क्या कहते हैं महाराष्ट्र, तमिलनाडु और बंगाल उप चुनाव के नतीजे

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नई दिल्ली। त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय विधान सभा चुनावों के साथ महाराष्ट्र, तमिलनाडु और बंगाल जैसे राज्यों में उप चुनाव हुए। महाराष्ट्र में भाजपा के परंपरागत गढ़ कस्बा पेठ पर कांग्रेस की जीत अप्रत्याशित मानी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने गढ़ पुणे की इस सीट को बरकरार रखने में विफल रही। उसके उम्मीदवार हेमंत रसाने को हार का सामना करना पड़ा। कस्बा पेठ सीट पर भाजपा 28 साल से जीत दर्ज करती आई थी। इस सीट को जीतने के लिए भाजपा ने, विशेषकर महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी थी।

यह सीट भाजपा और महा विकास अघाड़ी के लिए चुनौती बन गयी थी। यहां से कांग्रेस प्रत्याशी की जीत से भाजपा को धक्का लगा है। महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले ने इस जीत को भाजपा के धन और बल के अकूत इस्तेमाल के खिलाफ जनता का जनमत कहा है। राज्य राजनीतिक विश्लेषक इसे भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना का गठबंधन के लिए चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। यह सीट भाजपा के लिए आसान मानी जा रही थी, क्योंकि यहां पर 30 प्रतिशत वोट ब्राह्मण समुदाय के हैं, जो भाजपा के पक्के वोटर के रूप में इस विधान सभा क्षेत्र में देखे जाते हैं।

यहां से भाजपा को सहानुभूति लहर का लाभ मिलने की बात की जा रही थी। यह सीट भाजपा के विधायक मुक्ता तिलक की मृत्यु के बाद खाली हुई, जो लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के परिवार से ताल्लुक रखते थे। हालांकि भाजपा ने उनके परिवार के किसी व्यक्ति को टिकट देने की जगह स्थानीय भाजपा नेता हेमंत राने को टिकट दिया था। इस सीट पर भाजपा ने कितना जोर लगाया था, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता  है कि यहां महाराष्ट्र सरकार के दो कैबिनेट मंत्री और एक दर्जन से अधिक बड़े नेता प्रचार कार्य में दिन-रात लगे हुए थे। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह खुद यहां के उप चुनाव की निगरानी कर रहे थे। उन्होंने इसी बीच महाराष्ट्र का तीन दिन का दौरा किया और उप चुनावों की तैयारियों का जायजा लिया। इस सीट पर हारने के बाद देवेन्द्र फडनवीस ने कहा कि हमें इस हार से धक्का लगा है। हम हार के बारे में आत्मचिंतन करेंगे।

इसी तरह पश्चिम बंगाल में मुस्लिम बहुल सागरदिघी विधानसभा सीट पर कांग्रेस की जीत और तृणमूल कांग्रेस एवं भाजपा की पराजय बहुत सारे विश्लेषकों के लिए अचंभित करने वाली है। यहां 63 प्रतिशत वोटर मुस्लिम हैं। इस चुनाव में करीब 90 प्रतिशत मुस्लिम वोटरों ने कांग्रेस को वोट दिया। 2021 के विधान सभा चुनाव में यहां से तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी सुब्रत साहा 50 हजार से अधिक वोटों से जीते थे। इस बार उनका वोट शेयर घटकर 35 प्रतिशत हो गया। यहां से भाजपा को 14 प्रतिशत वोट मिले। जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार को 47.35 प्रतिशत वोट मिले। इस सीट पर वामपंथी पार्टियों ने कांग्रेस का समर्थन किया था। यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार बाईरोन विश्वास ने तृणमूल कांग्रेस के देबाशीष बनर्जी को 22 हजार से अधिक वोटों से हराया।

भाजपा ने यहां से दिलीप साहा को उम्मीदवार बनाया था। इस जीत से पहले पश्चिम बंगाल की विधान सभा में कांग्रेस का कोई विधायक नहीं था। यह सीट भी तृणमूल कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा की सीट बन गई थी। ममता बनर्जी स्वयं प्रचार के लिए आई थीं। इस मुस्लिम बहुल सीट से कांग्रेस की जीत के बाद लोकसभा में कांग्रेस के नेता और पश्चिम बंगाल से सासंद अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “तृणमूल ने मुसलमानों के साथ गद्दारी की है, पूरे बंगाल के मुसलमान जानते हैं कि टीएमसी और बीजेपी मिली हुई हैं। इतना ही नहीं तृणमूल बीजेपी की दलाली करती है। मुलसमानों को एक बार ठगा जा सकता है लेकिन बार-बार नहीं।” उन्होंने कहा कि “आज ये सिद्ध हो गया कि कांग्रेस हारने वाली नहीं, हराने वाली पार्टी है।”

तमिलनाडु में हुए उप चुनाव में कांग्रेस ने भारी जीत हासिल की है।

कांग्रेस के उम्मीदवार ईवी के एस इलनगोवन को करीब 1.70 लाख वोट मिले और उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक के केएस थेन्नारासू को करीब 66000 मतों हराया। 

द्रविड़ मुनेत्र कडगम (DMK) नीत धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन (SPA) ने उपचुनाव में के पलानीस्वामी के नेतृत्व वाले अन्नाद्रमुक के खिलाफ जबर्दस्त जीत हासिल कर पश्चिम तमिलनाडु की इरोड पूर्व विधानसभा सीट गुरुवार को अपने पास बरकरार रखी। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इसे करीब दो साल पुरानी उनकी सरकार के ‘‘द्रविड़ शासन मॉडल” पर जनता का मुहर करार दिया है। स्टालिन ने चेन्नई में कहा कि इस ‘ऐतिहासिक व शानदार’ जीत के बाद अब 2024 के लोकसभा में धर्मनिरेपक्ष प्रगतिशील गठबंधन ( SPA) की इससे भी बड़ी जीत के लिए जमीन तैयार की जा रही है। उन्होंने कहा, ‘‘प्रचार अभियान के दौरान मैंने बार-बार द्रविड़ शासन मॉडल के लिए लोगों का समर्थन मांगा। लोगों ने अपना फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि इसे और अधिक जोश के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए।”

इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की जीत में कॉमन बात यह है कि यहां कांग्रेस ने चुनाव भले ही अपने चुनाव चिह्न पर लड़ा, लेकिन उसका प्रत्याशी गठबंधन का प्रत्याशी था। महाराष्ट्र में कांग्रेस प्रत्याशी को महा विकास अघाड़ी ( MVA) के प्रत्याशी के रूप में उम्मीदवार बनाया गया था। शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस ने कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में पुरजोर तरीके से प्रचार किया था। शिवसेना ने कांग्रेस की जीत को असली शिवसेना और नकली शिवसेना की बीच संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया था। इसी तरह पश्चिम बंगाल में कांग्रेस प्रत्याशी को वामपंथी दलों ने घोषित समर्थन दिया था और उसके पक्ष में प्रचार भी किया था। तमिलनाडु में कांग्रेस प्रत्याशी को धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन ( SPA) के प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इस गठबंधन में डीएमके और कांग्रेस के साथ कुछ अन्य पार्टियां हैं। 

वैसे तो प्रथम दृष्ट्या देखने में यह तीन राज्यों की तीन विधान सभा सीटों पर हुए उप चुनावों में सामान्य जीत के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन जिस तरह महाराष्ट्र में भाजपा, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और तमिलनाडु में भाजपा की सहयोगी अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन ने जोर लगाया था, उसकी वजह यह थी कि इन राज्यों में इन उपचुनावों में जीत और हार को 2024 के लोकसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्वलेषक भी इन उपचुनावों को 2024 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर ही देख रहे थे।

ये तीनों वे राज्य हैं, जिनकी 2024 के लोकसभा चुनावों में निर्णायक भूमिका होगी। महाराष्ट्र से लोकसभा के लिए 48 सदस्य चुने जाते हैं। लोकसभा सदस्यों की दृष्टि से उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है। पश्चिम बंगाल से 42 सदस्य चुने जाते हैं। यह लोकसभा के सदस्यों की संख्या की दृष्टि से तीसरे स्थान पर है। तमिलनाडु से लोकसभा के लिए 39 सदस्य चुने जाते हैं। यह लोकसभा के सदस्यों की संख्या की दृष्टि से पांचवें स्थान पर है। लोकसभा के सदस्यों के मामले में इसका स्थान बिहार के करीब बराबर है, जहां से 40 सदस्य चुने जाते हैं। इन तीन  राज्यों से कुल मिलाकर 129 सदस्य लोकसभा के लिए चुने जाते हैं।

लोकसभा में कुल 543 सदस्य हैं। अगर प्रतिशत में देखें तो इन तीन राज्यों से 24 प्रतिशत लोकसभा सदस्य चुनकर आते हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को यहां से 48 में से 23 सीटें मिली थीं। उस समय शिवसेना-भाजपा की सहयोगी पार्टी थी, जिसे 18 सीटें मिली थीं। इस तरह 48 सीटों में से 41 सीटें भाजपा गठबंधन को मिली थीं। पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में से 18 सीटें भाजपा को मिली थीं। तृणमूल कांग्रेस को 22 सीटें मिली थीं। तमिलनाडु में 39 सीटों में 38 सीटें डीएमके गठबंधन को मिली थीं, जिसमें कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां शामिल हैं। डीएमके को 23, कांग्रेस को 8, सीपीएम को 2 और सीपीआई को 2 सीटें मिली थीं।

इन तीनों राज्यों में उपचुनावों के दौरान गठबंधन का स्वरूप और कांग्रेस की जीत इस तथ्य की ओर संकेत कर रहे हैं कि 2024 के लोकसभा चुनावों में इन तीनों राज्यों में भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं और उसके और उसके सहयोगियों की सीटें इतनी कम हो सकती हैं कि भाजपा को बहुमत हासिल करना मुश्किल हो जाए।

सबसे पहले महाराष्ट्र को लेते हैं। जैसा कि ऊपर चर्चा की जा चुकी है महाराष्ट्र की 48 सीटों में से भाजपा और शिवसेना गठबंधन ( एनडीए) को 41 सीटें मिली थीं। शिवसेना-भाजपा गठबंधन टूट चुका है। महाराष्ट्र भाजपा और शिवसेना ( उद्धव ठाकरे) के बीच भविष्य में गठबंधन की करीब कोई संभावना नहीं है। खासकर एकनाथ शिंदे के माध्यम से शिवसेना को तोड़ने और उद्धव ठाकरे की सरकार गिराने के बाद। ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही एकनाथ शिंदे ने शिवसेना को तोड़कर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना लिया हो और मुख्यमंत्री बन गए हों, लेकिन शिवसेना के वोटरों को तोड़ नहीं सकते हैं और न ही शिवसेना का वोट भाजपा को दिला सकते हैं।

ऐसे में भाजपा के लिए यह बहुत मुश्किल होगा कि वह 48 सीटों में पहले की तरह 23 सीटों पर जीत हासिल कर पाएं। राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि भाजपा इस बार महाराष्ट्र में 15 सीटों के आसपास सिमट जाएगी। उसके सहयोगी एकनाथ शिंदे मुश्किल से भाजपा के सहयोग से कुछ सीटें हासिल कर सकते हैं। महा विकास अघाड़ी यहां 30 से अधिक सीटें जीत सकती है। इसका सीधा फायदा केंद्र में  दावेदारी के लिए कांग्रेस को होगा। उप चुनाव का नतीजा भी महा विकास अघाड़ी की भाजपा पर बढ़त की ओर संकेत कर रहा है।

इस तरह बंगाल में भी भाजपा की डगर मुश्किल होती जा रही है। पश्चिम बंगाल के 2021 के विधान सभा चुनावों के बाद भाजपा सिकुड़ती जा रही है। उसके कई बड़े नेता और विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं। उप चुनावों में भी उसे निरंतर पराजय का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी का ग्राफ तेजी से गिर रहा है। यह उपचुनाव परिणाम तृणमूल कांग्रेस के लिए एक बड़ा संकेत लेकर आया है। निर्णायक तौर पर मुस्लिम बहुल इलाके में तृणमूल की हार और कांग्रेस-सीपीएम गठबंधन की जीत इस बात का संकेत है कि मुसलमानों का तृणमूल कांग्रेस से मोहभंग होते दिख रहा है। इसके दो कारण हो सकते हैं।

पहला आज की तारीख में भाजपा मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। वह किसी भी कीमत पर भाजपा को हराना चाहते हैं। इस बीच तृणमूल कांग्रेस भाजपा के प्रति नरम होती दिख रही है। इसके साथ ही मुसलमान यह देख रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस भाजपा की तुलना में कांग्रेस के प्रति अधिक हमलावर है। वह 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस के साथ किसी तरह का गठबंधन बनाते नहीं दिख रही है। कांग्रेस के बिना भाजपा को केंद्र की सत्ता से बेदखल नहीं किया सकता है। इसके साथ ही भाजपा के सहयोग का ममता बनर्जी का इतिहास भी भाजपा विरोधियों को उनके प्रति शंकालु बनाता है।

दूसरी बात यह है कि राहुल गांधी की भारत यात्रा ने भाजपा को सत्ता से बेदखल करने की चाहत रखने वाले लोगों में कांग्रेस के प्रति एक विश्वास पैदा किया है। इसमें मुसलमान भी शामिल हैं। पश्चिम बंगाल के सागरदिघी विधानसभा उप चुनाव में 90 प्रतिशत मुसलमानों द्वारा लेफ्ट समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार को वोट देना इस विश्वास का भी संकेत हो सकता है। 

तमिलनाडु में भाजपा की सारी उम्मीदें उसकी सहयोगी अन्नाद्रमुक पर टिकी हुई हैं। उसको उम्मीद है कि यदि 2024 में बहुमत से कुछ सीटें कम मिलती हैं, तो अन्नाद्रमुक उनके सहयोग के लिए आगे आएगी। लेकिन मुख्यमंत्री स्टालिन की सरकार सकारात्मक उपलब्धियों, दक्षिण में कांग्रेस के प्रति लोगों के बढ़ते झुकाव ( जो राहुल गांधी की यात्रा के दौरा दिखी) और अन्नाद्रमुक के अपने आंतरिक संकट के चलते अन्नाद्रमुक और भाजपा गठबंधन के लिए तमिलनाडु में कोई बेहतर संभावना नहीं दिख रही है। उप चुनाव में धर्मनिरेपक्ष प्रगतिशील गठबंधन ( SPA) के प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस की जीत भी इसका प्रमाण प्रस्तुत करती है।

जैसा कि ऊपर जिक्र किया जा चुका है, ये तीनों राज्य लोकसभा में करीब 24 प्रतिशत (129) सदस्य भेजते हैं। उपचुनाव ये संकेत दे रहे हैं कि इन तीन राज्यों में भाजपा के लिए कोई बेहतर उम्मीदें नहीं दिख रही हैं और विपक्षी गठबंधन बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। लोकसभा सदस्यों की दृष्टि से उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल के बाद सबसे अधिक सीटें (40) बिहार में हैं, जहां भाजपा से गठबंधन तोड़कर नीतीश कुमार की पार्टी उनसे अलग हो चुकी है। बिहार में भाजपा के लिए अपनी 2019 की स्थिति बनाए रखने में मुश्किल आयेगी। सारे विश्वलेषक कर्नाटक में भाजपा की कमजोर स्थिति की ओर संकेत कर रहे हैं।भाजपा के लिए एकमात्र सुरक्षित गढ़ उत्तर प्रदेश दिख रहा है। 

इन तीनों राज्यों के उप चुनावों के परिणाम दो बातों के संकेत दे रहे हैं। पहला कांग्रेस इन राज्यों में नये सिरे से नए रूप में उभरती दिख रही है। दूसरा भाजपा के लिए 2024 में लोकसभा का रास्ता आसान नहीं है।

(जनचौक के कार्यकारी संपादक डॉ. सिद्धार्थ की रिपोर्ट।)

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