति परिवार हैं जो जंगल में शिकार करने और मंदा (गुफा) में घुसते हैं, वो अब इस तरह का काम ना करें। कोई भी शिकार की लालच में मंदा में ना घुसे। क्योंकि दो चंद शिकार की वजह से अपनी जान को जोखिम में डालना उचित नहीं है। आप सभी ने देखा कि हमारे तीन आदिम जनजाति के भाई लोग इसी शिकार के चलते फलता—फूलता परिवार को छोड़कर चले गए। इसलिए आदिवासी भाइयों से निवेदन है कि शिकार करने और मंदा में घुसने के लिए जंगल ना जाएं। बच्चे को पढ़ाएं, लिखाएं और शिक्षित बनाएं।

बताते चलें कि कोरवा जनजाति विलुप्त हो रही जनजाति की श्रेणी में आती है। कोरवा जनजाति की आबादी पलामू, गढ़वा व लातेहार जिले में ही मुख्य रूप से है।

इनकी जनसंख्या पर गौर करें तो 1911 की जनगनणा में इनकी संख्या 13,920 थी, जो से 1931 में हल्की गिरावट के बीच 13,021 पर आ गई। वहीं 1961 में 21,162 के बाद 1971 में फिर गिरावट के बीच 18,717 के बीच देखने में आती है। लेकिन 1981 में इनकी आबादी 21,940 में फिर चढ़ाव नजर आया।

आंकड़ों से पता चलता है कि इस जनजाति की आबादी जो 1872 में 5214 थी, जो 110 साल बाद बढ़कर 1981 में मात्र 21,940 तक ही रह पायी। 1991 की जनगणना में इनकी स्थिति क्या थी, इसे जाना नहीं जा सकता क्योंकि इस जनगणना के आंकड़े उपलब्ध नहीं हुए हैं। वैसे 2011 की जनगनणा में इनकी संख्या केवल गढ़वा जिले में 32,008 है। वैसे भी पलामू से गढ़वा जिला अलग होने के बाद यह जनजाति बहुसंख्य रूप से गढ़वा जिले में ही बसती है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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