हाईकोर्ट के जज ने ही कहा- हां, हम बीजेपी से जुड़े हैं!

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न्यायपालिका को पवित्र गाय (होली काउ) माना जाता रहा है और आजादी के बाद से भले ही तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी के आपातकाल के दौरान प्रतिबद्ध न्यायपालिका की अवधारणा फलीभूत करने की राजनितिक कोशिशें की गयी हों पर उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की राजनीतिक विचारधारा विशेष को लेकर कभी मूल्यान्कन नहीं किया गया बल्कि उनके द्वारा सुनाये गये निर्णयों पर ही चर्चा हुयी। लेकिन आज के दौर में अभिजात्य की यह चादर उतर गयी है और पहली बार किसी राज्य के मुख्यमंत्री और उसकी राजनीतिक पार्टी ने खुलेआम एक न्यायाधीश की राजनीतिक प्रतिबद्धता को लेकर हल्ला बोल दिया है।

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय में हाल में ही रिटायर न्यायाधीश जस्टिस अरुण मिश्रा को लेकर विधिक क्षेत्रों में ऑफ़ द रिकार्ड भाजपा से उनकी नजदीकियों की चर्चा होती रही है और उनके फैसलों को भी इसी आलोक में देखा जाता रहा है पर पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी ने कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस कौशिक चंद के खिलाफ सीधे सीधे भाजपा का कैडर होने का आरोप लिखत पढ़त में लगाकर न्यायपालिका के पवित्र गाय होने के मिथक को तार तार कर दिया है।

गुरुवार 24 जून 2021 को पश्चिम बंगाल बीजेपी के नेता शुभेंदु अधिकारी के निर्वाचन को रद्द करने की माँग करने वाली ममता बनर्जी याचिका की सुनवाई के दौरान जस्टिस कौशिक चंद ने प्रकारांतर से भाजपा से अपना जुड़ाव होने को स्वीकार करते हुए कहा कि इस मामले में पैरवी कर रहे वकील राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं, ममता बनर्जी के वकील कांग्रेस तो शुभेंदु अधिकारी के वकील भाजपा के हैं, ऐसे में जज के किसी राजनीतिक दल से जुड़े होने का विरोध क्यों किया जा रहा है? गुरुवार को जस्टिस चंद ने ममता बनर्जी के वकील अभिषेक मनु सिंघवी से कहा कि आप कांग्रेस और एसएन मुखर्जी भाजपा पृष्ठभूमि के हैं। यदि अलग-अलग राजनीतिक दलों के वकील मामले की पैरवी कर सकते हैं तो आप राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले जज को स्वीकार क्यों नहीं कर सकते?

दरअसल कलकत्ता हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश ने ममता बनर्जी की याचिका को जस्टिस कौशिक चंद की एकल पीठ को भेज दी थी। ममता बनर्जी के वकील ने कहा था कि न्यायपालिका में उनके मुवक्क़िल की पूरी आस्था है, लेकिन निष्पक्षता बरकरार रखने के लिए यह याचिका किसी दूसरे जज को सौंपी जानी चाहिए। तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य डेरेक ओ ब्रायन ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा था कि जस्टिस चंद बीजेपी के लीगल सेल के सक्रिय सदस्य रह चुके हैं। ब्रायन ने वह तस्वीर भी ट्वीट की जिसमें जस्टिस चंद बीजेपी के कार्यक्रम में बैठे हुए दिखते हैं। एक दूसरी तस्वीर में जस्टिस चंद अमित शाह के साथ बैठे हुए दिखते हैं। इसके बाद यह माँग की जाने लगी कि न्यायालय की निष्पक्षता के लिए जस्टिस चंद इस मामले से खुद को अलग कर लें।

गुरुवार को सुनवाई में ममता बनर्जी वर्चुअल रूप से मौजूद रहीं। जन प्रतिनिधि क़ानून, 1951, के तहत उन्हें ख़ुद अदालत में मौजूद रहना था। जस्टिस चंद ने ममता के वकील से पूछा कि उन्होंने यह मुद्दा 18 जून को क्यों नहीं उठाया, जब यह मामला पहली बार लिया गया था। उन्होंने कहा कि कौन मामला किस बेंच में जाएगा, मुख्य न्यायाधीश यह तय करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वे सोच रहे हैं कि क्या यह मामला कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश के सामने उठाएं।

जस्टिस कौशिक चंद की एकल पीठ ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उस अर्जी पर फैसला सुरक्षित रख लिया जिसमें उनकी चुनावी याचिका पर जज को सुनवाई से खुद को अलग करने की मांग की गई है। मुख्यमंत्री ने न्यायमूर्ति चंद के याचिका पर सुनवाई करने पर आपत्ति जताते हुए पक्षपात की संभावना का हवाला देते हुए कहा है कि एक वकील के रूप में भाजपा के साथ उनके संबंध थे।

यह कहते हुए कि मामले में हितों का स्पष्ट टकराव है, सिंघवी ने कहा कि न्यायाधीश न्यायिक रूप से अलग होने के आवेदन पर फैसला कर सकते हैं और यह आदेश किसी भी तरह की चुनौती के अधीन होगा। पक्षपात की आशंका के कारणों पर प्रकाश डालते हुए, सिंघवी ने कहा कि जस्टिस चंद भाजपा के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं और वह पहले भाजपा के कानूनी प्रकोष्ठ के प्रमुख थे और विभिन्न मामलों में भाजपा की ओर से पहले भी पेश हो चुके हैं। जस्टिस चंद के भाजपा के साथ “करीबी, व्यक्तिगत, पेशेवर, आर्थिक और वैचारिक संबंध” दिखाने वाले सार्वजनिक स्रोतों से एकत्रित कुछ उदाहरणों को दिखाते हुए, सिंघवी ने कहा कि जस्टिस चंद को उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाना बाकी है और ममता बनर्जी ने इस तरह की पुष्टि के लिए उन्होंने आपत्तियां और विरोध जताया है।

सिंघवी ने कहा कि यह देखना न्यायालय का कर्तव्य है कि कार्यवाही किसी भी पक्षपात से मुक्त हो। न्याय न केवल किया जाना चाहिए बल्कि होते हुए दिखना चाहिए। यदि निष्पक्ष विचार वाले लोग मामले का पूर्व-निर्णय करने की संभावना रखते हैं, तो उन्हें न्याय प्रणाली में विश्वास नहीं होगा। सुनवाई से अलग करने की अर्जी जल्द से जल्द दायर की गई है। यह आपके लॉर्डशिप के प्रश्न का उत्तर देती है- अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है कि यह कोर्ट सुनवाई से अलग करने के आवेदन पर फैसला नहीं कर सकता है। इस पर जस्टिस चंद ने कहा कि याचिकाकर्ता को सुनवाई से अलग करने की मांग करने का पूरा अधिकार है और इस मामले में न्यायिक फैसला होगा।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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