Monday, August 8, 2022

यूपी चुनाव में जो दांव पर लगा है

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यह कहावत बहुचर्चित है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है। यानी अक्सर यह होता है कि जो पार्टी/ गठबंधन उत्तर प्रदेश में विजयी होता है, वही दिल्ली यानी राष्ट्रीय स्तर पर भी राज करता है। हालांकि इस कथन के अपवाद भी मौजूद हैं, लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं करता कि आबादी के लिहाज से भारत का सबसे बड़ा राज्य होने के कारण उत्तर प्रदेश हमेशा ही देश की राजनीति को प्रभावित करता है। इसीलिए अब जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव की बिसात सज चुकी है, तो भले इसके साथ ही चार अन्य राज्यों में भी चुनाव हो रहे हों, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चित यूपी में बने समीकरण ही हैं। इन समीकरणों का क्या परिणाम होगा, यह जानने में सारे देश की दिलचस्पी है।

बेशक, अगले दस मार्चों को आने वाले चुनाव नतीजों से यह मालूम होगा कि उत्तर प्रदेश में अगले पांच साल के लिए किसकी सरकार बनेगी। मगर दीर्घकालिक और व्यापक नजरिए से देखें, तो यूपी में और भी बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। उस लिहाज से निगाहें उन ट्रेंड्स (रुझानों) को देखने पर टिकी होंगी, जिनसे आज की चुनावी राजनीति के आम व्याकरण को समझने में मदद मिलेगी। भारत के भविष्य के लिहाज से ये पहलू बेहद महत्त्वपूर्ण है।

बहरहाल, अभी हम उन रुझानों का सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैँ। इसके लिए यूपी में बिछी सियासी बिसात पर नजर डालना जरूरी है। तो पहले हम ध्यान उन दलों/ गठबंधनों पर डालते हैं, जिनके बीच ये अहम चुनावी मुकाबला है।

The Defender

भारत में 2014 के बाद हुई राजनीतिक गोलबंदी के बीच लगभग हर चुनाव का स्वरूप हिंदू राष्ट्रवाद बनाम धर्मनिरपेक्षता का बन जाता रहा है। इनमें हिंदुत्व समर्थक समूहों का हर जगह समर्थन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में रहता है। यूपी के इस चुनाव में मोदी के साथ राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम भी जुड़ा है। यानी मोदी-योगी का एक ध्रुव सामने है। इसकी वजह यह है कि पिछले पांच वर्ष में योगी आदित्यनाथ भी हिंदुत्व के उतने ही आक्रामक चेहरे के रूप में उभरे हैं, जैसी पहचान प्रधानमंत्री की रही है।

तो इस चुनाव में भाजपा मोदी-योगी के खास स्टाइल वाले ध्रुवीकरण की ताकत के साथ मैदान में है। अगर पिछले रिकॉर्ड के आधार पर देखें, तो भाजपा नेतृत्व वाला गठबंधन अपराजेय नजर आएगा। भाजपा को 2017 के विधानसभा चुनाव में 40 फीसदी वोट मिले थे। उसके पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में 42.6 और 2019 के लोकसभा चुनाव में 50 प्रतिशत वोट मिले। यानी बीते आठ साल में कभी उसका वोट प्रतिशत 40 से नीचे नहीं आया। यह साफ है कि अगर इस बार इस वोट आधार में भारी क्षरण नहीं हुआ, तो भाजपा की जीत रोकी नहीं जा सकती। तो असल सवाल यहीं आकर टिक जाता है कि 2019 के बाद से आखिर भाजपा के समर्थन आधार में कितना क्षरण हुआ है?

अगर 2014 के बाद भी भारत में राजनीति पहले जैसे आम व्याकरण या डायनेमिक्स (गतिशास्त्र) से चलती, तो इस बार भाजपा के समर्थन आधार में भारी क्षरण की संभावना सहज ही जताई जा सकती थी। इसलिए कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर के समय दिखे भयानक मंजर, कमरतोड़ महंगाई, बेरोजगारी, पुलिस ज्यादतियों से भरे शासन और कानून-व्यवस्था की मौजूदा खराब हालत के बीच सामान्यतः कोई भी पार्टी दोबारा सत्ता में लौटने की उम्मीद नहीं कर सकती। 1980 के बाद उभरा राजनीति का आम व्याकरण incumbency बनाम anti-incumbency से निर्मित हुआ था। उसमें यह समझा जाता था कि रोजमर्रा की जिंदगी के मसलों पर खराब शासन देने वाली पार्टी को मतदाता दंडित करते हैं।

लेकिन मोदी काल में भाजपा की कामयाबी का यही राज़ है कि उसने इस व्याकरण को बदल दिया है। वह राजनीति को एक नए तरह के नैरेटिव (कथानक) पर केंद्रित करने में सफल हो गई है। पहले चुनावों का नैरेटिव विकास, महंगाई और जन कल्याण से जुड़े कार्यों पर सत्तासीन दल के प्रदर्शन और उनकी सोच से बनता (या बनाया जाता) था। भाजपा ने 1990 के दशक में अपने उभार के साथ इस व्याकरण को बदलना शुरू किया, जब उसने हिंदुओं के बीच उत्पीड़ित होने की ग्रंथि फैलाई और हिंदू गौरव स्थापित करने की कहानी पेश करते हुए मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को अपने पक्ष में गोलबंद करना शुरू किया। लगभग ढाई दशक तक इस रणनीति और पुराने व्याकरण के बीच संघर्ष बना रहा। लेकिन इस बीच मोदी भाजपा की इस रणनीति का सबसे प्रभावी चेहरा बन कर उभरे। इजारेदार पूंजी ने अपनी वजहों से इस चेहरे को अपनाया। उसके प्रचार तंत्र ने इस चेहरे को चमकाया और जनता के एक बड़े हिस्से में उसे स्वीकृति दिलाई।

नतीजतन, 2014 में जब मोदी ने भाजपा का नेतृत्व संभाला, तो उसके साथ ही पुरानी राजनीति का व्याकरण बेअसर हो गया। इस बात का सबसे पहला प्रमाण उत्तर प्रदेश में ही 2017 में देखने को मिला। तब यहां विधानसभा चुनाव नोटबंदी की पृष्ठभूमि में हुआ था। नोटबंदी के दौरान जैसी दिक्कतों से लोगों को गुजरना पड़ा, उसके बाद अगर सामान्य राजनीति का दौर रहता, तो उस दुस्साहस के लिए जिम्मेदार दल के विजयी होने की कोई गुंजाइश नहीं होती। लेकिन चुनाव का मुख्य नैरेटिव वो दिक्कतें नहीं, बल्कि ‘श्मशान बनाम कब्रिस्तान’ बना। उससे जो एकतरफा नतीजा सामने आया, उसका साफ संदेश था कि देश की सियासत का ढर्रा अब बदल चुका है।

इसीलिए अब जबकि फिर से यूपी में विधानसभा का चुनाव हो रहा है, तो यह सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या इसमें anti-incumbency का फैक्टर निर्णायक होगा? इस पहलू से भाजपा समर्थक वोटों का कितना हिस्सा टूटेगा? दूसरी तरफ यह प्रश्न भी है कि मोदी-योगी के नैरेटिव से उनमें से कितने वोटर अब भाजपा के पक्ष में जा चुके हैं, जिन्होंने 2017 में उसे वोट नहीं दिया था?

जाहिर है, यह चुनाव मोदी काल में उग्र हिंदुत्व की भाजपाई रणनीति का बड़ा इम्तिहान है। 2014 से लगातार ये रणनीति सफल रही है। इसके जरिए भाजपा ने अपने प्रभाव क्षेत्र वाले राज्यों में (सिर्फ एक या दो मौकों को छोड़ कर) हर संसदीय या विधानसभा चुनाव में 30 फीसदी से अधिक वोट प्राप्त किए हैं। साथ ही उसने उन राज्यों में अपना विस्तार किया है, जहां पहले उसका आधार नहीं था। मसलन, पिछले साल पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में वह 38 फीसदी वोट पाने में सफल रही। चुनावी रूप से हार जाने के बावजूद यह एक तरह से उसकी राजनीतिक जीत थी।

कहने का सार यह है कि 2014 से लेकर अब तक इस बात का कोई संकेत नहीं मिला है कि हिंदुत्व की राजनीति से भाजपा ने एक तिहाई से अधिक मतदाताओं की जो गोलंबदी की है, वह कहीं कमजोर पड़ी है। अब जबकि उत्तर प्रदेश में चुनाव हो रहा है, तो वहां यही प्रश्न सबसे ज्यादा दांव पर लगा है कि कोरोना काल में आई स्वास्थ्य संबंधी तथा इस काल में और अधिक गहरा गई आर्थिक मुसीबतों से क्या भाजपा के समर्थन आधार पर कोई असर पड़ा है?

अर्थशास्त्र के law of diminishing returns का इस्तेमाल अक्सर राजनीति के रुझान को समझने के लिए किया जाता है। इस नियम का अर्थ यह है कि अगर उत्पादन के जरूरी तमाम वस्तुओं (इनपुट) में किसी एक का ही लगातार निवेश बढ़ाया जाए- यानी बाकी इनपुट की मात्रा स्थिर रहे- तो एक सीमा के बाद उत्पादन की मात्रा में बढ़ोत्तरी रुख जाती है। भाजपा के संदर्भ में इस नियम का अर्थ यह है कि उसने हिंदुत्व (यानी सांप्रदायिकता) के तत्व को लगातार बढ़ाया है, लेकिन राजकाज के दूसरे पहलुओं में सुधार तो दूर, उनमें लगातार गिरावट आई है। ऐसे में क्या एक सीमा के बाद हिंदुत्व का पहलू भाजपा के लिए सकारात्मक नतीजे देने में नाकाम हो जाएगा? यूपी का वर्तमान चुनाव इस प्रश्न का संभवतः एक सटीक टेस्ट केस साबित होगा। 

The Challenger

यह निर्विवाद है कि भाजपा की सत्ता को इस चुनाव में सबसे प्रमुख चुनौती समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन से मिल रही है। कहा जा सकता है कि सपा By Default (यानी अपने किसी सचेत प्रयास के बजाय राज्य में किसी अन्य मजबूत सक्रिय विपक्षी दल की अनुपस्थिति के कारण) इस हैसियत में पहुंची है। उसका सचेत प्रयास सिर्फ यह रहा है कि उसने अनेक ऐसे छोटे दलों के साथ गठबंधन बनाया है, जिनके बारे में माना जाता है कि उनका किसी एक जाति विशेष में अपेक्षाकृत मजबूत समर्थन आधार है। इनमें राष्ट्रीय लोक दल को छोड़ कर लगभग तमाम जातियां ऐसी हैं, जिन्हें पिछड़ी जातियों में गिना जाता है। उनमें ऐसे दल भी शामिल हैं, जो कुछ समय पहले तक भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा थे। बाद में ओबीसी के तहत ही आने वाली कुछ जातियों के नेता भाजपा छोड़ कर सीधे सपा में शामिल हो गए।

इससे ये धारणा बनी है कि सपा जनसंख्या के लिहाज से बहुसंख्या वाले सामाजिक समीकरण का नेतृत्व कर रही है। चूंकि ये धारणा पहले से रही है कि यूपी में मुस्लिम समुदाय का बहुत बड़ा हिस्सा सपा को वोट देता है, इसलिए इस गठबंधन को चुनाव जीतने में सक्षम माना जा रहा है। बल्कि कुछ ऐसे उत्साही विश्लेषक भी हैं, जो गठबंधन को अपराजेय मान रहे हैं।

उन विश्लेषकों की गणना का जो आधार है, अगर वह सचमुच आज भी कारगर है, तो उनका अनुमान सही साबित होना चाहिए। लेकिन ये अगर बहुत बड़ा अगर है। क्यों? इसे समझने के लिए हमें सपा नेतृत्व वाले गठबंधन की ताकत और संभावित कमजोरियों पर अलग-अलग गौर करना चाहिए।

सपा गठबंधन की ताकत

●         सपा गठबंधन By Default उस स्थिति में है, जिसमें भाजपा विरोधी मतदाता उसे वोट देंगे। घोर ध्रुवीकरण के इस दौर में चुनाव में इस हैसियत में होना खासा लाभदायक होता है। मसलन, पश्चिम बंगाल में भाजपा को हराने की इच्छा रखने वाले तमाम मतदाता तृणमूल कांग्रेस के इर्द-गिर्द इकट्ठे हुए। उसका खामियाजा लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन को भुगतना पड़ा। यूपी में भाजपा विरोधी मतदाताओं की वैसी गोलबंदी बेशक सपा के इर्द-गिर्द ही हो सकती है, क्योंकि वही भाजपा को हराने में सबसे अधिक सक्षम दिख रही है।

● सपा 2017 के 22 प्रतिशत वोट आधार के साथ चुनाव में उतरी है। उस समय सपा के साथ anti-incumbency का फैक्टर था। साथ ही भाजपा की लहर चरम पर थी। अगर उस समय भी सपा को इतने वोट मिले, तो इस अनुमान का ठोस आधार है कि इस बार उसे मिलने वाले वोटों की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी।

●         किसान आंदोलन ने जो भाजपा विरोधी माहौल बनाया है, उसका लाभ भी सपा गठबंधन के खेमे में जाने की उम्मीद की जा सकती है।

संभावना पर सवाल

●         लेकिन अनेक विश्लेषक ओबीसी गोलबंदी की उम्मीद से सपा के पक्ष में जैसा उत्साही अनुमान लगा रहे हैं, वह असल में एक बड़े अगर पर निर्भर है। एक तरह से यह 2014 के बाद बने सियासी माहौल में जातीय समीकरणों के आधार पर चुनाव जीतने की बनी-बनाई धारणा का टेस्ट केस है।

●         1990 के दशक में- जब मंडलवादी राजनीति अपने धारदार दौर में थी- तब ये धारणा बनी थी कि अगर उत्पीड़ित रहीं जातियों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता और दल एकजुट हो जाएं, यह चुनाव परिणाम को तय करने वाला कारक बन जाता है। तब कम से कम उत्तर प्रदेश और बिहार में ये बात पक्की समझी जाती थी। दरअसल, इस सदी के पहले दशक तक ये पहलू निर्णायक बना रहा। लेकिन उसके बाद आरएसएस-भाजपा ने हिंदुत्व की बड़ी अस्मिता में जिस तरह से जातीय अस्मिताओं को शामिल करने में सफलता पाई है, उसके बाद भी ये पहलू कारगर है, यह संदिग्ध हो गया है।

●         हाल के कई चुनावों में यह रणनीति सफल नहीं रही है। 2019 के आम चुनाव में सपा और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन इस समझ के मुताबिक अपराजेय लगता था। उधर बिहार में राष्ट्रीय जनता पार्टी ने उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश साहनी समेत जातीय आकांक्षाओं के प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले दलों/नेताओं का एक मजबूत गठबंधन तैयार किया था। इसके बावजूद जैसा चुनाव नतीजा सामने आया, उससे 1990 के दशक की तरह जातीय समीकरण से चुनाव जीत सकने के भरोसे को फिर गहरा झटका लगा।

●         तो यही सवाल यूपी में एक टेस्ट केस बन कर खड़ा है कि क्या ओपी राजभर या स्वामी प्रसाद मौर्य या धर्मेंद्र सैनी और यहां तक कि राष्ट्रीय लोक दल के भी साथ आ जुड़ने से सचमुच उनसे जुड़ी समझी जाने वाली जातियों के मतदाता भी इस गठबंधन के पक्ष में गोलबंद हो जाएंगे?

●         वैसे सपा के नेतृत्व वाला गठबंधन बहुजन की नुमाइंदगी कर रहा है, इस दावे में एक छेद उसमें दलित प्रतिनिधित्व की कमी भी है। अगर जातीय समीकरण की बात है, तो यह सवाल पूछा ही जाएगा कि इस गठबंधन में दलित चेहरा कौन है?

●         आम तौर पर परसेप्शन (धारणा) और नैरेटिव (कथानक) को राजनीति में सबसे प्रभावी तत्व समझा जाता है। इस बिंदु पर सवाल है कि अखिलेश यादव (यानी सपा) का नैरेटिव क्या है? उनका एक नैरेटिव है प्रमुख विपक्ष होना। दूसरा नैरेटिव बहुजन एकजुटता का है। लेकिन पहले नैरेटिव की कमजोरी यह है कि यह नकारात्मक है। यानी सपा कोई सकारात्मक सपना जगाते हुए नहीं, बल्कि सिर्फ भाजपा के कथित कुशासन से मुक्ति दिलाने के लिए वोट मांग रही है। जहां तक दूसरे नैरेटिव का प्रश्न है, तो वह एक टेस्ट केस के रूप में हमारे सामने मौजूद है। वह किस हद तक चलेगा, इसको लेकर अभी अधिक आस जोड़ने का कोई पक्का आधार नहीं है।

●         अखिलेश यादव अगर दूरदर्शिता दिखाते, तो वे अपने नैरेटिव में दलित चेहरे की कमी के साथ-साथ आरएसएस-भाजपा के सक्रिय वैचारिक विरोध का तत्व भी जोड़ सकते थे। चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाली आजाद समाज पार्टी अगर उनके गठबंधन का हिस्सा होती, तो उससे ये दोनों पहलू वहां मौजूद दिखते। आखिर चंद्रशेखर आजाद उन नेताओं में हैं, जो एंटी-सीएए प्रोटेस्ट से लेकर किसान आंदोलन और दलित उत्पीड़न के तमाम स्थलों पर संघर्षशील नजर आए हैँ। चूंकि सपा ने चंद्रशेखर को जोड़ने की जरूरत नहीं समझी, तो अब आजाद समाज पार्टी अलग से मैदान में है। गौरतलब है कि अपनी अपेक्षाकृत कमजोर ताकत के बावजूद वह लगातार सुर्खियों में बनी हुई है।     

Silent Player

बहुजन समाज पार्टी को 2017 के चुनाव में 22.4 फीसदी वोट मिले थे। इस तरह वह दूसरे नंबर पर रही थी। जाहिर है, यह संख्या सही सूरत को नहीं बताती। इसलिए कि सपा ने तब कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था, इसलिए उसके उम्मीदवार कम सीटों पर मौजूद थे। बहरहाल, यह तो निर्विवाद है कि बसपा के पास उस समय तक एक मजबूत जनाधार मौजूद था। इसके बावजूद यह रहस्यमय है कि खासकर 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद क्यों ये पार्टी निष्क्रिय और खामोश दिखने लगी? यहीं तक नहीं, वैचारिक और राजनीतिक मुद्दों पर अक्सर यह भाजपा के पीछे चलती नजर आने लगी। उसकी इसी रहस्यमय भूमिका का नतीजा है कि आज आम धारणा में उसे भाजपा का चैलेंजर नहीं समझा जा रहा है। उसकी इसी खामोशी का परिणाम है कि सपा By Default यूपी में भाजपा की अकेली चैलेंजर समझी जा रही है।

इसके बावजूद यह सोचना सही नहीं होगा कि इस धारणा के अनुपात में ही बसपा का आधार भी क्षीण हो चुका है। अब यह दस मार्च को मालूम होगा कि आखिर उसके समर्थन आधार का कितना हिस्सा अब भी उसके साथ है और उस समर्थन के आधार पर वह कितनी सीटें जीत पाती है। बहरहाल, यह अनुमान अभी भी लगाया जा सकता है कि ऐसी बहुत-सी विधानसभा सीटें होंगी, जहां का परिणाम तय करने में बसपा उम्मीदवारों के प्रदर्शन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी।

The Emerging Contender

उत्तर प्रदेश में पिछले तीन दशकों के इतिहास की वजह से यह आम समझ है कि कांग्रेस का वहां कोई ज्यादा दांव नहीं है। जिस समय चुनाव का नतीजा भाजपा बनाम भाजपा विरोध की गोलबंदी से तय होना लगभग निश्चित हो, उस समय किसी तीसरे दल के लिए स्थितियों का प्रतिकूल होना लाजिमी है। 2017 में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 6.3 तक गिर गया था। स्पष्टतः ऐसी सूरत किसी पार्टी का मनोबल तोड़ने के लिए काफी होती है। लेकिन तमाम संकेत हैं कि कांग्रेस ने ऐसा नहीं होने दिया है।

बल्कि यह जानते हुए कि उसका ज्यादा कुछ दांव पर नहीं है, उसने एक अलग दांव खेला है। इसके जरिए उसने एक नई शुरुआत का संकेत दिया है। ये शुरुआत भी फौरी नहीं है। बल्कि खासकर 2019 के आम चुनाव के बाद से कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने अपनी छवि ऐसी नेता की बनाई है, जो यूपी में जहां कहीं अत्याचार हो, वहां जाकर वो खड़ी होती हैं। एंटी-सीएए प्रोटेस्ट के दौरान उत्पीड़ित हुए लोगों से लेकर हाथरस, प्रयागराज, सोनभद्र, लखीमपुर खीरी, पहले लॉकडाउन के बाद माइग्रेंट लेबर्स की मदद आदि जैसी अनेक मिसालें हैं, जहां विपक्ष की भूमिका निभाती सिर्फ वे और उनके समर्थक नजर आए।

अब इस चुनाव में कांग्रेस ने इस पहलू को ही अपना यूएसपी (खास पहचान) बनाने की कोशिश की है। उसने भाजपा राज में उत्पीड़न का शिकार हुए चेहरों को चुनाव मैदान में उतार कर भाजपा के वैचारिक और राजनीतिक विरोध की मुख्य शक्ति के रूप में खुद को पेश करने की कोशिश की है। इस रूप में कांग्रेस और आजाद समाज पार्टी ही दो ऐसी ताकतें नजर आती हैं, जो उस समय भी प्रखर विरोध की भूमिका में नजर आए, जब चुनाव सामने नहीं था। इस विधानसभा चुनाव में इन दलों को ज्यादा सफलता मिलेगी, यह अनुमान शायद खुद उन्हें भी नहीं होगा। लेकिन ये दोनों पार्टियां अपनी एक दीर्घकालिक भूमिका बनाती नजर आ रही हैं। अपनी पहले की सक्रियता और इस चुनाव में जिन चेहरों के साथ कांग्रेस मैदान में उतरी है, उससे वह अनेक विश्लेषकों को एक उभरते हुए ऐसे दावेदार के रूप में नजर आने लगी है, जिसकी राजनीति का संदर्भ दूरगामी है।

बहरहाल, यहां आज की इस परिस्थिति पर भी ध्यान दे लेना उचित होगा कि अब देश में चुनाव में Pole Position (अग्रणी या वर्चस्व की स्थिति) सिर्फ सियासी समीकरण या incumbency/ anti-incumbency के फैक्टर या चुनावी वायदों से तय नहीं होता। इसका कारण यह है कि अब चुनावों में मुकाबले का समान धरातल नहीं रह गया है। अब न सिर्फ पैसा और प्रचार शक्ति का पूरा साथ भाजपा के पक्ष में है, बल्कि प्रशासन और स्वायत्त कही जाने वाली संस्थाएं भी उसके हित साधती नजर आती हैं। ऐसे में चुनावी मुकाबला असमान हो जाता है। उस हाल में भाजपा को हराना तभी संभव होता है, उसके खिलाफ पूरा ध्रुवीकरण हो। इसके लिए जरूरी होता है कि चैलेंजर लगातार आक्रामक रुख अपनाए रखे और सभी संभव विरोधी ताकतों को एकजुट करे। क्या सपा ऐसा कर पाई है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें दस मार्च तक का इंतजार करना होगा।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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