Thu. Feb 20th, 2020

अभिजीत बनर्जी अगर भारत में ही रहने का निर्णय लिए होते, तो आज क्या होता ?

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अभिजीत बनर्जी।

कल से ही देश के सभी अंग्रेजी और हिंदी समाचारपत्रों, टीवी न्यूज़ और सबसे अधिक सोशल मीडिया में अर्थशास्त्र के क्षेत्र में इस साल के नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी की पूरे जोर-शोर से चर्चा है। ट्विटर पर एक साथ इतनी जानकारी बनर्जी के बारे में आ रही है, कि हरियाणा और महाराष्ट्र की चुनावी धूल एकबारगी पूरी तरह से छंट गई सी लगती है, और राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीमकोर्ट के सम्भावित फैसले को ध्यान में रखते हुए एक तरफ अयोध्या में कश्मीर की तरह कर्फ्यू जैसे हालात और दूसरी तरफ भक्तों, संतों के जमावड़े पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा।

देश ख़ुशी से अभिभूत भी है और पल भर की खुशियों को समेट भी लेना चाहता है। आखिर ऐसे दिन देखने को अब नसीब में हैं भी कहां?

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कश्मीर, असम, पश्चिम बंगाल अलग-अलग कारणों से खुद अंदर ही अंदर सिसक रहा है। पब्लिक सेक्टर के भीतर अब शायद ही कोई संस्थान बचा हो जिसकी जड़ें उखाड़ उखाड़ कर उसे बेचने या आंशिक बिक्री के लिए मंत्रालय में फाइल तैयार न हो रही हो। भारतीय रेल और दूरसंचार क्षेत्र में बड़े ऑपरेशन की तैयारी में सर्जन दस्ताने पहन रहे हैं। ऑटो सेक्टर, कपड़ा उद्योग सहित सभी प्रमुख सेक्टर धीरे-धीरे काल के गाल में समा रहे हैं।

आधा देश बाढ़ आपदा और उसके बाद उसकी विभीषिका और बीमारी से खुद ही जूझ रहा है। नेता अब अभिनेता बन एक दो दिन का ड्रामा रचते हैं, NDRF की टीम को भी अब पता है कि उसका काम अब अधिक मुश्किल में फंसे लोगों को किसी तरह राहत पहुंचाने जैसा दिखना चाहिए। हर तरफ फोटो सेशन होना चाहिए, टीवी पर उसे ही दोहरा तिहरा कर खानापूर्ति करने के लिए दिहाड़ी पर एंकर बैठे हैं, जो कभी दोबारा उन जगहों का जायजा लेने नहीं जायेंगे। क्योंकि आग, बाढ़, और ब्रेकिंग न्यूज़ की अब कोई कमी देश में नहीं होने वाली।

ऐसे में अभिजीत बनर्जी को मिलने वाला यह विश्व का सबसे बड़ा सम्मान, छलनी छलनी हुए भारतीय मन में मरहम का काम अवश्य कर रहा है।

खासकर बंगाल और जेएनयू से सम्बद्ध लोगों को। जेएनयू को पिछले 5 वर्षों में जितना झेलना पड़ा है, उतना शायद ही दुनिया के किसी संस्थान की उसके ही देश के सरकारी संरक्षण में उत्पीड़न किया गया हो। ऐसा नहीं कि यह अपमान सिर्फ जेएनयू के हिस्से ही आया हो, इस अपमान से जादवपुर, हैदराबाद, FTII पुणे, BHU और अलीगढ़ विश्वविद्यालय को भी गुजरना पड़ा है, क्योंकि ये चुनिन्दा उच्च शिक्षण केंद्र कहीं न कहीं वर्तमान व्यवस्था के अलोकतांत्रिक और मनुवादी सिस्टम पर चोट करने में अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं।

ट्विटर पर जेएनयू और जादवपुर से सम्बद्ध फैकल्टी और भूतपूर्व छात्र, अध्यापक समूह ऐसे-ऐसे मेमे और व्यंग्य भेज रहे हैं, जिसे देख आप हंसी से लोट-पोट हो सकते हैं। हालांकि पीएम मोदी जी ने भी कल ही इस उपलब्धि पर अभिजीत बनर्जी को बधाई संदेश ट्वीट किया है, लेकिन लोगों को पता है कि इसमें कितनी मिठास और कितनी मज़बूरी छुपी है।

कांग्रेस मीडिया सेल ने कल से ही जोर-शोर से इस बात को प्रचारित करना शुरू किया है कि यह अभिजीत बनर्जी ही थे, जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को ‘न्याय स्कीम’ के तहत हर व्यक्ति को यूनिवर्सल बेसिक इनकम के रूप में 6000 रूपये मासिक आय का आइडिया दिया था, जो भारत जैसे देश में असमान आय वितरण और गरीबी को दूर करने में बेहद अहम साबित होता।

एक अन्य अख़बार में जेएनयू में अपने शिक्षण के दौरान अभिजीत बनर्जी को 10 दिन तिहाड़ जेल में भी बिताने पड़े थे, जिसका जिक्र उन्होंने 2016 में जेएनयू के आन्दोलन के समय अपने लेख में किया था, जिसे संघी ट्रोल आज तक ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ के नाम से भुनाने में लगे रहते हैं।

फरवरी 2016 में जब जेएनयू में हंगामा शुरू हुआ तभी उन्होंने अपने एक लेख में लिखा था-“वी नीड थिंकिंग स्पेसेज़ लाइक जेएनयू एंड द गर्वनमेंट मस्ट स्टे आउट ऑफ़ इट” यानि हमें जेएनयू जैसे सोचने-विचारने वाली जगह की जरूरत है और सरकार को निश्चित तौर पर वहां से दूर रहना चाहिए।

इसी लेख में उन्होंने ये भी बताया था कि उन्हें किस तरह से 1983 में अपने दोस्तों के साथ तिहाड़ जेल में रहना पड़ा था, तब जेएनयू के वाइस चांसलर को इन छात्रों से अपनी जान को खतरा महसूस हुआ था।

अपने लेख में उन्होंने लिखा था, “ये 1983 की गर्मियों की बात है। हम जेएनयू के छात्रों ने वाइस चांसलर का घेराव किया था। वे उस वक्त हमारे स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष को कैंपस से निष्कासित करना चाहते थे। घेराव प्रदर्शन के दौरान देश में कांग्रेस की सरकार थी पुलिस आकर सैकड़ों छात्रों को उठाकर ले गई। हमें दस दिन तक तिहाड़ जेल में रहना पड़ा था, पिटाई भी हुई थी। लेकिन तब राजद्रोह जैसा मुकदमा नहीं होता था। हत्या की कोशिश के आरोप लगे थे। दस दिन जेल में रहना पड़ा था।”

अब सवाल यह है कि अगर अभिजीत बनर्जी अमेरिका के बजाय अपनी सेवाएं देश के भीतर ही रहकर देते तो क्या होता? देश उन्हें किस रूप में याद करता?

पिछले कुछ सालों में दर्जनों लेखकों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने सरकार से मिले अवार्ड को इसलिये वापस कर दिया क्योंकि उन्हें महसूस हो रहा था कि देश में बड़ी तेजी से बोलने, लिखने, खाने पीने, कपड़े पहनने से लेकर अपने धर्म और रीति रिवाज का पालन करने की आजादी पर अघोषित लेकिन भीड़ की हिंसा द्वारा नियन्त्रण स्थापित किया जा रहा है। ऐसा माहौल किसी भी सृजनात्मक माहौल को पैदा होने से पहले ही नष्ट कर देगा। देश आगे बढ़ने की जगह पीछे की ओर धकेला जा रहा है।

इसका हालिया उदहारण 49 प्रतिष्ठित कलाकारों, फिल्म उद्योग से जुड़े प्रमुख हस्ताक्षर, लेखकों और बुद्धिजीवियों की प्रधानमंत्री को लिखी उस चिट्ठी के घोर विरोध में झलकता है जो मॉब लिंचिंग की बेतहाशा बढ़ती घटनाओं से चिंतित थे, और प्रधानमंत्री से इस पत्र के जरिये इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति पर रोक के लिए उनके सीधे हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे थे। सरकार से उनकी उम्मीद बेमानी साबित हुई। सरकार पोषित छद्म बुद्धिजीवियों का एक दूसरा समूह भारत में तेजी से बनाया गया और उसमें इससे भी अधिक लोगों ने हस्ताक्षर कर उल्टा इन मानद उपाधियों पर ही तोहमत लगानी शुरू कर दी।

फिर क्या था, बिहार में एक वकील भक्त ने इस मामले पर खुद ठेका अपने हाथ लेकर, अदालत में मुकदमा ठोंक दिया और फिर मजिस्ट्रेट के आदेश पर उसकी पुलिस में प्रथिमिकी भी दर्ज हो गई।  लेकिन इन सबमें न सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया आई और न ही पीएमओ की ओर से।

अच्छा ये हुआ कि इसकी राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई और लोगों को लगा कि यह मामला तो सिर से ऊपर जा रहा है, फिर देश के विभिन्न नामी हस्तियों ने सैकड़ों की संख्या में इन प्रमुख बुद्धिजीवियों के समर्थन में हस्ताक्षर करने शुरू कर दिए, जो दो दिन बाद ही 2000 पार कर गया। नतीजतन बिना किसी हो हल्ले के बिहार सरकार ने सूचित किया कि उस प्रथिमिकी को बकवास पाया गया और उसे रद्द कर दिया गया है, और उल्टा पुलिस और कोर्ट को गुमराह करने के आरोप में उस वकील के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

क्या आप के मन में यह आशंका नहीं होगी कि इन 49 बुद्धिजीवियों की सूची में एक नाम और जुड़ जाता अगर अभिजीत बनर्जी भारत में ही किसी शिक्षण संसथान में पढ़ा रहे होते? उनकी किताबें हमें सिखा रही होतीं कि भारत में गरीबी और आर्थिक विषमता को ठोस रूप से कैसे कम किया जा सकता है।

मुझे पूरी उम्मीद है कि वे उन प्रमुख बुद्धिजीवियों की संख्या में अर्द्धशतक पूरा करने वाले व्यक्ति होते, और उनका नाम अवार्ड वापसी गैंग के प्रमुख गुर्गे के रूप में जाना जाता। अभिजीत को जनता के टैक्स के पैसे पर जेएनयू में मौज मनाने के लिए सुन्दर सुंदर गालियों से नवाजा जाता।

काश अभिजीत बनर्जी, अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिका की गरीबी पर अपने महत्वपूर्ण शोध के बदले दुनिया में गरीबों की सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत में पिछले दो दशक से होने वाले महत्वपूर्ण आर्थिक उदारीकरण (लूट करने की उदार छूट) से उपजे बेहद गंभीर आर्थिक विषमता का न सिर्फ गहन अध्ययन करते, बल्कि देश को बता सकते कि अब देश के दो प्रमुख राष्ट्रीय दल ही किसी एक व्यक्ति की दोनों पॉकेट में ही नहीं बल्कि समूचा देश ही उसमें घुसाने के लिए क्या-क्या जतन दिन-रात किये जा रहे हैं।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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