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जब ढहायी जाएंगी हजारों-हजार मूर्तियां!

आज अयोध्या में राम के मंदिर के लिए भूमिपूजन होने जा रहा है। हालांकि इसके पहले एक बार शिलान्यास हो चुका है एक दलित कामेश्वर चौपाल के हाथों। लेकिन शायद यह हिंदू धर्म की अपनी मान्यताओं के अनुरूप न रहा हो।

वर्ण व्यवस्था की मान्यताओं के उल्लंघन के कथित दोषी शंबूक को मारने वाले राम के मंदिर को भला कोई दलित कैसे हाथ लगा सकता है। और मौजूदा समय में देश के सर्वोच्च पद पर बैठा शख्स बीजेपी-संघ की इस पूरी क़वायद से अगर गायब है तो किसी के लिए उसके पीछे के कारणों का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिए।

भला किसी को राम के मंदिर से क्या एतराज हो सकता है? अगर किसी की किसी में आस्था है तो वह उसकी पूजा करे, उसका मंदिर बनवाए और जैसे चाहे उसका इस्तेमाल करे।

यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला है। और यहां तक कि किसी सामूहिक स्थान पर सामूहिक आयोजन के जरिये भी यह काम हो सकता है। उस पर भी किसी को क्यों एतराज होगा? लेकिन यह काम अगर मंदिर के बजाय किसी प्रायोजित आस्था के लिए और वह भी उसके जरिये समाज और देश में अपनी सत्ता और व्यवस्था स्थापित करने के लिए किया जा रहा हो तो सवाल उठना लाजिमी है।

राम का मंदिर किसी सामूहिक आस्था के प्रकटीकरण का नतीजा होता तो भी कोई बात नहीं थी। लेकिन यह एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय पर वर्चस्व स्थापित करने का जरिया बना दिया गया। इस कड़ी में सबसे पहले समाज और सत्ता के जरिये बाबरी मस्जिद को ढहाया गया। और फिर सत्ता हासिल करने के बाद न्यायपालिका के जरिये उस स्थान को छीन लिया गया।

अब उस स्थान पर भव्य मंदिर की स्थापना के जरिये न केवल अल्पसंख्यकों को घुटनों के बल खड़ा कर दिया गया है बल्कि उन्हें यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि देश में उन्हें दोयम दर्जा ही हासिल है।

अगर किसी को यह भ्रम है कि राम मंदिर आंदोलन किसी मंदिर के लिए था तो उसे अब कम से कम यह बात दिमाग से निकाल देना चाहिए। वैसे भी पिछले छह सालों में मोदी ने अल्पसंख्यक विरोधी अभियान चला कर संघ के मंसूबों पर जो रहा-सहा पर्दा था उसको भी फाड़ दिया है। और संघ और उसके कार्यकर्ता तो दूर बीजेपी के आम समर्थक भी उन मंसूबों से परिचित हैं जिसमें रोजी-रोटी और रोजगार नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों को उनकी जगह दिखाने का एजेंडा शामिल है।

इस मामले में वे मोदी को 100 में 100 नंबर दे रहे हैं। इसीलिए नोटबंदी देश को तबाह कर दे या कि कोरोना लाशों का अंबार लगा दे वह मोदी से एक सवाल नहीं पूछने जा रहे हैं। क्योंकि उन्होंने जिसके लिए मोदी को चुन रखा है वह उस पर पूरे खरे उतर रहे हैं।

किसी ने पूछा कि आखिर राम मंदिर या फिर उसके पहले कश्मीर में धारा 370 के लिए अगस्त महीने और खास कर पांच अगस्त की तारीख ही क्यों चुनी गयी। तो ऊपर वाली बात ही यहां के लिए भी सच है। दरअसल यह केवल राम मंदिर नहीं है। यह इस देश में हिंदू राष्ट्र के निर्माण की घोषणा है।

अनौपचारिक तरीके से इस काम को पहले धारा-370 और अब मंदिर निर्माण के जरिये पूरा कर दिया गया है। और अब औपचारिक तरीके से समान नागरिक संहिता लागू करने के साथ संविधान से समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता शब्दों को हटाने के जरिये पूरा कर दिया जाएगा।

अगस्त महीना और उसमें भी उसके शुरुआती सप्ताह को चुनने के पीछे जो मकसद है वह उससे भी बड़ा है। दरअसल यह बीजेपी-संघ के लिए अपने तरह का स्वतंत्रता आंदोलन है। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई को ये अपनी लड़ाई मानते ही नहीं। और यही वजह है कि उन्होंने उसमें भागीदारी भी नहीं की। कहीं गए भी तो अंग्रेजों के साथ रहे। या फिर अंग्रेजों ने कई बार और कई जगहों पर अपने मकसद को पूरा करने के लिए उनका इस्तेमाल किया, लेकिन इस देश की जनता लड़ी और उसके नेता लड़े क्योंकि उन्हें इसकी जरूरत थी।

उस लड़ाई का सर्वोच्च दौर 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन माना जाता है। जिसे ‘अगस्त क्रांति’ के तौर पर जाना और मनाया जाता है। और 9 अगस्त को खड्ग और लंगोटधारी ने जो बिगुल फूंका तो अंग्रेजों को देश छोड़कर भागना ही पड़ा।

संघ समर्थित गोडसे ने भले ही गांधी को भौतिक और शारीरिक तौर पर मार दिया हो। लेकिन पूरी आजादी की लड़ाई की विरासत के साथ और पिछले 70 सालों की सत्ता में भी वह सबसे बड़े प्रतीक पुरुष बनकर भारतीय जनमानस की जेहन में बने रहे। अब उसे प्रतिस्थापित करने की बारी आ गयी है। लिहाजा संघ-बीजेपी को सबसे पहले उस जमीन को हासिल करना होगा।

ऐसे में पहले अगस्त क्रांति के समानांतर और फिर उसको प्रतिस्थापित करने के लिए जरूरी बल पैदा करना इसकी आवश्यक शर्त बन जाती है। लिहाजा आजादी की लड़ाई के बाद राम मंदिर आंदोलन की जो नयी सत्ता होगी उसमें पुरानी लड़ाई को भुलवा देने की पूरी क्षमता होनी चाहिए। यह सब पूरी क़वायद उसी का हिस्सा है।

अनायास नहीं बाबरी मस्जिद को आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस छह दिसंबर को ढहाया गया था। इसके साथ देश में धर्म संबंधी विमर्श पैदा करने के जरिये हिंदुओं में शौर्य और मुस्लिमों में शोक के दिन के तौर पर उसे स्थापित करना था।

इसके साथ ही संघ-बीजेपी एक काम और कर रहे हैं। वह यह कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की विरासत के पहिए को उन्होंने उल्टा घुमा दिया है। देश को एक बार फिर साम्राज्यवादी ताकतों के हाथ सौंप दिया है। सीआईए और वर्ल्ड बैंक से लेकर आईएमएफ सरीखी एजेंसियों की मदद से सत्ता में पहुंचे मोदी अब पूरे देश को अमरीकी एजेंसियों के हाथों सौंप कर देश में धर्म का राज स्थापित करने में लग गए हैं।

अमेरीकी मोह में ईरान से लेकर रूस तक अपने पुराने विश्वसनीय सहयोगियों को घाट पर लगा दिया है। पड़ोसियों से दूरी बनाने में एक पल का भी उन्हें समय नहीं लगा। और इस कड़ी में देश को सामरिक रिश्तों से लेकर हर मामले में अमरीका के नजदीक ले जाकर खड़ा कर दिया गया। अब जब चीन से सीमा पर आमना-सामना है तो अमरीका ही एकमात्र सहारा दिख रहा है।

आने वाले दिनों में अगर इस देश को इस मुकाम पर ले जाकर न खड़ा कर दिया जाए जिसमें जनता खुद अमरीकी सेना बुलाने की गुहार लगाने लगे तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए।

एक बात हमें नहीं भूलनी चाहिए, जब किसी लड़ाई के पीछे ईमानदारी खत्म हो जाती है और सत्ता, षड्यंत्र और निहित स्वार्थ उसके बुनियादी लक्ष्य बन जाते हैं तो उसका पतन अवश्यंभावी हो जाता है। आजादी की लड़ाई की विरासत और उसके नेता लोगों के जेहन में इसलिए जिंदा हैं क्योंकि वह लड़ाई असली थी और उसके दुश्मन भी असली थे, लेकिन यहां तो फर्जी दुश्मन खड़े किए गए हैं और फिर फर्जी नेता बन गए हैं।

वरना राम मंदिर आंदोलन के अगुआ और उसके नायक रहे आडवाणी का जो अपमान हो रहा है क्या वह किसी ईमानदार और सरोकारों वाला आंदोलन अपने किसी नेता के साथ कर सकता था? इसलिए संघ और बीजेपी इसे कितना भी बड़ा बनाने की कोशिश करें इसका बौनापन बार-बार सामने आता रहेगा।

दरअसल भारत यूरोप से 250 साल पीछे है। इसलिए अभी जो यूरोप और अमरीका में हो रहा है उसको समझने और आत्मसात करने में वह नाकाम है। लिहाजा भले ही उतना समय न लगे, लेकिन उस जेहनियत को समझने में अभी भी उसे बड़ा वक्त लगेगा। वरना ऐसे लोग जो कभी उनके देशों और लोगों की सुख, समृद्धि और सम्मान से लेकर वर्चस्व के प्रतीक बने आज उन्हीं की मूर्तियां उनकी नस्लें गिरा रही हैं।

उसमें कोलंबस हों या कि रानी विक्टोरिया कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने मानवता के प्रति अन्याय किया था। इसलिए आज जिस वर्चस्व को स्थापित करने के लिए सत्ता प्रतिष्ठान और उसका तंत्र लगा हुआ है और उसने भले ही समाज के बड़े हिस्से को अपने साथ खड़ा कर लिया है एक दिन यही समाज जब जागरूक होगा तो उसे अपने इन शासकों की भूलों का एहसास होगा और उसके बाद फिर ऐसा भी हो सकता है कि हजारों-हजार मूर्तियां ढहायी जाएं। उसमें कौन-कौन शामिल होगा यह उसी समय का समाज तय करेगा।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

This post was last modified on August 5, 2020 10:06 am

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