कोरोना के खिलाफ लड़ाई में कहां खड़ा है केंद्र?

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गृहमंत्री अमित शाह कल पहली बार कोरोना मामले से जुड़ी चिकित्सा व्यवस्था की जानकारी के लिए बाहर निकले और इस कड़ी में उन्होंने दिल्ली के एलएनजेपी का दौरा किया जिसे राजधानी का कोरोना के इलाज के लिए मुख्य अस्पताल बनाया गया है। शाह के अस्पताल दौरे को मीडिया ने इस तरह से पेश किया जैसे स्वर्ग से साक्षात विष्णु धरती पर पधारे हों। और पूरे दिन उनके किसी काम, फैसले या फिर निर्देश का विश्लेषण करने की जगह पूरा मीडिया कतार में खड़ा होकर फूल वर्षा करता रहा। कुछ इस मानिंद कि वह कुछ करें चाहे न करें बस उनका दर्शन ही देश की जनता के लिए काफी है।

शाह अस्पताल में 20 मिनट रहे और इस दौरान उन्होंने अस्पताल प्रशासन और इलाज में लगे दूसरे चिकित्सकों और कर्मचारियों के साथ बैठक की। लेकिन इस बैठक में न तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल थे, न ही स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन। और न ही दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन इसके हिस्से थे। कोई पूछ सकता है कि जब केंद्र सरकार अब दूसरे दौर में सबको साथ लेकर कोरोना से लड़ाई का संदेश देना चाहती है तो अस्पताल के इस दौरे के मौके पर वह संदेश क्यों नहीं दिखा।

दरअसल पिछले तीन महीनों के दौरान कोरोना के खिलाफ पूरा अभियान पीएमओ से संचालित किया जा रहा था। उसमें गृहमंत्री से लेकर स्वास्थ्य मंत्री तक को जिनकी इस पूरे दौरान अहम भूमिका होनी थी, पृष्ठभूमि में रखा गया। वह जनता कर्फ्यू का फैसला हो, या ताली-थाली बजाने और दीपक जलाने की बात या फिर लॉकडाउन की घोषणा सारे फैसले पीएमओ ने लिए। लेकिन अब जब कि तीन महीने बाद यह साबित हो गया है कि न केवल लॉकडाउन फेल किया है बल्कि कोरोना से लड़ाई में केंद्र बुरी तरीके से नाकाम रहा है। तब पीएमओ ने अब अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। और पूरे मामले को अब गृहमंत्रालय के हवाले कर दिया गया है।

इसके साथ ही एक नयी चीज दिखाने की कोशिश की जा रही है कि केंद्र अब सबके साथ मिलकर इस लड़ाई को लड़ेगा। इस कड़ी में पिछले दिनों गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली के राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री भी शामिल थे। लेकिन कहते हैं कि जब नीयत साफ न हो तो सब कुछ किए पर पानी फिर जाता है। अमित शाह का सबको साथ लेकर चलने का संकल्प नॉर्थ ब्लॉक से बाहर निकलते ही टूट गया। किसी और की तो बात दूर वह खुद अपने स्वास्थ्य मंत्री तक को बैठक में नहीं शामिल किए। अब इनसे पूछा जाना चाहिए कि आखिर किस सामूहिक टीम के जरिये आप इस लड़ाई को जीतेंगे। या फिर अभी भी आप सबको अपना गुलाम ही समझते हैं?

कोरोना से निपटने के मामले में अभी भी कोई ईमानदार कोशिश नहीं हो रही है। इन सारी कोशिशों के पीछे निहित राजनीतिक स्वार्थ प्राथमिक है। दरअसल सारी कवायदों में नाकाम हो जाने के बाद पीएमओ ने अब अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया है। लिहाजा पूरे मामले को राज्यों के हवाले कर दिया गया है। यानी सूबे और जिले स्तर पर शासन-प्रशासन जैसा चाहें चीजों को संचालित करें। इस प्रक्रिया में एक दूसरी कोशिश यह की गयी है कि बीजेपी शासित राज्यों को इसमें बचा लिया जाए। उनके दामन पर कोरोना का एक भी दाग न लगे। जबकि यूपी और गुजरात की हालत बेहद बुरी है।

लेकिन दिल्ली के मामले को बड़ा बनाकर पेश करने के जरिये बाकी राज्यों को नेपथ्य में डाल दिया गया है। और इस तरह से केंद्र ने दिल्ली में पहल की है। क्योंकि उसके पास यहां खेलने के लिए पूरा मैदान है। दिल्ली में प्रशासन अगर कोरोना से लड़ने में नाकाम रहता है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी केजरीवाल की होगी और अगर सफल हो गया तो उसका श्रेय केंद्र की पहलकदमी और उसकी कोशिशों को जाएगा। लिहाजा कहा जा सकता है कि यहां केंद्र के दोनों हाथों में लड्डू है।

दिलचस्प बात यह है कि केंद्र सरकार की इस पूरी रणनीति में जाने-अनजाने सुप्रीम कोर्ट भी साझीदार हो गया है। जब उसने अपनी आखिरी सुनवाई में दिल्ली समेत राज्य सरकारों से बात की और उन्हीं को सारे दिशा निर्देश दिए। और कुछ मौके तो ऐसे आए जिसमें जजों के साथ केंद्र के सॉलिसीटर जनरल भी राज्यों की चुटकी लेने से नहीं चूके। और इस पूरे प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और उसकी भूमिका के बारे में न कुछ पूछा और न ही उस पर कोई टिप्पणी की। न तो उससे पिछले तीन महीनों का हिसाब मांगा और न ही यह पूछा कि आगे कोरोना से निपटने के लिए उसकी क्या योजना है? यह कुछ उसी तरह की बात थी जैसे युद्ध हार कर आए बड़े बेटे के मान-सम्मान और प्रतिष्ठा को पिता हर तरीके से बचाने की कोशिश कर रहा हो।

लेकिन मी लार्ड को जरूर यह बात समझनी चाहिए थी कि इस देश में संघीय ढांचे का जो रूप है उसमें इतनी बड़ी और खतरनाक बीमारी के खिलाफ बगैर केंद्र के सहयोग और साझीदारी के नहीं लड़ा जा सकता है। क्योंकि सारे संसाधन केंद्र के पास हैं। वह पैसा हो या कि रिसर्च या फिर विदेशों के स्तर पर इस मामले में जो भी सहयोग और संबंध स्थापित करने हैं वह सब केंद्र के जरिये ही संभव है। लिहाजा पूरे मामले में केंद्र को नेपथ्य में डालकर एक बार फिर एक बड़ी भूल की जा रही है।

और अब तो केंद्र सरकार ने कोरोना के साथ जीने और सबको आत्मनिर्भर बनने का जो मंत्र दे दिया है उसमें यह बात निहित है आपको अपनी सुरक्षा खुद करनी है और इस प्रक्रिया में सारे क्षेत्रों को खोलकर देश की जीडीपी में बढ़ोत्तरी की जिम्मेदारी भी जनता के ही कंधों पर डाल दिया गया है। यानी मरते-कटते गिरते जनता को देश के पूंजीपतियों की सेवा करनी है। यानी लाशों की ढेर पर जीडीपी का पहाड़ खड़ा होगा। और इस तरह से सिर्फ अदानियों और अंबानियों के ही हित केवल नहीं सधेंगे बल्कि बीजेपी और संघ का एक और संकल्प पूरा होगा जिसमें वह देश की आबादी ऐन-केन प्रकारेण कम करना चाहती है।

और इस कोरोना को अगर बीजेपी और संघ अपने सपनों को पूरा करने के एक मौके के तौर पर देख रहे हों तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। लिहाजा इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि पिछले तीन महीनों में केंद्र सरकार ने वह कुछ क्यों नहीं किया जिसको वह कर सकती थी। जिन आपराधिक लापरवाहियों का नतीजा है कि हम एक ऐसे बवंडर में फंस गए हैं जहां से निकलना मुश्किल हो रहा है। पश्चिम के कुछ देशों में ऐसा हुआ भी है जिसमें उन्होंने अपने शासकों से इसकी जवाबदेही मांगी है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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