Sunday, October 17, 2021

Add News

न्यायपालिका के पतन में अब क्या बाकी रह गया?

ज़रूर पढ़े

यह महज एक तस्वीर नहीं है, जिसमें देश के प्रधानमंत्री और कानून मंत्री के साथ सुप्रीम कोर्ट तमाम न्यायाधीश दिखाई दे रहे हैं। इस तस्वीर को यदि आप गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि यह तस्वीर हमारे देश में सत्ता और न्यायपालिका के प्रगाढ़ होते रिश्तों को ही बयान नहीं करती है बल्कि यह भी बताती है कि कितने बौने लोग हमारी व्यवस्था के शीर्ष पर काबिज हैं। देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की बात तो छोड़िए, देश की न्याय व्यवस्था के मुखिया की दयनीयता दर्शाती इस तस्वीर को देखिए।

प्रधानमंत्री के ठीक पीछे खड़े प्रधान न्यायाधीश की मुदित मुख-मुद्रा पर गौर करिए। साफ जाहिर हो रहा है कि वे सत्ता के आगे अपने को बिल्कुल दीन-हीन और बौना पाकर भी गद्गदायमान हैं। तस्वीर में आसपास खड़े अन्य न्यायाधीशों में से भी किसी में शिष्टाचार का इतना भाव नहीं है कि वे अपने प्रधान न्यायाधीश से आगे आने का आग्रह कर सकें। वैसे तो प्रधानमंत्री को ही चाहिए था कि वे प्रोटोकॉल के लिहाज से प्रधान न्यायाधीश से अपने बराबर आकर खड़े होने का अनुरोध करते। लेकिन अगर वे ऐसा करते तो फिर ‘न्यू इंडिया’ में न्यायपालिका की यह ‘नई हैसियत’ कैसे दिखाई देती। 

बहरहाल यह तो हुई इस तस्वीर की बात, जो दिल्ली में हाल ही में आयोजित अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन के मौके की है। इसी सम्मेलन को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरुण मिश्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए उन्हें अत्यंत दूरदर्शी और बहुमुखी प्रतिभा का धनी बताया। उन्होंने कहा कि विश्वदृष्टि और वैश्विक सोच रखते हुए भी मोदी अपने स्थानीय हितों को नहीं भूलते। ‘न्यायपालिका और बदलती दुनिया’ विषय पर दुनिया के तमाम देशों के न्यायाधीशों के सम्मेलन में मूल विषय से हटकर जस्टिस मिश्रा के मुंह से निकली प्रधानमंत्री मोदी की यह तारीफ न सिर्फ अप्रासंगिक है, बल्कि अशोभनीय और अमर्यादित भी है। प्रधानमंत्री के इस प्रशस्ति गान से यह भी जाहिर होता है कि हमारी न्यायपालिका किस कदर राजनीतिक सत्ता की बांदी बन चुकी है।

इससे यह भी समझा जा सकता है कि जजों के सेवानिवृत्त होने के बाद भारी-भरकम वेतन, सरकारी बंगला, गाड़ी, नौकर-चाकर आदि तमाम सुविधाओं से युक्त उनका पुनर्वास कैसे होता है। किसी को किसी न्यायिक आयोग या ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष बना दिया जाता है तो किसी को किसी सूबे के राजभवन में बैठा दिया जाता है। यहां यह भी गौरतलब है कि इन्हीं जस्टिस अरुण मिश्रा ने चंद दिनों पहले ही टेलीकॉम कंपनियों से संबंधित मामले की सुनवाई करते हुए कहा था- ”एक सरकारी बाबू सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दबा कर बैठ जाता है। पैसे के दम पर सब चलाया जा रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को बंद कर देना चाहिए। देश छोड़कर चले जाने की इच्छा होती है, क्योंकि यह रहने लायक नहीं रहा।’’ 

न्यायपालिका की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच हाल के दिनों में इलाहाबाद हाई कोर्ट से जुड़ी दो महत्वपूर्ण खबरें और भी आईं। पहली यह कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यौन शोषण और उत्पीड़न के गंभीर आरोपी पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता चिन्मयानंद को जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया और इसके साथ ही पीड़िता की नीयत पर भी सवाल खड़े कर दिए। इसके दो दिन बाद ही दूसरी खबर यह आती है कि सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने चिन्मयानंद की जमानत मंजूर करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के अतिरिक्त जज राहुल चतुर्वेदी को पदोन्नत कर स्थायी जज के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की है। यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि कोई तीन साल पहले सामूहिक बलात्कार के आरोप में जेल में बंद उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति को जमानत देने वाले एक स्पेशल जज (पॉस्को एक्ट) को इलाहाबाद हाई कोर्ट प्रशासन ने निलंबित कर उनके खिलाफ जांच बैठा दी थी।

ये और इनके जैसी अन्य तमाम खबरें बताती हैं कि देश की अन्य संवैधानिक संस्थाओं की तरह हमारी न्यायपालिका भी इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रही है और उसका भी तेजी से क्षरण हो रहा है। न सिर्फ उसकी कार्यशैली और फैसलों पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि उसकी हनक भी लगातार कम हो रही है। अदालती फैसलों को लागू कराने के लिए जिम्मेदार मानी जाने वाली कार्यपालिका यानी सरकार के विभिन्न अंग भी कई मामलों में अदालती आदेशों की अनदेखी कर रहे हैं या उसके विपरीत काम कर रहे हैं। 

हालांकि न्यायपालिका का क्षरण कोई नई परिघटना नहीं है। यह सिलसिला बहुत पहले से चला आ रहा है। कुछ पुराने और बड़े उदाहरण इस हकीकत की तसदीक करते हैं। 

वैसे अदालतों में होने वाली गड़बड़ियों को लेकर संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत के भीतर से ही आवाज उठने और पीठासीन जजों का अपनी मातहत अदालतों को फटकार लगाने का सिलसिला भी पुराना है। दो साल पहले तो सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने प्रधान न्यायाधीश की ही संदेहास्पद कार्यशैली पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठा दिए थे और देश के लोकतंत्र को खतरे में बताया था। मीडिया से मुखातिब चारों जजों ने यद्यपि सरकार को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की थी, लेकिन सरकार और सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ताओं ने उन चार जजों के बयान पर जिस आक्रामकता के साथ प्रतिक्रिया जताई थी और प्रधान न्यायाधीश का बचाव किया था, वह भी न्यायपालिका की पूरी कलंक-कथा को उजागर करने वाला था।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पीवी सावंत ने एक टीवी इंटरव्यू में चारों जजों के बयान को देशहित में बताते हुए कहा था कि देश की जनता को यह समझ लेना चाहिए कि कोई भी न्यायाधीश भगवान नहीं होता। न्यायपालिका के रवैये पर कठोर टिप्पणी करते हुए उन्होंने दो टूक कहा था कि अदालतों में अब आमतौर पर फैसले होते हैं, यह जरूरी नहीं कि वहां न्याय हो।

न्यायपालिका में लगी भ्रष्टाचार की दीमक और न्यायतंत्र पर मंडरा रहे विश्वसनीयता के संकट ने ही करीब एक दशक पहले देश के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाड़िया को यह कहने के लिए मजबूर कर दिया था कि जजों को आत्म-संयम बरतते हुए राजनेताओं, मंत्रियों और वकीलों के संपर्क में रहने और निचली अदालतों के प्रशासनिक कामकाज में दखलंदाजी से बचना चाहिए। 16 अप्रैल 2011 को एमसी सीतलवाड स्मृति व्याख्यान देते हुए न्यायमूर्ति कपाड़िया ने कहा था कि जजों को सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति के लोभ से भी बचना चाहिए, क्योंकि नियुक्ति देने वाला बदले में उनसे अपने फायदे के लिए निश्चित ही कोई काम करवाना चाहेगा। उन्होंने जजों के समक्ष उनके रिश्तेदार वकीलों के पेश होने की प्रवृत्ति पर भी प्रहार किया था और कहा था कि इससे जनता में गलत संदेश जाता है और न्यायपालिका जैसे सत्यनिष्ठ संस्थान की छवि मलिन होती है। 

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात को सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रहे वीएन खरे ने तो बड़े ही सपाट अंदाज में स्वीकार किया था। 2002 से 2004 के दौरान सर्वोच्च अदालत के मुखिया रहे जस्टिस खरे ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था- ”जो लोग यह दावा करते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नहीं है, मैं उनसे सहमत नहीं। मेरा मानना है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का यह नासूर ऐसा है जिसे छिपाने से काम नहीं चलेगा, इसकी तुरंत सर्जरी करने की आवश्यकता है।’’ जस्टिस खरे ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए महाभियोग जैसे प्रावधान और उसकी प्रक्रिया को भी नाकाफी बताया था।

ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका में जारी गड़बड़ियों से आम आदमी बेखबर हो, लेकिन मुख्य रूप से दो वजहों से ये गड़बड़ियां कभी सार्वजनिक बहस का मुद्दा नहीं बन पातीं। एक तो लोगों को न्यायपालिका की अवमानना के डंडे का डर सताता है और दूसरे, अपनी तमाम विसंगतियों और गड़बड़ियों के बावजूद न्यायपालिका आज भी हमारे लोकतंत्र का सबसे असरदार स्तंभ है, जिसे हर तरफ से आहत और हताश-लाचार आदमी अपनी उम्मीदों का आखिरी सहारा समझता है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

सावरकर के बचाव में आ रहे अनर्गल तर्कों और झूठ का पर्दाफाश करना बेहद जरूरी

एबीपी न्यूज पर एक डिबेट के दौरान एंकर रुबिका लियाकत ने यह सवाल पूछा कि, कांग्रेस के कितने नेताओं...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.