पहला पन्ना

EXCLUSIVE: किसान मोर्चा नहीं हटाएंगे, महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलन स्थलों पर जाएंगे-राकेश टिकैत

भारतीय किसान यूनियन के नेता और सात महीने से चल रहे किसान आंदोलन के मजबूत स्तंभ बनकर उभरे चौधरी राकेश सिंह टिकैत से जिस समय दिल्ली और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर बार्डर पर बातचीत हुई उससे ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं और किसान आंदोलन के कार्यकर्ताओं के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग 24 के बीच झड़पें हुई थीं। भाजपा के संगठन मंत्री अमित वाल्मीकि के स्वागत के लिए खड़े लोगों का आरोप है कि किसानों ने उन पर हथियारों से हमला किया, काले झंडे दिखाए और उनकी गाड़ियां तोड़ दीं। उन्होंने इस मामले को लेकर एसएसपी कार्यालय पर प्रदर्शन भी किया।

जबकि राकेश टिकैत का कहना था कि यह सब एक योजना के तहत की जाने वाली झड़पें हैं जो यहां पिछले तीन दिनों से चल रही थीं और पानीपत, हिसार और दूसरी जगहों पर भी यही रवायत है। भाजपा के लोग किसान मंच के करीब अपने नेताओं के स्वागत का कार्यक्रम बनाते हैं ताकि विवाद हो सके। वे वहां से गालियां देते हैं और पत्थर फेंकते हैं। इस तरह उकसावे की एक योजना है ताकि किसानों के दमन का बहाना बनाया जा सके। इस वातावरण के बीच गाजीपुर बार्डर पर तकरीबन 2,500 किसान अभी भी जमा हैं। उनका संकल्प है कि यह मोर्चा नहीं हटेगा और धान की रोपाई के बाद धीरे-धीरे आंदोलन और जोर पकड़ेगा। पेश है राकेश टिकैत से हुई लंबी बातचीत के अंशः—-

अरुण त्रिपाठी: किसान आंदोलन को चलते सात महीने बीत गए हैं। इतने लंबे संघर्ष से आपने क्या सबक लिया?

राकेश टिकैत: सबक यही है कि देश में किसी पार्टी की सरकार नहीं है। यहां तो मोदी की सरकार है। इस सरकार को कंपनियां चला रही हैं। देश में अगर किसी पार्टी की सरकार होती तो जरूर बात होती। इससे पहले भी आंदोलन हुए हैं और सरकारों से बातचीत हुई है। लेकिन इस समय देश पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया है। इनको देश की जनता, व्यापारी, किसान और मजदूरों से कोई लेना देना नहीं है। हैरानी की बात है कि किसान देश की राजधानी को घेर कर बैठे हैं और सरकार बात ही नहीं कर रही है। किसान पीछे नहीं हटेगा।

उन्होंने क्या-क्या नहीं किया किसानों को बदनाम करने के लिए। पहले खालिस्तानी बताया। कुल 12 तरह से आरोप लगा लिए लेकिन कोई आरोप चस्पा ही नहीं हो पाया। अब वे क्या कर रहे हैं कि भाजपा कार्यकर्ताओं को भेज रहे हैं झगड़ा कराने के लिए। पानीपत, गाजीपुर, हिसार सभी स्थलों पर एक ही रवायत है। वे लोगों को लड़ाकर जीतना चाहते हैं। हिंदुओं को मुसलमानों से लड़ाया जा रहा है। सरदारों को अन्य लोगों से भिड़ाया जा रहा है। मजदूरों को किसानों से और इन दोनों को व्यापारियों से लड़ाया जा रहा है। किसानों का विरोध गुंडा तत्वों से कराया जा रहा है।

अरुण त्रिपाठी: विभिन्न राज्यों में क्या स्थिति देख रहे हैं आप?

राकेश टिकैत: भाजपा की सरकारें जिन जिन राज्यों में शासन कर रही हैं वहां लोगों को आपस में लड़ाने का तो सिलसिला चल ही रहा है साथ में धांधली जोरों पर है। जैसे उत्तर प्रदेश में एक ओर धर्मांतरण का हौवा खड़ा किया जा रहा है तो दूसरी ओर फूलांतरण चल रहा है। फूलांतरण का नाटक (उत्तर प्रदेश के) पंचायत चुनावों में खूब देखने को मिला है। पंचायत चुनाव के प्रत्याशी मालाएं बदल रहे हैं। अपहरण, धमकी और लालच के माध्यम से पंचायत के अध्यक्ष चुने जा रहे हैं। कोई कहीं से भी जीता हो वह परचा नहीं भर पा रहा है।

उसके बिजनेस को तबाह करने की धमकी देकर उन्हें खामोश कर दिया जा रहा है। बागपत में यही हुआ। दूसरी महिला खड़ा करके परचा रद्द करा दिया गया। पुलिस प्रशासन मौन है। थानेदार उनका कार्यकर्ता हो गया है। बंदूक की ताकत पर लोगों को चलाना चाहते हैं। दूसरी ओर हरियाणा में जाट बनाम अन्य, गुजरात में पटेल बनाम अन्य तो महाराष्ट्र में मराठा बनाम अन्य का विवाद खड़ा किया जा रहा है। हिंदू बनाम मुस्लिम तो चलता ही रहता है।

अरुण त्रिपाठी: लेकिन किसान आंदोलन ने मुजफ्फरनगर जैसे दंगों से बनी सांप्रदायिक खाईं को भरने का काम भी तो किया है।

राकेश टिकैत: मुजफ्फरनगर में अब हिंदू बनाम मुस्लिम झगड़े की ओर कोई जाना नहीं चाहता। उसका परिणाम हर कोई भुगत चुका है। फिर भी वे विभाजन करने पर आमादा हैं। उत्तर प्रदेश में ओवैशी चुनाव लड़ना चाहते हैं। वे कौन हैं? वे भाजपा की बी टीम हैं। वे जितने ऊल जलूल बयान देंगे उससे माहौल बिगड़ेगा ही।

अरुण त्रिपाठी: ऐसे में विपक्ष की क्या भूमिका होनी चाहिए। क्या आप किसान आंदोलन को दिए जा रहे विपक्ष के समर्थन से संतुष्ट हैं?

राकेश टिकैत: आंदोलन में विपक्ष की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है। वह परोक्ष भूमिका निभा रहा है। हम भी नहीं चाहते कि वे हमारे मंच पर आएं। विपक्ष का काम है जनजागरण अभियान चलाए। संसद और विधानसभा में किसानों की आवाज उठाए।

अरुण त्रिपाठी: कोरोना जैसी महामारी के दौरान आंदोलन करने में क्या दिक्कतें पेश आईं और उनका हल आपने कैसे निकाला?

राकेश टिकैत: महामारी के दौरान दिक्कत तो बहुत आई लेकिन हमने हिम्मत और एहतियात से काम लिया। साफ सफाई का ध्यान रखा और जो लोग गांव से यहां आ गए वे 10 से 15 दिन बिताकर ही गए। यह एक तरह से क्वारंटीन जैसा हो गया। यहां लोगों ने सर्दी और गर्मी झेली अब बरसात झेलने की तैयारी है। लोगों ने टीके भी लगवाए।

अरुण त्रिपाठी: फसलों के सीजन के कारण किसानों की संख्या तो कम होती रहती है।

राकेश टिकैत: अच्छी बात है। लोग आते जाते रहते हैं। गन्ने की कटाई में लोग चले गए। गेहूं की कटाई के सीजन में चले गए। अब धान की रोपाई के मौसम में चले जाएंगे। लेकिन जब खेती का सीजन हल्का हो जाता है तो वे यहां आ जाते हैं। इससे एक तो ज्यादा भीड़ भी नहीं लगती और आंदोलन भी चलता रहता है। क्योंकि यह आंदोलन कितना लंबा चलेगा कह नहीं सकते।

अरुण त्रिपाठी: आप आंदोलन की कमजोर कड़ी कहे जाते थे। आप उस कमजोर कड़ी से मजबूत कड़ी कैसे बन गए? इस दौरान आपके कंधों पर चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत का बोझ भी आ गया। उसे कैसे संभाल रहे हैं?

राकेश टिकैत: टिकैत साहेब जो कर रहे थे उसे बचपन से देखा था। हम तो वहीं पले बढ़े हैं। हम महेंद्र सिंह टिकैत की विचारधारा पर चले। जब भी कोई चुनौतीपूर्ण स्थिति आती है तब उसी नजीर का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन हमारे लिए इस आंदोलन से वापस जाने का मतलब ही नहीं है। हमें 11 करोड़ की नोटिस दी गई। दमन हुआ हमारे रिश्तेदारों का। कई लोगों का तबादला कर दिया गया। अब जिन्हें नौकरी करनी है उन्हें यह सब तो झेलना होगा और हमें आंदोलन करना है तो यह सब सहना होगा। लेकिन इन चीजों से हम पीछे नहीं हटने वाले हैं। पीछे हटना हमारी डिक्शनरी में नहीं है। जिस तरह फौजें मोर्चे पर होती हैं तो गोली खाती हैं उसी तरह हम भी मोर्चे पर हैं और लड़ रहे हैं। दिल्ली के अफसर आए। हमने कहा कोई गिरफ्तारी नहीं देंगे। बलपूर्वक ले चलना हो ले चलो। संघर्ष करेंगे। मोर्चा नहीं छोड़ेंगे।

अरुण त्रिपाठी: आंदोलन को इतना लंबा चलाने में आप किस संगठन की बड़ी भूमिका मानते हैं। किसान यूनियन या खाप की? भारतीय किसान यूनियन के तो तमाम संगठन हैं फिर इतने सारे लोग एक साथ मिलकर कैसे काम कर रहे हैं। मतभेद स्वाभाविक तौर पर होंगे फिर सरकार ने उन्हें बढ़ाने की कोशिश की होगी। उसके बावजूद एक कैसे रहे सात महीने तक?

राकेश टिकैत: खाप का बड़ा रोल है। क्योंकि खाप में एक जाति नहीं है। सभी जातियां हैं। उसी के बूते पर किसान यूनियन खड़ी है। सब लोग एकजुट रहे क्योंकि जितने लोग आंदोलन कर रहे हैं सबका उद्देश्य एक है। यह आंदोलन किसी एक का नहीं है। सभी के मुद्दे एक हैं। तीन कृषि कानूनों की वापसी और एमएसपी की गारंटी। यह हमारे प्रमुख मुद्दे हैं। यहां किसी का संगठन न छोटा है और न ही किसी का बड़ा।

इसका कोई एक नेता भी नहीं है। किसान ही इसके नेता हैं। इस आंदोलन को आम जनता की भावनाएं आगे बढ़ा रही हैं। यह एक वैचारिक क्रांति है। जहां वैचारिक क्रांति आई है उसने परिवर्तन किए हैं। विचार से बड़ा कोई हथियार नहीं है। आजादी की लड़ाई में शामिल बहुत लोगों के पास कुछ नहीं था। उसमें कवि थे जो कविता के माध्यम से अपनी बात पहुंचाते थे। जिन्होंने गांव और मिट्टी में जन्म लिया है वे इस आंदोलन को याद रखेंगे।

अरुण त्रिपाठी: दुनिया में जब भी महामारियां आई हैं और उनके समांतर कोई आंदोलन चलता रहा है तो बड़े परिवर्तन हुए हैं। उस लिहाज से आप महामारी से आंदोलन का कितना नुकसान और फायदा होते हुए देखते हैं?

राकेश टिकैत: महामारी से आम जनता का सरकार पर से यकीन हटा है। जनता ने देखा कि जब महामारी आई तो सरकार ने उन्हें सड़क पर छोड़ दिया। 120 रुपए का सिलेंडर 20,000 रुपए तक बिका। लेकिन हम जनता के साथ खड़े रहे। हमने उनकी मदद की। इस दौरान इन्सानी रिश्तों का बड़ा नुकसान हुआ। आदमी ने आदमी से रिश्ता तोड़ दिया। भाई ने भाई से रिश्ता तोड़ दिया। इस दौरान पैसे की अहमियत का भी पता चला। लोगों ने खर्च कम किए। महेंद्र सिंह टिकैत कहते थे कि खाप पंचायत के खर्चे कम करो। ज्यादा लोग न जमा हों। हमने वैसा किया। इमरजेंसी में कैसे जिया जाता है। यह सीख मिली। एकांत में कैसे रहना है इसकी सीख मिली। सभी तरह की घटनाएं घटीं। हमने सीखा कि आंदोलन भी करना है और ज्यादा भीड़ भी नहीं जुटाना है।

अरुण त्रिपाठी: किसान आंदोलन के दौरान कोविड से कितने लोगों की मौत हुई? कोविड से बचने के क्या उपाय किए आपने?

राकेश टिकैत: आंदोलन में एक भी मौत कोविड से नहीं हुई। जो पांच सौ लोग मरे हैं वे सर्दी से मरे हैं। कोविड से बचने की वजह यह है कि लोग साफ सफाई से रहते हैं। खुले में रहते हैं। शारीरिक दूरी बनाकर रखते हैं। फिर जब लोग बंद कमरों की बजाय खुले में रहते हैं तो महामारी का संक्रमण भी कम होता है। हम अपने धरना स्थलों को फैलाकर देखें तो वे बहुत दूरी तक जाएंगे। टिकरी बार्डर का धरना 70 किलोमीटर तक लंबाई में जाएगा। अभी भी वह 22 किलोमीटर में है। वह दिल्ली से रोहतक तक चला जाएगा। सिंधु बार्डर का धरना 50 किलोमीटर तक जाएगा। इस तरह के साथ आठ धरने हैं जो 200 किलोमीटर के दायरे में फैले हैं।

अरुण त्रिपाठी: किसानों ने पश्चिम बंगाल के चुनावों में सभाएं कीं और भाजपा को वोट न देने की अपील की। उसका असर रहा और भाजपा सत्ता में नहीं आई। अब उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। किसान उन चुनावों को प्रभावित करने का प्रयास कैसे करेंगे?

राकेश टिकैत: किसान अपनी बात कहेगा। राजनीतिक दल या तो उससे प्रभावित होते हैं और बात सुनते हैं जो उन्हें वोट दिला सकता है या फिर उसकी बात सुनते हैं जो उनका वोट काट सकता है। किसान वोट दिलवा भी सकता है और वोट कटवा भी सकता है। राजनीतिक आदमी को लग जाए कि कोई तबका वोट कटवा सकता है तो वह काम करेगा।

अरुण त्रिपाठी: महामारी और इस आंदोलन से पहले लोगों की सोच मंदिर, गाय और राष्ट्रवाद पर ठिठक गई थी। लेकिन अब एक ओर महामारी ने बताया है कि धार्मिक अंधविश्वासों की बजाय विज्ञान की मदद लेनी होगी और आर्थिक दिक्कतों ने बताया है कि भावनात्मक की बजाय ठोस मुद्दे चलेंगे। इस पर आपका क्या कहना है?

राकेश टिकैत: यह सही है कि जनता मंदिर, गाय और दूसरे भावनात्मक मुद्दों से हटना चाहती है बल्कि हट चुकी है। अगर गन्ने का भुगतान नहीं होगा तो जनता का रोष सरकार को झेलना होगा।

अरुण त्रिपाठी: आपने कहीं कहा था कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहां किसानों की हालत खराब हुई है। यह बात किस संदर्भ में कही थी।

राकेश टिकैत: कश्मीर का मतलब सिर्फ मुस्लिम स्टेट नहीं है। वहां छह लाख जाट हैं। मुजफ्फरनगर में तो सिर्फ दो लाख जाट हैं। वहां गूजर वगैरह भी हैं। उन लोगों ने हमें बताया कि उनकी आर्थिक स्थिति खराब है। क्योंकि 370 के रहने से उन्हें जो सुविधाएं मिलती थीं वे खत्म हो गईं। उनके पैकेज खत्म हो गए। वहां कोई भी जमीन खरीद सकता है। लेकिन उससे कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि कंपनियों को फायदा हुआ। इसी तरह गुजरात में कोई 370 अनुच्छेद नहीं है लेकिन वहां जमीन खरीदना काफी कठिन है।

अरुण त्रिपाठी: भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत से आपके मतभेद की खबरें आई थीं। उसकी अब क्या स्थिति है?

राकेश टिकैत: कोई मतभेद नहीं है। यह खबरें अखबार वालों ने चलवाई थीं। हम इतना लंबा आंदोलन शांति से चला रहे हैं फिर वे तो हमारे भाई हैं उनसे क्या मतभेद रखेंगे। हमारी रणनीति भी देखिए कि हरियाणा का मुख्यमंत्री रोज वहां मामला उलझा रहा है लेकिन यूपी का सीएम कुछ नहीं कहता हमारे बारे में। हमारे धरने कम से कम 10 से 12 टालों पर चल रहे हैं। लेकिन कोई दिक्कत नहीं है।

अरुण त्रिपाठी: आगे के क्या कार्यक्रम हैं आंदोलन को जीवित रखने और इसे विस्तार देने के लिए ?

राकेश टिकैत: हमारी यात्राएं चलेंगी। जनजागरण के लिए। हमने एक लाख ट्रैक्टर की रैली की इजाजत मांगी है। हम दिल्ली से पुराने(विन्टेज) ट्रैक्टरों का मार्च निकालना चाहते हैं। हम उन सभी स्थलों पर जाएंगे जहां-जहां चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने आंदोलन किए थे। बोट क्लब, लाल किला और मेरठ कमिश्नरी वगैरह। बोट क्लब पर लंबा किसान आंदोलन चला था। अब वहां सरकार ने सेंट्रल विस्टा परियोजना के चलते सब कुछ बदलने की ठान ली है। चौधरी साहेब कह कर गए थे कि हमारे आंदोलन स्थलों को तीर्थ की तरह देखने जाना।

अरुण त्रिपाठी: आज देश में लोकतंत्र संकट में बताया जा रहा है। आपके इस आंदोलन से लोकतंत्र को कैसे ताकत मिलेगी?

राकेश टिकैत: इस आंदोलन से लोकतंत्र का आंदोलन निकलेगा। नए आंदोलन निकलेंगे। संविधान बचाने वाले आंदोलन निकलेंगे। इस आंदोलन से प्रशिक्षित युवा निकलेंगे। वे जो अगले पचास साल तक आंदोलन कर सकें। यहां युवाओं को पूरी ट्रेनिंग दी जाएगी। उन्हें यही सिखाया जाएगा कि किस तरह आंदोलन हिंसक न हो। पंजाब में लोगों ने हथियार उठा लिया था। लगभग 80,000 लोग मारे गए।

अब वह चीजें शांत हुईं। आंदोलन एक वैचारिक क्रांति है। उसमें विचार ही हथियार है। हथियार उठाने की जरूरत नहीं है। हम लोगों को शांत रहना सिखाते हैं। पुलिस यहां बैठी है। उनसे भी भिडंत होती है। पर हम उनसे वैर भाव नहीं रखते। आखिर वे भी हमारे बीच के ही हैं। पुलिस वालों का वेतन बढ़ना चाहिए। उन्हें बड़े आवास मिलने चाहिए। सिपाही का वेतन भी बहुत कम होता है उन्हें कम से कम एक लाख वेतन मिलना चाहिए।

अरुण त्रिपाठी: आंदोलन और मीडिया वालों का रिश्ता बहुत खट्टा मीठा रहा है। मीडिया के साथियों के लिए आपकी क्या राय है? गोदी मीडिया वालों के बारे में क्या सोचते हैं?

राकेश टिकैत: प्रेस वालों की कोई सुरक्षा नहीं है। उनको सुविधा मिलनी चाहिए। वे बहुत जोखिम लेकर काम करते हैं। वे खतरनाक जगह जाते हैं। एक फोटो लेने के लिए जान दे देते हैं। दूसरी ओर कलम और कैमरे पर बंदूक का पहरा है। मीडिया हाउस चलाना है तो सरकार की माला जपनी होगी। सभी लोग बहुत दबाव में काम करते हैं। शायद वे वैसा करना न चाहते हों।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on July 1, 2021 9:44 am

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