Tuesday, December 7, 2021

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कृषि कानूनों में काला क्या है-5:पूरी तरह से असंवैधानिक है कांट्रैक्ट फार्मिंग कानून

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कांट्रैक्ट फार्मिंग संबंधी बनाए गए कानून का नाम ‘कृषक सशक्तिकरण और सुरक्षा कीमत आश्वासन और कृषि सेवा विस्तार कृषि सेवा करार कानून 2000’ तो बड़ा आकर्षक रखा गया है परंतु हकीकत में यह नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली बात है। यह कानून पूरी तरह से असंवैधानिक है,क्योंकि किसानी केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं है बल्कि राज्य क्षेत्र के अधिकार में है। यह कानून न तो किसानों को सशक्तिकरण देने वाला है और न ही उनकी सुरक्षा करने वाला है, न ही फसल की कीमत पर विश्वास दिलाने वाला है। इसकी व्याख्या से पता चलता है कि यह  किसानों के साथ किया गया क्रूर मजाक है और मोदी सरकार के अन्य जुमलो की तरह जुमलेबाजी है।

यह कानून पूरी तरह से असंवैधानिक है क्योंकि किसानी केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं है।इस पर सातवें शेड्यूल की तीन नंबर सूची की एंट्री नंबर 33 लागू नहीं होती ।यह कानून वाणिज्य और व्यापार के साथ संबंध नहीं रखता, खेती करने के साथ संबंधित है और सीधे तौर पर राज्य सरकार के कानून बनाने की सूची की 14 नंबर एंट्री में आता है ।जिसके द्वारा राज्य सरकार खेती संबंधी कानून बनाने का अधिकार रखती है न कि केंद्र सरकार।

संविधान के अनुच्छेद 254 के अनुसार यदि संसद कोई कानून बनाती है जो कि संसद के कानून बनाने के अधिकार क्षेत्र मैं है और वह कानून संविधान की सातवीं अनुसूची के सूची नंबर 3 जो राज्य सरकार और केंद्र सरकार के साझे अधिकार क्षेत्र में है तो संसद का बनाया कानून राज्य सरकारों पर लागू होगा ।पर अनुबंध खेती यानी कांट्रैक्ट फार्मिंग संबंधी कानून बनाया गया और कानून सांझी  सूची की एंट्री नंबर 33 में नहीं आता। क्योंकि यह  खेती संबंधित कानून है न कि वाणिज्य और व्यापार संबंधित। यह राज्य सूची की एंट्री नंबर 14 के अंतर्गत आता है, इसलिए यह कानून असंवैधानिक है और इसका संवैधानिक अस्तित्व नहीं है।

यह कानून संविधान के संघीय ढांचे पर सीधी चोट है। इस कानून की धारा 16 में कहा गया है कि इस कानून को लागू करने के संबंध में केंद्र सरकार नियम बनाएगी और राज्य सरकारों को  यह कानून लागू करने के बाबत हिदायत देगी, जिसे मारने के लिए राज्य सरकार बाध्य होंगी ।इस तरह इस कानून से राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के अधीन संस्था में बदल दिया गया है जो भारत के संघीय ढांचे और संविधान की अवधारणा के विरुद्ध है। केंद्र सरकार स्वयं को मालिक और राज्य सरकारों को अपने अधीन मान रही है सवाल यह है कि क्या राज्य सरकारें इसे स्वीकार करेंगी,क्यों, क्योंकि यह राज्य सरकारों के अधिकारों का डेथ वारंट है।

कृषक सशक्तिकरण और सुरक्षा कीमत आश्वासन और कृषि सेवा विस्तार कृषि सेवा करार कानून 2000 में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का प्रावधान किया गया था। इसमें कृषि व्यापार करने वाली कंपनियों और विक्रेता के साथ कॉन्ट्रैक्ट करके पहले से तय एक दाम पर भविष्य में अपनी फसल बेचने की बात कही गई थी। जिन किसानों के पास 5 हेक्टेयर से कम जमीन है, उन्हें कॉन्ट्रैक्ट से लाभ देने की बात कही गई थी। अनुबंध के बाद किसानों को तकनीकी सहायता और ऋण की सुविधा देने की भी बात थी। इसके अलावा इसमें और भी कुछ प्रावधान थे। कांट्रैक्ट फार्मिंग में कोई भी विवाद होने पर उसका फैसला सुलह बोर्ड में होगा। जिसका सबसे पावरफुल अधिकारी एसडीएम को बनाया गया है। इसकी अपील सिर्फ डीएम यानी कलेक्टर के यहां होगी। सरकार ने किसानों के कोर्ट जाने का अधिकार भी छीन लिया है।

किसानों का विरोध करते हुए ये कहना था कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के दौरान किसान खरीदने वाले से बिक्री को लेकर चर्चा नहीं कर पाएगा। बड़ी कंपनियां छोटे किसानों से खरीदारी नहीं करेंगी। ऐसे में उन्हें नुकसान होगा। अगर सौदे के दौरान कोई विवाद होता है तो बड़ी कंपनियों ज्यादा मजबूत स्थिति में रहेंगी।किसानों की कोई नहीं सुनेगा। इसके अलावा 5 हेक्टेयर से कम जमीन वाले मामले में किसानों की भीड़ अधिक होने से उनसे कोई सौदा नहीं करेगा।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत बड़े खरीदारों के एकाधिकार को बढ़ावा मिलता है। इसके तहत किसानों को खेती की कम कीमत देकर उनका शोषण करने की आशंका रहती है। बड़े किसानों के मुकाबले छोटे किसानों को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कम लाभ मिलेगा। यह कानून किसी भी किसान के उत्पादन या किसी भी खेत की पैदावार से पहले किसान और खरीदार के बीच एक समझौते के माध्यम से अनुबंध खेती के लिए एक राष्ट्रीय ढांचा है।

फार्मिंग एग्रीमेंट ये अधिनियम कृषि उपज के उत्पादन या किसी भी खेत की पैदावार से पहले किसान और खरीदार के बीच कृषि समझौता प्रदान करता है। स्पष्ट है कि अनुबंधित कृषि समझौते में किसानों का पक्ष कमजोर होगा और वे कीमतों का निर्धारण नहीं कर पाएंगे।छोटे किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कैसे कर पाएंगे? क्योंकि प्रायोजक उनसे परहेज कर सकते हैं।नई व्यवस्था किसानों के लिए परेशानी होगी। विवाद की जड़ में तीन चीजें हैं, कंपनी सही रेट देंगी ये कैसे तय होगा, किसान कंपनियों के चंगुल में न फंस जाएं और तीसरा अगर कंपनी और किसान में विवाद हुआ तो कोर्ट जाने की छूट क्यों नहीं है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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