Monday, October 25, 2021

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अमेरिका में कहां फंसी है जीत-हार की पेंच, बचे राज्यों का विश्लेषण

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नई दिल्ली। नीचे दिए गए टेबल में यह बताया गया है कि हर राज्य में अभी कितने मतों की और गिनती होनी बाकी है। ये उन राज्यों की सूची है जहां अभी तक विजेता का पता नहीं चल पाया है। इसके साथ वह मार्जिन भी दी गयी है जिससे पहला प्रत्याशी दूसरे से आगे है। इसको देखकर इस बात को समझना आसान रहेगा कि अभी नतीजे में कितना बदलाव हो सकता है। आप को बता दें कि डेमोक्रेटिक प्रत्याशी जो बाइडेन 270 के जादुई आंकड़े के बिल्कुल करीब हैं। और उन्होंने अब तक 264 इलेक्टोरल कॉलेज हासिल कर लिए हैं। उनके लिए अच्छी बात यह है कि वह नवादा में बढ़त बनाए हुए हैं। और अगर वह यहां जीत जाते हैं तो उन्हें बाकी के 6 इलेक्टोरल कॉलेज भी मिल जाएंगे। हालांकि अभी यहां 16 फीसदी वोटों की गिनती होनी शेष है। 

इसके अलावा जार्जिया में नतीजे बदल सकते हैं जहां ट्रम्प महज 2497 मतों से आगे हैं। लेकिन यहां अभी सिर्फ 1 फीसदी वोटों की गिनती होनी बाकी है। 

यह क्यों मायने रखता है

लंबे समय से यह रिपब्लिकनों का गढ़ रहा है। दक्षिणी जार्जिया इसलिए हाल में संघर्ष की जमीन बन गया है क्योंकि हाल में काले मतदाताओं की संख्या में यहां बड़े स्तर पर बढ़ोत्तरी हुई है। 2018 में गवर्नर के चुनाव में रिपब्लिकन ब्रायन केंप ने डेमोक्रेट स्टैसी अब्राम को 1.4 प्वाइंट से मात दी थी।

यह क्यों मायने रखता है

ऐतिहासिक तौर पर रिपब्लिकन की ओर रहने वाला, नॉर्थ कैरोलिना हाल के दिनों में बेहद प्रतियोगी हो गया है। राज्यों का हाल का वोटिंग पैटर्न बेहद ध्रुवीकरण की ट्रेंड को दिखाता है। जिसमें शहर लगातार डेमोक्रेट की तरफ जा रहे हैं जबकि गांव रिपब्लिकन की ओर।

यह क्यों मायने रखता है

पेनिसिलवैनिया उन सबसे बड़े राज्यों में शुमार था जो कुछ 2016 के चुनाव में ट्रम्प के पक्ष में स्विंग हुए थे। उन्होंने राज्य को केवल एक छोटे .7 फीसदी की मार्जिन से जीता था। 1992 के बाद पहली बार यहां रिपब्लिकन जीते थे।

यह क्यों मायने रखता है

पिछले दो दशकों में नेवादा की जनसंख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हुई है। और इसमें लैटिनो, ब्लैक और एशियाई अमेरिकी भारी तादाद में बसे हैं। 2016 में हिलेरी क्लिंटन ने नवादा को 2.4 फीसदी प्वाइंट की मार्जिन से जीता था।

चुनाव कैसे काम करता है?

चुनाव का विजेता एक प्रणाली के जरिये तय होता है जिसे इलेक्टोरल कॉलेज कहा जाता है। वाशिंगटन प्लस 50 राज्यों में प्रत्येक को एक निश्चित इलेक्टोरल कॉलेज की संख्या दी गयी है। जिनके कुल इलेक्टोरल कालेज वोटों की संख्या 538 होती है। छोटे राज्यों के मुकाबले ज्यादा सघन आबादी वाले राज्य को ज्यादा इलेक्टोरल कालेज वोट मिले हैं। प्रत्याशी को जीत के लिए 270 इलेक्टोरल कॉलेज (50%+1) की जरूरत होती है।

दो राज्यों मैने और नेब्रास्का को छोड़कर प्रत्येक राज्य में जो प्रत्याशी ज्यादा वोट हासिल करता है वह सूबे के सभी इलेक्टोरल कॉलेज का हकदार हो जाता है।

इस नियम के तहत कोई प्रत्याशी देश के पैमाने पर बहुमत वोट न पाने के बावजूद चुनाव जीत सकता है। यह पिछले चुनाव में हुआ था जिसमें ट्रम्प इलेक्टोरल कालेज का बहुमत जीत गए थे जबकि देश के पैमाने पर वोटों के हिसाब से हिलेरी क्लिंटन आगे थीं। 

(गार्जियन से साभार।)

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