सच छुपाने और झूठ को फैलाने के एवज में योगी ने किया मीडिया को मालामाल

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ऑक्सीजन के बिना मरते उत्तर प्रदेश में ‘आत्मनिर्भर भारत’ का ढोल पीटने के लिये उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने लगभग 2 अरब रुपये पिछले एक साल में स्वाहा कर दिये हैं। उमाशंकर दुबे नामक एक व्यक्ति ने आरटीआई के जरिये ये जानकारी जुटाई है। 45 वर्षीय उमाशंकर दुबे विगत 14 वर्षों से डीडी न्यूज (लखनऊ) में कार्यरत हैं और उन्होंने ये आरटीआई 15 मार्च को डाली थी। उमाशंकर दुबे ने आरटीआई में 11 सवालों का जवाब मांगा था लेकिन उन्हें केवल एक सवाल का जवाब दिया गया है। वो सवाल था कि विज्ञापन के मद में कितने टीवी न्यूज चैनलों, अख़बारों, पोर्टल न्यूज और न्यूज एजेंसी को कुल कितना पैसा दिया गया ? तिथि के साथ विवरण उपलब्ध कराने की कृपा करें।

उमाशंकर दुबे के 15 मार्च को भेजे आरटीआई का जवाब उन्हें 4 माह बाद 18 जुलाई को उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना विभाग द्वारा भेजा गया। उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग ने बताया है कि राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर खर्च विज्ञापन राशि 158.55 करोड़ रुपये है। जिसमें नेशनल टीवी चैनल्स को 88.68 करोड़ रुपये और क्षेत्रीय न्यूज चैनल को 71.63 करोड़ रुपये विज्ञापन के मद में दिये गये हैं।      

इनमें अखबारों और पत्रिकाओं का डिटेल नहीं है। सोचिए, उनकी भी राशि अगर जोड़ दी जाए तो कुल कितना राशि हो जायेगी।

योगी सरकार ने सबसे ज्यादा पैसा न्यूज 18 ग्रुप को दिया है। गौरतलब है कि न्यूज 18 ग्रुप मुकेश अंबानी का मीडिया हाउस है। जिसने 28.82 करोड़ रुपये एक साल में विज्ञापन के लिये सरकार से हासिल किया। इसके बाद दूसरे नंबर पर जी मीडिया हाउस का है। जिसने 23.48 करोड़ रुपये बनाये। एबीपी ग्रुप के न्यूज चैनल, एबीपी न्यूज और एबीपी गंगा तीसरे नंबर पर हैं। इस ग्रुप ने यूपी सरकार से 18.19 करोड़ रुपये एक साल में लिये। वहीं 10.64 करोड़ रुपये के साथ अरुण पुरी के मालिकाना हक़ वाली इंडिया टुडे ग्रुप है। रिपब्लिक मीडिया ने 9.1 करोड़ रुपये, आईटीवी नेटवर्क ने 7.24 करोड़ और टाइम्स नाऊ ने 5.97 करोड़ रुपये एक साल में विज्ञापन के लिये हैं।

अंग्रेजी भाषी न्यूज चैनल्स की बात करें तो वियन 120.7 लाख रुपये, रिपब्लिक टीवी 95.62 लाख रुपये, न्यूज एक्स 85.01 लाख रुपये, टाइम्स नाऊ 82.64 लाख रुपये, सीएनएन न्यूज 18 को 54.87 लाख रुपये, इंडिया टुडे को 49.66 लाख रुपये, मिरर नाऊ को 49.39 लाख रुपये, इंडिया अहेड को 18.62 लाख रुपये और ईटी नाऊ को 15.53 लाख रुपये दिये गये।

अब चैनल वाइज बात करें तो न्यूज 18 इंडिया को 10.96 करोड़, आज तक को 10.14 करोड़, इंडिया टीवी को 9.05 करोड़, जी न्यूज को 8.69 करोड़ रुपये, रिपब्लिक भारत को 8.14 करोड़ रुपये, एबीपी न्यूज को 7.24 करोड़ रुपये, न्यूज नेशन को 5.09 करोड़, न्यूज 24 को 3.52 करोड़ रुपये  इंडिया न्यूज को 2.92 करोड़ और सुदर्शन न्यूज को 2.68 करोड़ रुपये सरकारी विज्ञापन के लिये अदा किये गये हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष ने दिया था सरकारी विज्ञापनों पर 2 साल तक रोक का प्रस्ताव

पिछले साल 8 अप्रैल 2020 को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सरकारी खर्च में 30% कटौती के साथ 2 साल तक सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। सरकारी विज्ञापनों पर रोक के उनके प्रस्ताव पर आरएसएस भाजपा ने दलाल मीडिया में ख़ूब बवाल काटा था।

सोनिया गांधी ने पत्र में सरकार से कहा था कि – “सरकार एवं सरकारी उपक्रमों द्वारा मीडिया विज्ञापनों- टेलीविज़न, प्रिंट एवं ऑनलाइन विज्ञापनों पर दो साल के लिए रोक लगा देना चाहिए, यह पैसा कोरोना वायरस से उत्पन्न हुए संकट से लड़ने में लगाया जाए। केवल कोविड-19 के बारे में परामर्श या स्वास्थ्य से संबंधित विज्ञापन ही इस बंदिश से बाहर रखे जाएं।”

कांग्रेस अध्यक्ष के मुताबिक, केंद्र सरकार मीडिया विज्ञापनों पर हर साल लगभग 1,250 करोड़ रुपये खर्च करती है। इसके अलावा सरकारी उपक्रमों एवं सरकारी कंपनियों द्वारा विज्ञापनों पर खर्च की जाने वाली सालाना राशि इससे भी अधिक है।

न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) ने सरकार और सरकारी उपक्रमों द्वारा मीडिया विज्ञापनों पर दो साल के लिए रोक लगाये जाने संबंधी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सुझाव की ‘कड़ी निंदा’ करके कहा था कि कांग्रेस अध्यक्ष का यह सुझाव मीडियाकर्मियों के ‘मनोबल को गिराने’ वाला है।

एनबीए अध्यक्ष के तौर पर रजत शर्मा ने केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार की दलाली को राष्ट्रीय कर्तव्य बताते हुये एक बयान में कहा था कि एसोसिएशन मीडिया विज्ञापनों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाये जाने संबंधी कांग्रेस अध्यक्ष के सुझाव को पूरी तरह से खारिज करता है। ऐसे समय में जब मीडियाकर्मी अपने जीवन की चिंता किये बगैर महामारी पर समाचारों को प्रसारित कर अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभा रहे हैं, कांग्रेस अध्यक्ष से इस तरह का बयान उनके (मीडियाकर्मियों) मनोबल को गिराने वाला है।

रजत शर्मा ने कहा कि एक तरफ तो मंदी के कारण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विज्ञापन राजस्व में कमी आई है तो वहीं दूसरी ओर सभी उद्योगों और व्यवसायों के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के कारण वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं। इसके अलावा, समाचार चैनल अपने पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान करने पर भारी धनराशि खर्च कर रहे हैं। यह गलत समय पर दिया गया मनमाना सुझाव है। एनबीए ने कांग्रेस अध्यक्ष से अपना सुझाव वापस लेने का अनुरोध किया है।

क्या है ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘आत्मनिर्भर प्रदेश’ विज्ञापन में

आरटीआई के जवाब में उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग ने बताया है कि विज्ञापन पर हुये खर्च का एक बड़ा हिस्सा आत्मनिर्भर भारत अभियान के प्रचार के लिये किया गया है। कैलाश खेर की आवाज़ में लगभग 3 मिनट के वीडियो में अतीत की उपलब्धियों का बखान करते हुये तक्षशिला, सुश्रुत, रमन, हर गोविंद खुराना के बहाने खुद को विश्वगुरु बताने का दम्भ है। और फिर कोरोना से कराहती जनता को ‘शून्य में सम्भावना तलाशने का उपदेश है। आगे वीडियो विज्ञापन में आत्मनिर्भर हम, और हमसे बेहतर हम की लाइन पर वंदे मातरम् गाकर राष्ट्रवाद की परेड करायी गयी है। 

इसके अलावा आत्मनिर्भर भारत की तर्ज़ पर ‘आत्मनिर्भर प्रदेश’ कैंपेन के तहत उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की ब्रांडिंग के लिये एक और 3 मिनट 11 सेकंड का वीडियो कैलाश खेर की आवाज़ में बार-बार टीवी चैनलों पर चलाया गया। इस विज्ञापन वीडियो में हाथरस समेत यूपी में दलित लड़कियों संग गैंगरेप और हत्या, मुस्लिमों की मॉब लिंचिंग, पुलिस प्रशासन की गुंडागर्दी और घूसखोरी, बेरोज़गारी के उलट ‘नये भारत का नया उत्तर प्रदेश’ और मोदी जी हैं मार्ग दिखाते योगी जी संकल्प निभाते जैसे पंक्तियों में थेथरई की हर सीमा पार कर दी गयी है। 

बेकार के विज्ञापन के पैसे से बनाये जा सकते थे अस्पताल

आत्मनिर्भर भारत के विज्ञापन में स्वाहा किये गए करोड़ों रुपये से राज्य में दर्जनों बड़े अस्पताल बन सकते थे। जाने कितनी जानें बचाई जा सकती थीं, पर मरने के लिए जनता को उसके हाल पर छोड़ने वाली योगी सरकार के दाग़दार चेहरे को चमकाने के लिए न्यूज चैनलों पर भयंकर पैसा खर्च किया। ‘झूठ को सच बताने के लिए लगातार मिथ्या प्रचार करना पड़ता है जिसे सुनते-सुनते जनता सच मानने लगती है’ इस लाइन की तर्ज़ पर कैलाश खेर की आवाज़ में- ‘कण कण में देवत्व भरा है, यहां दिलों में प्यार बसा है, महिलाओं का मान बढ़ा है, कृषकों का सम्मान बढ़ा है, परदेशी को घर में रोटी, माटी का अभिमान बढ़ा है’ पंक्तियों को लोगों के जेहन में जबर्दस्ती ठूंसकर सच्चाई की हत्या करने की सुपारी मीडिया चैनलों को दी गयी।

वो विज्ञापन का भारी भरकम पैसा ही था जो हड्डी की तरह मुंह में दबाये सारे न्यूज चैनल कोरोना काल में ज़मीनी सच्चाई छुपाने और सरकार को बचाने में जुटे हुए थे। ये विज्ञापन का पैसा ही था जो तमाम दलाल चैनल्स कोरोनाकाल में गंगा तटों पर दफ़न लाशों को उजागर करने वाले छोटे स्थानीय पत्रकारों के प्रयास को ‘गिद्ध पत्रकारिता’ का टैग देकर हत्यारी सरकार को मोक्षदाता साबित करने में लगी हुयी थी।

जबकि सरकारी विज्ञापनों का मक़सद जनता को अपने अधिकारों के प्रति जागरुक करना और सरकारी योजनाओं के बारे में भली भाँति जानकारी मुहैया करवाना होता है।

(जनचौक के विशेष संवादाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)