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Monday, July 26, 2021

3000 करोड़ रुपये में बिकी वीडियोकॉन, बैंकों का 46000 करोड़ और निवेशकों के करोड़ों डूबे

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वीडियोकॉन पर बैंक का कर्जा 46000 करोड़ रूपये है और 3000 करोड़ में बेची जा रही है। बैंकों को 43000 करोड़ गँवाने पड़ेंगे और सरकार दो बैंकों को बेच कर इतना ही कमा पाएगी। यानि की आसान भाषा में समझें तो पैसा वसूलने की जगह बैंक ही बेच दो। दिवालियापन मामलों की अदालत एनसीएलटी ने ट्विन स्टार को 3,000 करोड़ रुपये में वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज का अधिग्रहण करने की मंजूरी दे दी है। वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज का अधिग्रहण अरबपति अनिल अग्रवाल की कंपनी करेगी। अनिल अग्रवाल वेदांता ग्रुप के मुखिया हैं और उनकी कंपनी ट्विन स्टार ये अधिग्रहण करने वाली है। राजनीतिक गलियारों में वेदांता ग्रुप को सरकार का चहेता माना जाता है। वीडियोकॉन ग्रुप पर बैंकों और दूसरे कर्जदाताओं के 90,000 करोड़ रुपए बकाया हैं। इस बोली को मंजूरी दिए जाने से कर्जदारों की 96 प्रतिशत रकम डूब गई है। वीडियोकॉन के हजारों निवेशकों के करोड़ों रुपये भी डूब गए हैं क्योंकि वीडियोकॉन के शेयर के बदले में शेयरधारकों को कोई पैसा नहीं मिलेगा इसे डीलिस्ट किया जा रहा है।

इसमें बहुत बड़ा घोटाला होने की आशंका है। एनसीएलटी ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि समाधान योजना के तहत आवेदन करने वाली ट्विन स्टार टेक्नोलॉजीज ने संपत्ति और देनदारियों का लगभग वही मूल्य निर्धारित किया जो पंजीकृत मूल्यांकनकर्ताओं ने तय किया था। एनसीएलटी ने भारतीय दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) से इस मामले की गहराई से जांच करने को कहा है ताकि यह सुनिश्चित हो कि गोपनीयता उपबंध का पालन बिना किसी समझौते के किया गया।

एनसीएलटी का कहना है कि वेदांता को कैसे मालूम पड़ गया कि वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज और उसकी 12 समूह कंपनियों की संपत्ति का परिसमापन मूल्य हमने 2,568 करोड़ रुपये रखा है? वेदांता की ट्विन स्टार टेक्नोलॉजीज ने समाधान योजना के तहत 2,962 करोड़ रुपये की बोली जमा की है यानि सिर्फ 400 करोड़ रुपये ज्यादा, यानी वेदांता को यह इनसाइड इन्फॉर्मेशन थी कि पंजीकृत मूल्यांकनकर्ताओं ने संपत्ति और देनदारियों की क्या कीमत निर्धारित की है ?

वेदांता ग्रुप की कंपनी ट्विन स्टार 90 दिनों के भीतर करीब 500 करोड़ रुपये का एडवांस पेमेंट करेगी और बाकी धनराशि का भुगतान कुछ समय के भीतर नॉन डिबेंचर ऋणपत्रों के रूप में करेगी। वर्ष 1986 में वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज की शुरुआत हुई थी। इसके बाद यह भारत की पहली कंपनी बनी जिसे रंगीन टीवी बनाने का लाइसेंस मिला। इसके कुछ साल बाद 1990 में कंपनी ने अपने पोर्टफोलियो का विस्तार किया और एसी, वॉशिंग मशीन और रेफ्रीजेरेटर्स बनाने लगी। करीब तीन दशक बाद साल 2020 में ग्रुप ने ऑयल एंड गैस, टेलीकॉम, रिटेल और डीटीएच टीवी में कदम रखा।

वेदांता की रावा तेल क्षेत्र में 25 फीसदी हिस्सेदारी होने की वजह से उसने वीडियोकान ग्रुप की कंपनियों में रुचि दिखाई है। इस अधिग्रहण के बाद वेदांता की रावा तेल क्षेत्र में 47.5 फीसदी हिस्सेदारी हो जाएगी।इसके साथ वह ओएनजीसी की 40 फीसदी हिस्सेदारी से भी बड़ी हिस्सेदार हो जायेगी। ओएनजीसी की रावा तेल में 40 फीसदी हिस्सेदारी है।

2019 में कंपनी के प्रमोटर वेणु गोपाल धूत ने बैंकों का 31,289 करोड़ रुपए लौटाने की पेशकश की थी। धूत ने कहा था कि अगर लेंडर्स उनकी कंपनी को इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड से बचा लेते हैं तो वह अगले 15 से 18 साल में 31,289 करोड़ रुपए का बकाया लौटा देंगे। लेकिन उनकी मांग नहीं मानी गयी क्योंकि जिसने शुरू से इस कंपनी को डुबोने का कार्य किया हो उसे ही कंपनी वापस सौंप दी जाए। यह कोई न्याय की बात नहीं है।

धूत की 15 कंपनियां वर्ष 2017 से आईबीसी के दायरे में आ गयी थीं। अभी इन 15 में से 13 कंपनियां वेदांता की ट्विन स्टार को सौंप दी गई हैं। इन कंपनियों पर करीब 57,444 करोड़ रुपये के दावे को आईबीसी में स्वीकार कर लिया गया था। लेकिन तब भी मात्र 3 हजार करोड़ में सब सेटल कर लिया गया।आर्थिक मामलों के जानकार गिरीश मालवीय के अनुसार इस प्रक्रिया में बैंकों को प्राप्त होने वाली राशि हेयरकट कहा जाता है। वीडियोकॉन को लोन कोई एक दो संस्थाओं ने नहीं दिया है, बल्कि इस समूह को कुल 54 वित्तीय संस्थाओं ने लोन दिया है।

कंपनी की वेबसाइट पर दिवालियापन मामले से संबंधित खुलासे के मुताबिक, 2019 में वीडियोकॉन का कर्ज 63,500 करोड़ रुपए से अधिक था। इसमें से, 57,400 करोड़ रुपए तीन दर्जन से अधिक बैंकों और अन्य वित्तीय लेनदारों पर बकाया था। वीडियोकॉन पर देश का सबसे बड़ा बैंक एसबीआई का 10,944 करोड़ रुपए, आईडीबीआई बैंक 9,504 करोड़ रुपए, सेंट्रल बैंक 4,969 करोड़ रुपए, ICICI बैंक 3,295 करोड़ रुपए और यूनियन बैंक का 2,515 करोड़ रुपए का बकाया है।
दरअसल, वर्ष 2008 के दिसंबर में वीडियोकॉन समूह के मालिक वेणुगोपाल धूत ने बैंक की सीईओ और एमडी चंदा कोचर के पति दीपक कोचर और उनके दो संबंधियों के साथ मिलकर एक कंपनी बनाई। 65 करोड़ की कंपनी 9 लाख में बेची गयी। फिर इस कंपनी को 64 करोड़ का लोन दिया गया। लोन देने वाली कंपनी वेणुगोपाल धूत की थी। बाद में इस कंपनी का मालिकाना हक महज 9 लाख रुपये में उस ट्रस्ट को सौंप दिया गया, जिसकी कमान चंदा कोचर के पति दीपक कोचर के हाथों में थी। सबसे हैरानी की बात ये थी कि दीपक कोचर को इस कंपनी का ट्रांसफर वेणुगोपाल द्वारा आईसीआईसीआई बैंक की तरफ से वीडियोकॉन ग्रुप को 3,250 करोड़ रुपये का लोन मिलने के छह महीने के बाद किया गया।

दरअसल वीडियोकॉन में चल रहे घोटाले के व्हिसल ब्लोअर अरविंद गुप्ता ने 15 मार्च, 2016 को प्रधानमंत्री कार्यालय को एक पत्र लिखा था। उस पत्र में जिक्र किया गया था कि वेणुगोपाल एन धूत ने साल 2014 के दौरान भारतीय जनता पार्टी को चंदा दिया है। गुप्ता जी ने पीएमओ, आरबीआई, सेबी सहित सभी को लेटर भी लिखा, लेकिन उन्हें कहीं से जवाब नहीं मिला। उन्होंने सीधे तौर पर प्राइवेट सेक्टर के सबसे बड़े बैंक आईसीआईसीआई बैंक की एमडी और सीईओ चंदा कोचर पर लोन देने में मिलीभगत का आरोप लगाया था लेकिन तब बात दबा दी गयी।

वर्ष 2020 में धूत के खिलाफ भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र के तहत मामला दर्ज किया गया। लेकिन साथ ही साथ सीबीआई ने बैंकों के समूह (कंसोर्टियम) के अज्ञात अधिकारियों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया था।दरअसल, एसबीआई के नेतृत्व में बैंकों के एक समूह ने वीडियोकॉन समूह को मोज़ाम्बिक, ब्राजील और इंडोनेशिया में अपने तेल एवं गैस परिसंपत्तियों के विकास के लिये ‘स्टैंडबाय लेटर ऑफ क्रेडिट’ (एसबीएलसी) सुविधा दी थी।

सीबीआई ने जो चार्जशीट दाखिल की है, उसमें कहा गया है कि ‘तथ्यों एवं प्रथम दृष्ट्या परिस्थितियों से यह प्रदर्शित होता है कि एसबीआई के नेतृत्व में ऋण दाता बैंकों के अज्ञात अधिकारियों ने वेणुगोपाल धूत के साथ साजिश रच कर वीएचएचएल को एससीबी से सुविधा का लाभ उठाना जारी रखने दिया। इस तरह से वीडियोकॉन को गलत तरीके से फायदा हुआ तथा भारतीय सार्वजनिक उपक्रम बैंकों को गलत तरीके से नुकसान पहुंचाया गया।

घोटाले की गंध इस तथ्य से आ रही है कि  कंपनी ऋण शोधन अक्षमता समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) के नियमों के तहत दो पंजीकृत मूल्यांकनकर्ता, परिसमापन मूल्य तय करते हैं और बाजार मूल्य के साथ इसे गोपनीय बनाये रखते हैं। केवल बोलियों को अंतिम रूप दिये जाने के समय ही कर्जदाताओं की समिति (सीओसी) को इसकी सूचना दी जाती है। वीडियोकॉन के मामले में समाधान बोलियां 2 सितंबर, 2020 को खुलीं। इसी दौरान एनसीएलटी को परिसमापन मूल्य और बाजार मूल्य की जानकारी दी गयी।

एनसीएलटी की मुंबई पीठ ने नौ जून के अपने आदेश में कहा कि इसलिए, भले ही गोपनीयता उपबंध अस्तित्व में हो, ऊपर चर्चा किए गए तथ्यों और परिस्थितियों के मद्देनजर इसको लेकर संदेह उत्पन्न होता है। इसलिए हम आईबीबीआई से इस मुद्दे की गहराई से जांच करने का अनुरोध करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सीआईआरपी से जुड़े सभी संबंधित पक्षों, संस्थाओं द्वारा किसी भी समझौते के बिना, गोपनीयता उपबंध का अक्षरश: पालन किया गया है।

गौरतलब है कि बैंकों और सरकारी वित्तीय संस्थाओं के पैसे डूबने का अर्थ होता है जनता की गाढ़ी कमाई के टैक्स से मिले पैसे का डूबना। प्रसंगवश वीडियोकॉन का 100 शेयर 16000 रुपये में मैंने भी हर्षद मेहता के ज़माने में लिया था जो कम्पनियों के विलय में धूत ने आधा तीया कर दिया और मेरे 16000 रुपये डूब गये।   

 (वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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