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क्या पीएम मोदी पर दर्ज होगा देश को गुमराह करने का मुकदमा?

देश के 72वें गणतंत्र दिवस के बारे में अपनी 73वीं मन की बात में प्रधानमंत्री मोदी का कहना है कि 26 जनवरी को तिरंगे का अपमान हुआ है। इससे देश आहत है। इस बात को मोदी ने मन ही में रख लिया कि अपमान किनके द्वारा हुआ है? पर दिल्ली पुलिस ने मोदी के मन की बात जानकर किसान नेताओं को इस अपमान के लिए धर दबोचने की पूरी तैयारी कर ली है।

मोदी मन की बात कर रहे थे। और पत्रकार मनदीप पुनिया दिल्ली पुलिस से पिटाई खा रहे थे। क्योंकि उन्होंने मोदी की पार्टी के गुंडों के सिंघु बार्डर पर ‘‘तथाकथित ‘‘स्थानीय लोग’’ बनकर उत्पात मचाने के षड्यंत्र को सबके सामने ला दिया। पत्रकार मनदीप पुनिया को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। किसानों, पत्रकारों, समाजसेवियों किसी को भी जो संघी-बीजेपी-मोदी-शाह षड्यंत्र की परतें खोलने की कोशिश करेगा उसका हश्र कुछ भी हो सकता है।

बाजपुर उत्तराखंड से आंदोलन में आए एक 34 साल के किसान नवरीत सिंह की आईटीओ के चौराहे पर मौत हुई है। दिल्ली पुलिस का दावा है कि नवरीत की अपने ही ट्रैक्टर से गिर कर मौत हुई। पुलिस की गोली से नहीं। और पुलिस के वर्जन के मुताबिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी हाज़िर है। पर किसान आंदोलन के इस शहीद के दादा की पोस्टमार्टम करने वाले एक डॉक्टर से बात हुई। डॉक्टर ने कहा कि ये जो इंजरी है हमें लग रहा है कि अंदर से कोई चीज़ निकली है। गोली भी हो सकती है। लेकिन ये जांच का विषय है। परिवार के लोगों का कहना है कि ठोड़ी से होते हुए गोली कान से निकली है। लगी तो गोली ही है दबाव में चाहे जो बोले-लिखें।

नवरीत के शव को तिरंगे से ढक कर जब किसान चौराहे पर बैठे थे उस समय मैं वहां से लाइव कर रही थी। नवरीत का दोस्त मलकीत भी उसके पास बैठा था। जब मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ तो उसने बताया कि पुलिस वालों ने गोली मारी हमारे किसान को। गोली मारी और फिर ट्रैक्टर पलट गया। बॉडी को पुलिस वाले लेकर जा रहे थे। हमने डंडे खाए पर बॉडी नहीं जाने दी। कोई वार्निंग नहीं दी सीधा शूट किया उन्होंने।

शशि थरूर समेत कई पत्रकारों पर दिल्ली-हरियाणा और देश के कई राज्यों में गोली वाली बात को ट्वीट करने के लिए केस दर्ज किए गए हैं। आरोप है कि इन लोगों ने देश को गुमराह किया है।

अगर ऐसी ही बात है तो भई गुमराह करने का ये केस तो प्रधानमंत्री मोदी पर भी बनता है। और उन सभी प्रायोजित चैनलों पर भी जो देश को ये बताते रहे कि लाल किले पर लहराते तिरंगे को उखाड़कर नीचे फेंक दिया गया और उसकी जगह खालिस्तान और सिख धर्म का झंडा लगा दिया गया।

अब जबकि ये बात सामने आ चुकी है कि तिरंगा जहां लगा था वहीं लहराता रहा। लाल किले में मौजूद किसानों ने तिरंगे की शान में हज़ारों सलाम पेश किए। तिरंगे की सरपरस्ती में जन गण मन गाया। बावजूद इसके 31 जनवरी को प्रधानमंत्री मन की बात में तिरंगे के अपमान का राग अलाप रहे हैं। ठीक उसी अंदाज़ में जैसे कि उन्हें सपोर्ट करने वाले अंबानी-अडानी के मीडिया ने अलापा।

तिरंगे को भला अपने बच्चों से क्या डर? तिरंगा तो देश के हर नागरिक के अधिकार-संघर्ष की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। साथ-साथ चलते हुए झूम-झूमकर आज़ादी के गीत गाता है। तिरंगा भी जानता है और लोग भी जानते हैं कि इस तंत्र में जिसे लोकतंत्र कहा जाता है वहां तिरंगे और लोक दोनों को संवैधानिक अधिकार है एक दूसरे के साथ कदम ताल करने का। दोनों की ज़िम्मेदारी है एक-दूसरे की रक्षा करने की। तिरंगा किसानों के साथ अपनी जवाबदेही पर मुस्तैद है।

ये भी अब साफ़ हो चुका है कि लाल किले के खाली गुंबद पर जहां कोई झंडा नहीं था वहां प्रधानमंत्री-गृहमंत्री के करीबी दीप सिद्धू की सेना ने निशान साहिब का झंडा लगाया। खालिस्तान का उन्होंने भी नहीं लगाया था। और जो झंडा फेंका गया वो किसान यूनियन का हरा सफ़ेद झंडा था न कि तिरंगा। जांच का विषय अब केवल इतना है कि लाल किले की गुंबदों पर चढ़ने वाले लोग दीप सिद्धू के संगठन के लोग थे या आरएसएस-बीजेपी, बजरंग दल आदि-आदि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का दम ठोकने वालों की सेना से थे। बाबरी मस्जिद के गुंबदों पर चढ़ाई कर उन्हें ध्वस्त करना हो या राजस्थान के उच्च न्यायालय के गुंबद पर चढ़कर भगवा फहराने का चर्चित कुकृत्य, दोनों ही बताते हैं कि संघी गुंडे गुंबदों पर चढ़ने और ट्रेनिंग देने में माहिर हैं। और बीजेपी सरकार वहां तक पहुंचने की सुविधा मुहैया करवाने में।

दिल्ली पुलिस ने उन किसान नेताओं पर यूएपीए आदि आरोप ठोक दिए हैं जो पुलिस के रास्तों को खोलने-बंद करने की धांधली-साज़िश का शिकार हुए। जाम जैसी स्थिति में फंसे रहे। और अपने तय रूट पर भी ट्रैक्टर परेड को अंजाम नहीं दे पाए। दिल्ली पुलिस ने किसानों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। तो किसानों को भी दिल्ली पुलिस से कई सवालों के जवाब चाहिये। किसान दिल्ली पुलिस से जानना चाहते हैं कि 26 जनवरी को दीप सिद्धू सुबह आठ से नौ बजे के बीच सिंघु बार्डर से लाल किले तक बिना किसी रुकावट के कैसे पहुंच गया? और फिर झंडा चढ़ाई कांड करके फरार भी हो गया। किसानों को दिए गए रूट बंद क्यों किए गए? शांतिपूर्ण चल रहे किसानों पर आंसू गैस क्यों छोड़े गए? लोहे के डंडों-लाठी, ईंट-पत्थरों, गोली से किसानों पर हमले क्यों बोले गए?

दिल्ली के आईटीओ चौराहे पर, गांधी शांति प्रतिष्ठान से कुछ गज की दूरी पर एक नौजवान किसान की बुरी तरह घायल बेजान देह उसके साथी लिए बैठे थे। यहां से कुछ हाथ दूर चौराहे पर ही एक किसान अपनी ट्रॉली के साथ खड़ा था। उसी ने मुझे बताया कि जहां भीड़ लगी है वहां पुलिस की गोली से मरे किसान को लिटाया हुआ है। जब मैंने इस किसान से पूछा कि आप कहां जा रहे थे? तो उसने कहा कि हम तो दिल्ली जा रहे थे। यहां पुलिस ने घेर कर, दौड़ा-दौड़ाकर हमें मारा है। मैंने कहा आप दिल्ली में ही खड़े हैं। कहां जाना था आपको। मैंने अपने बाईं तरफ हाथ करके कहा इधर प्रगति मैदान है और दाईं तरफ लाल किला। आपको कहां जाना था। किसान ने उत्सुकता से पूछा – किधर है लाल किला? मैंने दाईं तरफ हाथ का इशारा कर कहा इधर। फिर उसने कहा हमें क्या पता कहां क्या है?

इस किसान के पास चौराहे से कुछ दूर दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने जो ट्रैक्टर-ट्रॉली में रुके किसान खड़े थे उन्हें ये भी पता नहीं था कि कुछ ही दूर चौराहे पर एक किसान मृत पड़ा है। उनमें से एक ट्रॉली पर आंसू गैस का गोला एक किसान के मुंह पर गिरा। जिससे उसकी भौंहें जल गईं थीं। सबने मिलकर कंबल से गोले को दबाया। भीगा-जला कंबल किसानों ने मुझे दिखाया। ये किसान गाजीपुर से निकले थे जो अभी तक यहीं फंसे थे। और रास्ता खुलवाने के चक्कर में एक मारा जा चुका था। लेकिन संघी दीप सिद्धू घंटों पहले लाल किले पर चढ़ाई कर मोदी के मुताबिक तिरंगे का अपमान करके जा चुका था। जिसका ज़िम्मेदार उन किसानों को ठहराया जा रहा है जिन्हें न तो ये पता है कि दिल्ली में कौन सा रास्ता कहां जाता है और न उनकी परेड के लिए वो रास्ते ही खोले गए जो स्वयं दिल्ली पुलिस द्वारा तय किए गए थे।

दीप सिद्धू सेना उत्पात के बाद जो किसान लाल किले पहुंचे वो तिरंगे को सलाम कर रहे थे। तिरंगे की सरपरस्ती में जन गण मन गा रहे थे। क्या मोदी को अब तक नहीं पता कि 26 को प्रायोजित चैनलों ने देश को गुमराह किया था? ये कैसा प्रधानमंत्री है जो नहीं जानता कि उसकी नाक के नीचे क्या हो रहा है? कि उसके गृहमंत्री को उसकी पार्टी का एमएलए किसान नेता को फांसी पर चढ़ाने की धमकी दे रहा है। कि अपने गुंडों को लेकर अन्नदाता धरती पुत्रों को धमकाने-मारने पहुंचा है। कि जिन धरती पुत्रों को तुम गद्दार-आतंकवादी-खालिस्तानी कह रहे हो उन्होंने तुम्हारा हुक्का-पानी बंद कर दिया है। कि मोदी-शाह जोड़ी की दादागिरी अब वो नहीं चलने देंगे।

तथाकथित जिन ‘‘लोकल्स’’ ने पुलिस की सरपरस्ती में गाजीपुर, सिंघु, और टिकरी बार्डर के किसानों पर जो धावा बोला है उनमें से हरेक की ज़बान और चौखटे पर बीजेपी का ठप्पा है ये साबित हो चुका है। जिसमें से एक तो अमित शाह के साथ फोटो खिंचवा रहा है। एक तिरंगा भक्त जिसने तिरंगे की इज़्जत बचाने वाला प्ले कार्ड पकड़ा है उसे या तो तिरंगा लिखना नहीं आता या किसी और ने तख्ती लिखकर उसे पकड़ा दी है। लिखा है ‘‘तिरेगे का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान’’ लिखने की रवानगी देखकर लगता है कि लिखने वाला बहुत जल्दी में है।यूं प्रतीत होता है जैसे सारे शब्द और मात्राएं एक-दूसरे को धकियाते हुए सिंघु बार्डर पहले कौन पहुंचे की होड़ लगाए हुए हैं। एक पल की भी देरी अगर हुई तो तिरंगे की इज़्ज़त बचाने का उनका एकाधिकार जाता रहेगा। वैसे कई बार हमारे देश की विविधता के कारण भी ऐसी ग़तली हो जाती है। जैसे दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर में अमित शाह खुद को गृहमंत्री बता रहे थे। पर सुनने में लग रहा था कि वो गुरुमंत्री कह रहे हैं। गुजराती एक्सेंट यूं नो…वैसे ही तिरंगा तिरेगा हो गया हो किसी विविध भारतवासी से।

सो प्रायोजित कार्यक्रम में तिरंगा ‘‘तिरेगा’’ भले ही हो जाए क्या फ़र्क़ पड़ता है। हां, फ़र्क़ तब पड़ता अगर कांग्रेस या कोई और विपक्षी दल के लोगों के हाथों में ये प्ले कार्ड होता। डीएनए बाबू को एक और महत्वपूर्ण बिंदु मिल जाता कांग्रेस आदि को मूर्ख-अज्ञानी बताने का। जैसे राहुल गांधी के सिंघु बार्डर को शंभू बार्डर बोलने ने डीएनए बाबू का पूरा दिन बना दिया।

26 जनवरी दीप सिद्धू प्रकरण में पुलिस वालों को गंभीर चोटे आई हैं। गुरुमंत्री ने उत्साह बढ़ाया था तो ज़ाहिर है हाल चाल पूछने भी जाना ही था। गुरु मंत्री जब हाथ-पैर पलस्तर से लिपटे दिल्ली पुलिस वालों से मिलने अस्पताल पहुंचे तो आंखों ही आंखों में शिकवे-शिकायत हो रहे होंगे। पुलिस वालों की आंखें कह रही होंगी मरवा दिया गुरु जी। लाल क़िले की खाईं से पटकना तो पटकथा का हिस्सा नहीं था। और गुरु मंत्री के चक्षु कुछ यूं गुर्राए होंगे – कोई बात नहीं इतना तो चलता है। ये न होता तो डीएनए का लाल क़िला दौरा फ़ीका रहता। डालमिया ने हालांकि एक्सट्रा चार्ज कर लिया है। मरम्मत के नाम पर अलग बिल फटेगा।

जाने क्यों ये ख्याल आया कि तिरंगा जहां लगा है क्या उतनी जगह डालमिया के ठेके से मुक्त है? जब ठेका दिया गया था तो डालमिया को सामने खड़ा करके मोदी ने तिरंगे का हौसला बढ़ाते हुए कहा होगा कि तिरंगे जी आप किसी प्रकार का मन में भय मत रखना। डालमिया की तरफ इशारा करते हुए समझाया होगा – ‘‘मैंने ठेकेदार मालिक से कह दिया है हवा के साथ आप जिस ओर लहराना चाहें आपको लहराने दिया जाए। सो जी खोलकर-बेधड़क लहराना। धूप के साथ जिधर परछाईं बनाकर मन बहलाना चाहो बहला लेना। कोई आपको नहीं टोकेगा। आपके अपने मन मुताबिक लहराने की जो भी कीमत ये ठेकेदार लगाएगा मैं देने को तैयार हूं। आपका अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान।

लहराने में तो जैसे कि सबने देखा तिरंगे को कोई मुश्किल पेश नहीं आई। तो क्या दीप सिद्धू ने जो झंडे ठोके उनकी परछाईं ने तिरंगे की परछाई की जगह हड़प ली। और दरअसल यही वो नाकाबिले-बर्दाश्त जुर्म है जिसने मोदी और उनके भक्तों को आहत किया। एक तरफ ये मोदी एंड पार्टी का भावनात्मक नुकसान है दूसरी तरफ देश का आर्थिक नुकसान भी है। क्या पता डालमिया अब ठेके की बाक़ी रक़म भी इस बहाने हड़प कर जाए!

अगर यूं अपमान नहीं हुआ तो फिर क्यों-कैसे हुआ? जिन लोगों को मेरी इस दुविधा पर हंसी आए वो कृपया बताएं कि फिर आखिर तिरंगे का अपमान कैसे हुआ? और हां, एक ज़रूरी सवाल तिरंगे के अपमान से आहत मोदी-शाह से भी है। वो बताएं कि बीजेपी में नेताओं के नाम पर गुंडों की भरती की जाती हैं या बीजेपी में आकर नेता गुंडे बन जाते हैं।

इज़राइली दूतावास पर 29 जनवरी को धमाका भी मोदी को कमज़ोर करने की साजिश है वाया किसान आंदोलन। ये डीएनए बाबू बता रहे हैं देश को। न किसान आंदोलन करते ना फोर्स वहां लगानी पड़ती ना दुश्मनों को मौक़ा मिलता धमाका करने का। ये बात अलग है कि धमाका बहुत हल्का था। उस समय हुआ जब ग़ाज़ीपुर और बाक़ी बार्डरों पर किसानों के साथ ज़बरदस्ती करने के लिए लगाई गई पुलिस-फोर्स किसानों की एकता का नज़ारा देखकर सरकार की सेवा में लौट चुकी थी।

बार-बार देश के नागरिकों और उनके हक़-अधिकार के बरक्स मोदी को कमज़ोर करने की साज़िश के ढोल क्यों पीटे जाते हैं प्रायोजित मीडिया द्वारा? आखिर कौन हैं ये मोदी? ये शाह। क्या इन्हें पता नहीं है कि ये देश के सेवक हैं। इनका चलना-फिरना, खाना-पहनना, ये ठाठ देश के इन्हीं किसान-मज़दूरों की मेहनत के पसीने कीमत से खड़े होते हैं। ये राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट की शान में खर्च होने वाले करोड़ों-अरबों रुपये यही पैदा करते हैं। ये पुलिस-मिलिट्री, प्रशासन इन्हीं के पैसे और बेटों की बदौलत खड़े हैं। अगर ये सब तुम से छीन लिए जाएं तो फिर क्या हो तुम? क्या गलती है इन किसानों-मज़दूरों की? यही कि ये खुद पसीने में तर-बतर खेतों-कारखानों में खटते हैं। और तुम्हारे लिए एसी, कालीनों के महल मुहैया करवाते हैं। खुद सूखी नमक-रोटी में गुज़ारा करते हैं। तुम्हारे लिए हज़ारों रुपये किलो के मशरूम-काजू, 56 भोग परोसने देते हैं। ठिठुरती सर्द रातों में ये खेतों में नंगे पांव पानी चलाएं और तुम पशमीना ओढ़ो, मखमली रजाइयों में खर्राटे खींचों।

जिन किसानों को तुमने हिंदू-मुसलमान में बांटा। चाय बेचने का जुमला गढ़कर भावुक किया। और जिन्होंने आंख मूंदकर तुम्हारे हर सच-झूठ को सिर माथे रखा आज वही तुमसे तुम्हारे हर कथन का सबूत मांगते हैं। है हिम्मत तो आओ सामने। दो जवाब इनके हर सवाल का। तुम्हारी आकाशवाणी अब इन्हें सुनाई नहीं देती। दूर के दर्शन रास नहीं आते। बीच आकर समझाओ ज़रा। जो आज भी गुरूर से कहा तुमने कृषि का आधुनिकीकरण करके रहोगे। जिसका मतलब ये तीनों काले कानून थोपना है। एमएसपी से पल्ला झाड़ना है। तो अब ये संभव नहीं। अब इन्हें तुम्हारे तथाकथित 56 इंच के सीने में अयोध्या के राम देखने से इंकार है। ये तुम्हारे 370 खत्म करने की धींगा मस्ती को नकारते हैं। इन्हें कश्मीर की ज़मीन नहीं अपने खेतों की मिट्ठी का अधिकार प्यारा है। तुम्हारी ज़िद हो या मजबूरी ये समझ लो, अस्तित्व की इस बिसात पर जीतेगा अन्नदाता किसान-मज़दूर ही।

लोहे के पाइप मारे गए हैं हमें। मोटे-मोटे ईंट-पत्थर पुलिस ने मारे हैं। ट्रैक्टर पर जो भी बंदा जा रहा था उन्हें भी मारे गए हैं। बाद में गोली मारी है। पहले आंसू गैस के गोले चलाए। हमारे एक बुजुर्ग का हाथ फट गया आंसू गैस के गोले से। पूरी तरह से जैसे कहते हैं न कि दुश्मनों के साथ जैसे व्यवहार किया जाता है। वो कर रहे हैं हमारे साथ।

हां, 26 जनवरी को किसानों की ट्रैक्टर परेड में हिंसा हुई। आप दुरुस्त हैं हुक्मरान। पर कैसे, किसके द्वारा और किन पर हुई के गढ़े हुए आपके जवाब देश को मंजूर नहीं। जो प्रत्यक्ष थे वो प्रमाण के लिए मौजूद हैं।

वहीं आईटीओ चौराहे पर नवरीत के शव के पास बैठे एक नौजवान का बयान है ये। साथ ही उसने कुछ सवाल भी किए मुझसे। क्या हमारा देश नहीं है ये? हमारा अधिकार नहीं है यहां पर आने का? ये दिल्ली इनके बाप की है? बीजेपी वालों के बाप की है? या मोदी के बाप की है ये दिल्ली? इन सवालों के जवाब किसे देने हैं तय कर लीजिये। देने तो होंगे।

(वीना जनचौक की दिल्ली हेड हैं। इसके अलावा व्यंग्यकार, डाक्यूमेंट्री मेकर भी हैं।)

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This post was last modified on February 1, 2021 11:46 am

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