Monday, January 24, 2022

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क्या एप्को वर्ल्डवाइड के जरिए खड़े किये गये मोदी के रेत के महल का गिरना तय है?

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संघ द्वारा गुजरात का मुख्यमंत्री मनोनीत किये जाने पर 7 अक्टूबर, 2001 को पद की शपथ लेने और फिर साढ़े चार महीने बाद 24 फरवरी, 2002 में पूंजीपतियों के सहयोग से उप-चुनाव जीतकर गुजरात की सत्ता पर कब्जा करने के बाद नरेंद्र दामोदरदास मोदी की महत्वाकांक्षा ने जोर मारा तो उन्होंने 2014 में देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए दुनियाभर में सच को झूठ और झूठ को सच में बदलने के लिए कुख्यात अमेरिकी पीआर कंपनी ‘एप्को वर्ल्डवाइड’ को वर्ष 2006 में धुआंधार प्रचार कर अपनी छवि निर्माण का ठेका दे दिया। इसकी शुरुआत गुजरात को भारत का सर्वश्रेष्ठ निवेश स्थल के रूप में प्रचारित करने के अलावा अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मोर्चे पर उनकी हैसियत में इजाफा करने के रूप में हुई। 
नाजी प्रोपेगैंडा के उस्ताद जोसेफ गोयबल्स का अनुकरण करते हुए गुजरात के रास्ते भारत में चुपके से दाखिल हुई ‘एप्को वर्ल्डवाइड’ ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वाइब्रेंट गुजरात’ सम्मेलनों का पूरा डिजाइन तैयार किया। इन आलीशान समारोहों की वार्षिक श्रृंखला के माध्यम से विकास के ‘गुजरात मॉडल’ की हवाबाजी करके एप्को वर्ल्डवाइड ने एक बड़ा भ्रमजाल फैलाया। जबकि राष्ट्रीय विकास सूचकांक में यह प्रदेश अन्य राज्यों की अपेक्षा बहुत पीछे चल रहा था।
एप्को वर्ल्डवाइड का विस्तार—इस कंपनी ने शुरुआती दौर में अमेरिका में तंबाकू और स्वास्थ्य बीमा उद्योगों के लिए लॉबीइंग का काम किया। इसके साथ-साथ यह संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व बैंक और ‘एसोसिएशन ऑफ साउथ-ईस्ट एशियन नेशंस’ के अलावा इस्राइल और कजाकस्तान की जनसंपर्क एजेंसी का काम करती है। 
एप्को के साथ वैश्विक स्तर पर ताकतवर लॉबियां जुड़ी हुई हैं। जिनमें इस्राइल के पूर्व प्रधानमंत्री यित्जाक रॉबिन के पूर्व मीडिया सलाहकार और यहूदियों के ताकतवर संगठन केरेन हेयेसोड के पूर्व महानिदेशक गैड बेन एरी, यूरोपीय रक्षा कंपनी ईएडीएस और यूरोपीय आयोग के पूर्व अधिकारी फिलिप्प मेज सेंसियर, वाशिंगटन के मशहूर लॉबीइस्ट बेरी शूमाकर, इंग्लैंड में लेबर पार्टी के राजनीतिक सलाहकार एलेक्स बिघम शामिल हैं।
झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाकर लोगों को भ्रमित करने के लिए बदनाम एप्को वर्ल्डवाइड के पोलैंड के पूर्व राष्ट्रपति एलेक्सजेंडर क्वावास्नीवस्की, इस्राइल के पूर्व राजदूत इतामर रॉबिनेविच, भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत टिमोथी रोमर के साथ गहरे ताल्लुक बताये जाते हैं। कहा जाता है कि रोमर के नई दिल्ली और मुंबई में राजनेताओं, राजनयिकों और उद्योगपतियों के साथ अच्छे सम्बंध हैं। यह कंपनी नाइजीरिया के पूर्व तानाशाह सानी अबाचा, कजाकस्तान के राष्ट्रपति नजरबाएव और माफिया के साथ सम्बंध रखने वाले रूसी खरबपति मिखाइल खोदरकोवस्की के लिए भी काम कर चुकी है। इसी कंपनी ने बराक ओबामा के पहले चुनाव में उनके प्रचार का काम संभाला था। 
भ्रम का मायाजाल फैलाने में माहिर इस कंपनी द्वारा इतने बड़े पैमाने पर बड़े-बड़े लोगों से बनाये गये सम्बंधों को मोदी समर्थक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोदी और उनके कार्यों की स्वीकार्यता बताते हैं तो यह एप्को वर्ल्डवाइड की शिक्षा का असर मान लेना चाहिए।
इस कंपनी की विशेषता और ताकत यही है कि यह अपने ग्राहकों का एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए मुख्यधारा के मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया में भी तूफानी प्रचार कराती है।
वर्ष 2006 में ठेका हासिल करने के बाद एप्को वर्ल्डवाइड ने गुजरात के अगले विधानसभा चुनाव 2007 में ऑडियो ब्रिज कम्यूनिकेशन और 3डी तकनीक का इस्तेमाल कर मोदी के प्रचार को और भी अधिक विस्तृत रूप देने के लिए गूगल प्लस से लेकर तमाम सोशल नेटवर्किंग साइटों पर जाल बिछाया। चुनाव में 3-डी के इस्तेमाल का कॉन्सेप्ट भी इसी कंपनी का है।
उस चुनाव में एप्को वर्ल्डवाइड ने मोदी को एक स्वप्नदृष्टा ‘विकास पुरुष’ के तौर पर स्थापित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाये। मोदी को एक रैंबो की तरह पेश कर प्रचार का नया तरीक़ा अपनाया गया। भाजपा के उम्मीदवारों से कहा गया कि वे मोदी का मुखौटा पहनकर ही चुनाव प्रचार करें। यानी एक राजनेता के तौर पर उनकी पिछली उपलब्धियों, उनकी सोच और व्यक्तित्व को ढकते हुए मोदी को एक हीरो की तरह जबरन थोपकर मोदी-मोदी कहने को मजबूर किया गया।
उस सफलता से उत्साहित होकर नरेंद्र मोदी ने 2010 में गुजरात सरकार के लिए एप्को का कॉन्ट्रैक्ट 2.25 करोड़ रुपये सालाना की दर पर रिन्यू किया। अब क्या था, एप्को वर्ल्डवाइड ने मोदी की छवि का मायाजाल राष्ट्रीय स्तर पर फैलाना शुरू कर दिया। 
इस अमेरिकी कंपनी ने ही उत्तराखंड में जून 2013 को आई केदारनाथ आपदा में फंसे 15,000 गुजरातियों को बचाने में व्यक्तिगत रूप से मोदी के लिए भूमिका निभाई थी, यह फर्जी खबर भी मीडिया तक पहुंचाई थी।
हालांकि एप्को वर्ल्डवाइड ने इस बात से साफ इनकार किया है कि वह मोदी के लिए काम करती है। उसका कहना है कि उसका करार ‘वाइब्रेंट गुजरात’ समिट के प्रचार के लिए गुजरात सरकार के साथ था और यह 31 मार्च, 2013 को खत्म हो चुका है।
सितंबर 2013 में भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किये जाने के साथ ही अचानक मीडिया में सरगर्मी बढ़ गई। नरेंद्र मोदी की एक आधुनिक सोच वाले भावी पीढ़ी का नेतृत्व करने में सक्षम राजनेता की छवि तैयार करने में एकाधिक कंपनियां पहले से ही काम कर रही थीं। भाजपा ने इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सैम बलसारा की ‘मेडिसन’ और अमेरिकी लॉबीइंग कंपनी ‘एप्को वर्ल्डवाइड’ की सहयोगी ‘लोडस्टार’ को चार सौ करोड़ रुपये का ठेका दिया। उन्होंने नरेंद्र मोदी को भाजपा का पोस्टर बॉय बना दिया। मोदी ने चुनाव प्रबंधन में अलग-अलग प्रबंधन कंपनियों की जमकर सेवाएं लीं। प्रिंट और टीवी पर क्रिएटिव विज्ञापनों का काम फिल्मी गीतकार प्रसून जोशी की कंपनी ‘मैक्सकेन वर्ल्डग्रुप’ को दिया गया। इसने नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए नारे और गीत गढ़े। 
चुनावी मौसम में हर तरफ मोदी की कैंपेनिंग बढ़ाई गई। फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स सहित हर तरफ, खास तौर पर युवाओं में ‘मोदी लहर’ और ‘मोदी मैजिक’ का धुआंधार प्रचार किया गया। नरेंद्र मोदी पर कई किताबें छपवाई गईं। देश में पहली बार इस चुनाव में विपक्षी पार्टियों पर व्यंग्यात्मक विज्ञापन बनाये गये और रैली में आने के लिए लोगों की ऑनलाइन बुकिंग कराई गई।
इस प्रकार देश-विदेश की राजनीतिक लॉबी, उद्योग और कारोबारी जगत में एप्को वर्ल्डवाइड ने मोदी की छवि जिस तरह चमकाई यह जगजाहिर है। शायद इसी का परिणाम है कि मोदी के भीतर यह स्थाई भाव बन गया है कि वे धरातल पर काम करने की बजाय हवा-हवाई बातों, मीडिया मैनेजमेंट, अपनी छवि निर्माण और विपक्षियों, खास तौर पर नेहरू परिवार, पर एकदम सफ़ेद झूठ तथा मिथ्या आरोप मढ़ने पर अधिक ध्यान देते हैं। असहनशीलता, आत्ममुग्धता और आक्रामकता तो जैसे उनके स्वभाव में शामिल हो गये हैं। झूठ-कपट उन्होंने संघ से घुट्टी में पहले पी ही रखा है। रही-सही कसर एप्को वर्ल्डवाइड के प्रशिक्षण ने पूरी कर दी है।
इस तरह झूठ-कपट और छल-प्रपंच के जरिये नेता बना दिये गये मोदी के खाते में सफलता से अधिक असफलताओं का अंबार लगा हुआ है। जिनका बोझ ढो पाना उनके वश से बाहर है। उनकी लगातार गिरती साख का एक बड़ा कारण यह भी है।
सितंबर में आये इंडिया टुडे के सर्वेक्षण में मोदी की लोकप्रियता में भारी गिरावट पाई गई है, जो कि 66 फीसदी से घटकर 24 फीसदी हो गई। जबकि इस बीच किसान आंदोलन, महंगाई में जबरदस्त उछाल, कर्मचारियों में बढ़ता असंतोष, बेरोजगारी की मार झेल रहे युवा, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, खाली बैठे व्यापारी आदि कारक भी मोदी की छवि में काले दाग ही हैं।
अभी सामने खड़े पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर मोदी उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड में जहां कहीं भी रैलियों को संबोधित करने गये हैं, वहां सरकारी मशीनरी सहित पूरी ताकत झोंकने के बाद भी बहुत कम भीड़ इकट्ठी हो पाई। तो अब से लेकर 2024 के लोकसभा चुनावों के बीच एक दर्जन राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं लेकिन जिस तरह मोदी की लोकप्रियता में गिरावट आती जा रही है, उससे तो एप्को वर्ल्डवाइड द्वारा खड़े किये गये इस रेत के महल का गिरना तय है।

(श्याम सिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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