Sat. Apr 4th, 2020

क्या मोदी जी अपने देश को नहीं जानते !

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पीएम मोदी राष्ट्र को संबोधित करते हुए।

उनसे हमारा बुनियादी मत-विरोध है, पर इस पर मुझे कभी शक नहीं रहा कि वे इस देश को काफी जानते-समझते हैं। हमारी भौतिक-आर्थिक स्थिति, हमारे स्वास्थ्य सेवाओं का हाल, हमारी जनता की रोजी-रोटी का हाल, उसका मनोविज्ञान, उसकी वैचारिक-सांस्कृतिक स्थिति, इन सबकी उनकी अच्छी खासी समझ है।

उन्होंने जनता को आगाह करते हुए अपनी सफाई में समृद्ध-ताकतवर देशों  का जिक्र भी किया।

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तब अपनी कमजोरियों की यह सारी स्थिति समझते हुए भी-

1-जनवरी से ही जब पड़ोसी चीन में यह कहर बरपा कर रहा था, केरल में केस आने लगे, समय रहते इस पर युद्धस्तर पर तैयारी में क्यों नहीं जुटा गया, विदेश से आने वालों की strict monitoring और उन्हें isolate करने के फूलप्रूफ जरूरी उपाय क्यों नहीं किये गए ?

2- देर से जगने के बाद -लगभग डेढ़ महीने निकल जाने के बाद-जब लॉक डाउन (जनता कर्फ्यू) का एलान करने का उन्होंने फैसला किया तब क्या उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि अपना गांव-घर छोड़कर दूसरे प्रदेशों में रोजी-रोटी के लिए गए मजदूरों पर इसकी प्रतिक्रिया होगी ? बेकारी, असुरक्षा की आशंका में उनकी भगदड़ शुरू होगी, सारी social distancing धरी रह जायेगी और कोरोना गांवों तक पहुंच जाएगा ? 

क्या यह जरूरी नहीं था कि जनता कर्फ्यू के साथ ही वे यह भी घोषणा जोर देकर करते कि जो जहां है, वहीं रहे, हम सब के राशन-भोजन की व्यवस्था वहीं करेंगे, अपने किसी देशवासी को भूख से मरने नहीं देंगे, उसके खाते में सरकार और मजदूर जहां काम कर रहे थे उनके मालिकों द्वारा सब के खाते में ज़रूरी पैसा डालना सुनिश्चित किया जाएगा ?

क्या वे नहीं समझते थे कि इसके बिना लॉक डाउन फेल हो जाएगा ?

3-क्या यह बात 3 सप्ताह के लिए घोषित लॉक डाउन के साथ ही सुनिश्चित की जानी ज़रूरी नहीं थी कि लोग पैनिक खरीदारी में न जाएं, उन्हें पहले से यकीन हो कि सरकार सबके लिए ज़रूरी ज़रूरियात की सप्लाई  सुनिश्चित कर चुकी है, ताकि सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां न उड़ें और लॉक डाउन प्रभावी हो?

4-जनता कर्फ्यू के बीच ताली और थाली बजाने का आह्वान करते समय क्या वे सचमुच नहीं सोच सके थे कि इसे जलसा, जुलूस में बदलते देर नहीं लगेगी ? क्या वे ह्वाट्सएप ज्ञान, अंधभक्त,  भयभीत जन मनोविज्ञान को इतना कम समझते हैं ?

इन omissions and commisions से, blunders और चूकों से आगे बढ़कर क्या अब भी वे देश की सारी सार्वजनिक-निजी संपदा-क्षमता को इस महासंकट से राष्ट्र और जनता को बचाने के लिए झोंक देने के लिए आगे बढ़ेंगे ?

दोस्तों,

हर तरह की कांस्पीरेसी theories, अंधविश्वासों (जिसमें अपने इम्यून सिस्टम पर अंधविश्वास-अरे मेरा क्या होगा से लेकर सरकार से अधिक उम्मीद का अन्धविश्वास तक शामिल है) को कठोरता से नकारिये, डरिये मत-पर हर संभव सावधानी बरतिए, संवेदनशील रहिये। दूसरों की यथासम्भव मदद के लिए, नागरिक कर्तव्यों का पालन करिये, सरकार से जरूरी सवाल करते रहिए !

अंततः मानवता जीतेगी !

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। आप आजकल लखनऊ में रहते हैं।)

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