Friday, July 1, 2022

ख़ास रपट: जब अमरोहा के बांसली में बही गंगा-जमनी धारा, हिंदू बहुल गांव में सलीम को मिली जीत

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बांसली (अमरोहा)। विधानसभा चुनाव कवर करने के दौरान शहरों से रिपोर्टिंग करने के बहुत दिनों बाद मुझे किसी गांव में जाने का मन हुआ। गांव में चुनाव का क्या माहौल है, उनके क्या मुद्दे हैं और साम्प्रदायिक सद्भाव पर लोगों की क्या राय है..? इत्यादि सवालों के साथ मैं ब्लाक गजरौला के गांव बांसली पहुंचा। मैंने देखा, बांसली नाम के इस गांव में तमाम आरसीसी सड़कें बिछी हैं, पक्की नालियां हैं,पानी की निकासी के लिए नाला है और नुक्कड़ पर स्ट्रीट लाइट भी है। यह सब देखकर पता चला कि ग्रामीण सजग हैं तभी इतना विकास हो पाया है खैर मैं गांव में अन्दर घुसा, प्राइमरी स्कूल तक पहुंचा ही था कि सामने से मोटरसाइकिल पर हर्षित हाथ हिलाते हुए बोलते आ रहा था, “और क्या हाल है मिश्रा जी!” हर्षित और मैं कॉलेज में साथ-साथ पढ़ते थे, इसलिए एक-दूसरे को करीब से जानते हैं।

हर्षित ने बताया कि, “वो आज गजरौला हाईवे पर स्थित निर्मल फाइबर कम्पनी में इंटरव्यू देकर आ रहा है। एक दिन पहले कम्पनी के एचआर ने हर्षित का कम्पनी में जुगाड़ कराने का भरोसा दिया था लेकिन आज वो भी रफूचक्कर हो गया।” इंटरव्यू के नाम पर हर्षित को एक पर्चा पकड़ा दिया गया जिसमें 30 सवाल थे। हर्षित ने बताया कि उसने 11 सवालों के सही जवाब दिये। इंटरव्यू देने के बाद प्रबंधक ने कॉल करने का दिलासा दिया है। हर्षित पिछले महीने भी नोएडा में एक बैंक में इंटरव्यू देकर आया था लेकिन सैलरी इतनी कम थी कि गुजारा करना मुश्किल था। बहरहाल बीएससी (B.sc) पास हर्षित को आज बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ रही है।

सरकार के ठंडे बस्ते में पड़ी रह गईं सरकारी सुविधाएं

मैं गांव में अन्दर गया तो नन्हीं जी और उनका 20 वर्षीय पोता निजामुद्दीन दरवाजे पर खड़े दिखे। उनका पुश्तैनी घर मुझे गांव के जीवन की करूणा में ले गया।

नन्हीं जी और उनका पोता निजामुद्दीन।

बचपन से निजामुद्दीन के घर पर आना-जाना लगा रहा इस नाते नन्हीं जी ने हाथ पकड़कर बाहर कुर्सी पर बैठा लिया। नन्हीं जी अब वृद्ध अवस्था में पहुंच चुकी हैं, हाथ-पैर अब साथ नहीं देते। सरकारी योजनाओं के मिलने वाले लाभ के बारे में जब मैंने पूछा तो कहने लगीं कि बेटा इस उम्र में कोई सहारा नहीं देता, ना बहू-बेटे और ना सरकार।

नन्हीं जी बताती हैं, “उन्हें 5 किलो राशन के अलावा कुछ नहीं मिला।” नन्हीं जी के नाम पर 2 बीघे से भी कम ज़मीन है। उन्होंने पीएम किसान सम्मान निधि योजना का लाभ लेने के लिए 2 साल पहले आवेदन किया था इसके बावजूद भी दर-दर भटक चुकी हैं लेकिन आज तक फूटी कौड़ी नहीं मिली। उनका कहना है, “शहर में जाकर कई बार 100-100 रूपये देकर आए पर हमारी तो आज तक किसी ने नहीं सुनी, इसलिए हम तो घर बैठ गए धक्के खाए उइ के।”

नन्हीं जी से बात करते हुए प्रत्यक्ष मिश्रा।

इतना सुनते ही नन्हीं के बेटे जुल्फिकार, नन्हें और उनकी पड़ोसन अमीना भी वहां आ जाती हैं। अमीना जी मेरे सिर पर हाथ फेरती हुई कहती हैं, बेटा कैसे हो! बीच में बात काटते हुए जुल्फिकार कहते हैं कैसे आना हुआ भाई साहब!

इस आवभगत के दौरान नन्हीं अपने इन दोनों बेटों की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, बेटा इन्हें भी राशन नहीं मिल रहा। ये दोनों भी बहुत परेशान हैं। जुल्फिकार बताते हैं कि, “हम सभी भाइयों के हिस्से में 2-2 बीघे से भी कम ज़मीन है, क्या खेती करें और क्या अनाज उगाएं। दो बार कागज़ दे दिये पर कुछ नहीं हुआ।”  

नन्हीं अपनी पड़ोसन अमीना के साथ।

नहीं काम कर रहा हिन्दू-मुस्लिम फैक्टर

ऐसा कहा जाता है आपको यदि विधानसभा चुनाव का मिज़ाज जानना है तो एक बार गांव में लगने वाली बैठक और नुक्कड़ पर ताश खेलते हुए लगती पंचायत में जरूर शामिल होइए। गांव में लगने वाली बैठकें जबरदस्त होती हैं, इन बैठकों का माहौल संसद भवन की तरह गरम रहता है। मुझे भी एक बैठक सजी हुई मिल ही गई। “बीजेपी ने हाथरस में लौंडिया को जलवा दिया, इत्ते किसान मरवा दिये..और-और समाजवादी पार्टी ने कम गुंडागर्दी करी है, जाटों कू खूब पिटवाया। पास के ही गांव में देख लो कैसे एक फौजी कू महबूब ने थाने में पिटवाया था..याद है ना या भूल गए! “

इस गरमाते हुए माहौल के बीच मैं बैठक में जाकर बैठ गया। कुछ देर आपस में बातचीत होती रही। हिन्दू-मुस्लिम वोटरों के गणित पर भी चर्चा होती रही इस दौरान मैंने भी पूछ लिया कि, हिन्दू-मुस्लिम फैक्टर पर आप लोगों की क्या राय है? लोगों का कहना है, “देखो, यो बात तो हमारे यहां पंचायत चुनावों में तो कत्तई भी दिखाई नहीं दी….पर विधानसभा चुनावों में क्षेत्र के कुछ लोगों के दिमाग में थोड़ी-बहुत दिखाई दे जा रही है वो भी नेताओं की वजह से।” मुझे उदाहरण देते हुए सुभाष शर्मा ने बताया, अभी 1 साल पहले ही पंचायत चुनाव हुए हैं जिसमें हिन्दू-मुस्लिम करने वालों के मुंह पर ग्राम वासियों ने तमाचा जड़ा है ‌। एक तरफ जाट नेता और भाजपाई जिलाध्यक्ष पति भूपेंद्र सिंह का भाई सतेंद्र सिंह खड़ा था, और दूसरी तरफ एक मिडिल फैमिली से आने वाला सलीम।

बैठक में चुनाव पर चर्चा करते ग्रामीण।

बता दें कि ग्राम पंचायत बांसली में वोटरों की संख्या 816 है जिसमें 125 मुस्लिम वोटर हैं और बाकी हिन्दू वोटर। कुल 695 वोट पड़े थे जिसमें सलीम को 393 और सतेंद्र को 303 वोट मिले थे। चंद्रहास शर्मा ने बताया, “चुनाव के टाइम पर सतेंद्र ने हिन्दुओं के गढ़ में मुस्लिम प्रत्याशी होने के नाते खूब नफरत फैलायी थी पर भाई साहब, हिन्दुओं के क्षेत्र में सलीम 88 वोट से जीता। डूब कै मर जाओ मुसलमान कहने वाला। पहले से बढ़िया माहौल है गांव का, खूब मौज आ रही है।”

दिहाड़ी मजदूरों के बुरे दिन आ गए हैं

मैं बैठक से जैसे ही बाहर आया। मुझे रास्ते में उत्तम दिखाई दिए। उत्तम एक मजदूर हैं जो राज मिस्त्री के ठेके या दिहाड़ी पर काम करते हैं। उत्तम पहले से काफ़ी कमजोर हो चुके हैं।

मैंने पूछा, और उत्तम काम बढ़िया चल रहा है तो थोड़ा भावुक हो गए और कहने लगे, “अरे भैया कहां काम-धाम चल रहा है। बस हमारी तो मजदूरी ही थोड़ा-बहुत सहारा है, खेती-बाड़ी इतनी है नहीं कि घर चल जाय।” उत्तम ने बताया कि इस समय दिहाड़ी मजदूरों के बुरे दिन आ गए हैं‌, मजदूरी मिल नहीं पा रही, क्या करें! घर में बहन जवान है अभी उसकी शादी भी करनी है, बड़ा भाई न्यारा है वो घर का साथ नहीं देता।

दिहाड़ी मजदूर उत्तम।

मैं अब गांव से बाहर की तरफ आ ही रहा था, इस दौरान एक परचून की छोटी सी दुकान दिखाई दी। नन्हे एक छोटे-से बच्चे को अपनी दुकान से कुछ सामान निकालकर दे रहे थे।

मैं उनका हाल पूछ्ते हुए बोला, और क्या कमाई चल रही है तो कहने लगे, “कमाई क्या वोई अपनी 100-150 की बिक्री हो जा है।” इतने में खर्च चल जाता है तुम्हारा, मैंने कहा। बोले, “ख़र्चा-वर्चा क्या बाबू शादी तो किये नहीं। ना बालक हैं ना बच्चे। थोड़ी सी जमीन है, बस यो समझ लो टाइम काटना है।”

अपनी परचून की दुकान पर नन्हे।

महंगाई के दौर में गुजर-बसर करना कठिन हो गया

गांव से बाहर आते हुए मैं जूनियर हाईस्कूल के सामने पहुंचा तो सामने एक सैलून की दुकान दिखाई दी। कहने को दुकान है लेकिन गब्बर संसाधनों की कमी के चलते इसे वो आकार नहीं दे पाए जिससे कस्टमर आकर्षित हो सकें।

दाढ़ी काफ़ी बड़ी हो चुकी थी तो सोचा मैं भी दाढ़ी बनवा लेता हूं। इस दौरान गब्बर के साथ बातचीत चलती रही। मैंने पूछा दिन भर में कितनी कमाई हो जाती है, गब्बर। गब्बर ने बताया, मुश्किल से 150-200 रुपये की कमाई हो पाती है, मजदूरी भी नहीं निकल पा रही, आज मजदूरी 350 रुपये है। इतने में गब्बर और बिफर पड़े अब उन्होंने मुझे सरल भाषा में महंगाई का गणित समझाना शुरू किया।

अपनी सैलून की दुकान पर गब्बर।

गब्बर ने बताया कि  डिटॉल की शीशी पहले 91 ग्राम 45 में मिलती थी आज 78 ग्राम की बत्ती 75 रूपए में मिलती है। 50-60 रुपये में मिलने वाली कैंची अब 120-130 की मिलती है। फुहरा 30-35 रुपये का मिलता था अब 35 रूपये की टोटी-टोटी मिलती है। ऐसे ही जिलेट का सेविंग फ़ोम 199 था पर अब 219 की है। आफ्टर सेविंग क्रीम का डिब्बा पहले 15 का था अब 25 का है। 30 रुपये का ब्रस आज सीधा 60 का कर दिया। वहीं 1 रुपये में मिलने वाला ब्लेड का पत्ता टोपाज 2 रुपये का और जिलेट का 3 रुपये का है।

लकड़ी कारोबारी महबूब का कारोबार पड़ गया ठप

महंगाई की मार झेलते हुए गब्बर किसी तरह अपना गुजर-बसर कर रहे हैं बस यही सोचते हुए गांव से बाहर निकला और एक लकड़ी कारोबारी महबूब के ठिकाने पर पहुंचा। महबूब लकड़ी की आरी से कटाई कर रहे थे।

माल की सप्लाई के बारे में पूछने पर महबूब ने बताया, “हम सिम्भावली, हापुड़, बावनखेडी, जमुनागर और आस पास के यहां माल डालते हैं पर काम रेगुलर नहीं है मजदूरी भी नहीं मिल पाती”। महबूब साल 2008 में मुम्बई में रहकर लेडीज हिल में लगने वाली लकड़ी का काम किया करते थे लेकिन सरकार बदलने के बाद काम में गिरावट आती गई। इसलिए मुम्बई छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। दिल्ली में भी कब तक टिक पाते, तीन साल रहने के बाद फिर गांव आना पड़ा। गांव में महबूब यहां लकड़ियों का कटान कर लिया करते हैं। मैंने जब उनसे पूछा कि ऐसी क्या वजह रही जिसके कारण आपको मुंबई, दिल्ली छोड़नी पड़ी।

लकड़ी कारोबारी महबूब अपनी दुकान पर काम करते हुए।

महबूब ने बताया, हिल (जूतों में प्रयोग होने वाली लकड़ी) का वही रेट कल था वही आज है बल्कि पहले तो 13-14 पहुंच जाता था पर अब तो 10-12 रुपये है। हर चीज पर पैसे बढ़ गए पर हिल का आज भी रेट वही है। उधर लकड़ी की डिमांड घटी है। महबूब ने बताया कि कांग्रेस सरकार बदलने के बाद भाजपा ने विदेश में जाने वाली लकड़ी के माल पर प्रतिबंध लगा दिया, इससे धक्का तो लगना ही था। हमारा जो माल था अब वो विदेश में जाना बंद हो गया लेकिन विदेशों का माल भारत में लगातार बढ़ता रहा।

चाइना के प्लास्टिक ने देश में आकर लकड़ी से बनने वाले प्रोडक्ट को खत्म कर दिया। महबूब ने कहा, ” चाइना का माल हमारे लकड़ी से बनने वाले माल के मुताबिक ज्यादा आकर्षक है इसलिए लोग उसे ही ज्यादा खरीदते हैं, सरकार ने विदेशी माल पर तो पाबंदी लगाई ना, हम पर पाबंदी लगा दी।” महबूब के 4 बच्चे हैं जिसमें तीन लड़की, एक लड़का है। एक लड़के का पांच साल पहले निधन हो गया। महबूब का कहना है, “जीएसटी से परेशानी और बढ़ गई है, बाहर जाकर लॉस हो रहा है। हाइवे पर जाते हैं तो पुलिस परेशान करती है, वो भी पैसा मांगती है।”

सड़क किनारे पड़ी मिट्टी, किसानों के उखड़ गए पेड़

महबूब का दर्द केवल महबूब का नहीं है बल्कि उन मझले व्यापारियों का भी है जो संसाधनों की कमी के कारण विदेशी माल के सामने टिक नहीं पाते। बांसली गांव से बाहर आया तो देखा कि एक खड़ंजे पर मिट्टी पड़ी हुई है और कुछ पेड़ उखड़ चुके हैं।

खड़ंजे पर पड़ी मिट्टी।

ग्रामवासियों ने बताया कि यह मिट्टी 6 महीने पहले सड़क बनने के लिए डाली गई थी। लाखों रुपए के किसानों के पेड़ जेसीबी से खुदाई में उखड़ गए लेकिन आज तक तो सड़क बन नहीं पाई। मैंने ग्रामवासियों से जब पूछा की जिन किसानों के पेड़ उखड़ गए हैं क्या सरकार ने उनके लिए मुआवजे की कोई व्यवस्था की है तो उन्होंने कहा कि, “हमारे पास तो सरकार का कोई नुमाइंदा आया नहीं और कोई व्यवस्था भी नहीं की गई। सरकार कू क्या फर्क पड़े है, मरे या जीवें।”

मनरेगा से भी नहीं हो सका पुराने ढहर का उद्धार

मैं अब बांसली गांव से बाहर मुबारकपुर की तरफ बढ़ रहा था, नाक दबाते हुए इस बीच गंदगी से सटे एक तालाब जिसे लोकल भाषा में लोग पीपने का ढहर कहते हैं वहां पहुंचा।

पीपने का ढहर अपनी सफाई का इंतजार करता।

मैं देख रहा था, कुत्ते यहां गंदगी को कुरेद रहे थे इतने में पीछे से..” और क्या जायजा ले रहो मिश्रा साहब” की आवाज़ आई। मुबारकपुर निवासी जितेन्द्र शर्मा इस दौरान वहां आ पहुंचे। बिना पूछे ही बोल पड़े, “12 साल अर बारह बांट” मुझे कुछ समझ नहीं आया। मैंने पूछा कौन बारह बाट, बोले “योयी ढहर और कौन!” अब जितेन्द्र शर्मा ने सरल भाषा में बताया कि मनरेगा कांग्रेस के टाइम पर शुरू हुई थी, इस ढहर में मनरेगा चलते-चलते आज 12-13 साल हो गए पर इसकी कायापलट नहीं हुई। 1 करोड़ रुपए लगाने के बाद यो तो ऐसे का ऐसे ही है।

मुझे आज गांव की रिपोर्टिंग में कुछ अलग अनुभव हुआ जो शहरी रिपोर्टिंग के दौरान अनुभव नहीं हो पाया। 21 वीं शताब्दी के गांव कितने बदले, यह बांसली गांव की यह तस्वीर बयान करती है।

(अमरोहा के बांसली गांव से स्वतंत्र पत्रकार प्रत्यक्ष मिश्रा की रिपोर्ट।)

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