सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्या हरेन पांड्या को न्याय मिल गया?

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नई दिल्ली। गुजरात के पूर्व गृहमंत्री हरेन पांड्या की हत्या के 16 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को पलट कर 12 आरोपियों को दोषी ठहराये जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को फिर से बहाल कर दिया। देखने में किसी को लग सकता है कि हरेन पांड्या के साथ न्याय हो गया। लेकिन क्या यही सच है? और क्या इसको मान लेना चाहिए? फिर गुजरात हाईकोर्ट के उन सवालों का क्या होगा जिसको उसने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए उठाया था। और सीधे-सीधे पूरी जांच को न केवल गलत दिशा में ले जाने की बात कही थी बल्कि जांच में शामिल सभी अफसरों और कर्मचारियों को जमकर फटकार लगायी थी।

उसने साफ-साफ कहा था कि “संबंधित जांच अफसरों को उनकी अयोग्यता की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए जिसके नतीजे के तौर पर यह अन्याय, बहुत सारे लोगों की प्रताड़ना और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संसाधनों का नुकसान और अदालत का समय जाया हुआ है।” कोर्ट ने आगे कहा था कि “मौजूदा केस के रिकार्ड से जो साफ-साफ दिख रहा है वह यह कि हरेन पांड्या की हत्या के केस में चकती लगायी गयी है और बहुत कुछ जो किया जाना था उसे छोड़ दिया गया।”

हाईकोर्ट के इस फैसले को देखने के बाद किसी के भी मन में यह स्वाभाविक सवाल उठेगा कि या तो हाईकोर्ट का फैसला सही है या फिर सुप्रीम कोर्ट का। क्योंकि दोनों फैसले न केवल एक दूसरे के विपरीत हैं बल्कि दोनों अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं।

आगे बढ़ने से पहले कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। पांड्या की हत्या 26 मार्च 2003 को हुई थी। उसके पहले पांड्या अपनी हत्या को लेकर कई बार आशंका जता चुके थे। उन्होंने इस बात को आउटलुक के साथ एक इंटरव्यू में भी कहा था। पहली बार उन्होंने यह आशंका तब जतायी थी जब उन्होंने 27 फरवरी 2002 (गोधरा कांड के दिन) की रात को तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बंगले पर हुई अफसरों की बैठक के बारे में बताया था। उनके मुताबिक इस बैठक में ही मोदी ने अगले दिन वीएचपी द्वारा बुलाए गए बंद के दौरान पुलिस को ढिलाई बरतने या कहिए कोई हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया था।

आउटलुक की रिपोर्ट के मुताबिक उपरोक्त बयान देते हुए पूर्व रेवेन्यू मंत्री ने कहा था कि “मेरा नाम किसी भी खबर में कोट नहीं किया जाना चाहिए। यहां तक कि एक मंत्री या बीजेपी नेता के रूप में भी नहीं। अगर आप बीजेपी नेता लिखेंगे तो मैं मारा जाऊंगा। अगर आप मंत्री लिखेंगे तो भी मेरी हत्या हो जाएगी।” इसके बाद पांड्या ने यह बात गुजरात दंगे की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस कृष्ण अय्यर के नेतृत्व में गठित 10 सदस्यीय कंसर्न सिटीजन्स ट्रिब्यूनल के सामने भी कही थी। इन्हीं बयानों के छह महीने बाद उनकी हत्या हो गयी।

उस समय केंद्र में बीजेपी की सरकार थी। और लाल कृष्ण आडवाणी केंद्रीय गृहमंत्री थे। हत्या को अभी दो दिन भी नहीं बीते थे कि आडवाणी ने मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया। मामला सीबीआई को क्यों सौंपा गया उसका खुलासा खुद उसी के एक अफसर ने पत्रकार राणा अयूब के सामने किया था। जो उनकी किताब गुजरात फाइल्स में दर्ज है। सीबीआई अफसर वाईए शेख ने बताया कि सीबीआई ने इस मामले में अपनी कोई जांच की ही नहीं। उसने केवल वही दोहरा दिया जो गुजरात पुलिस ने उसको बताया था। उन्होंने इस बात का भी खुलासा किया कि पांड्या की हत्या राजनीतिक थी। इसके पीछे एक पूरा राजनीतिक षड्यंत्र था। साथ ही इसमें ढेर सारे नेता और डीजी वंजारा समेत आईपीएस अफसर शामिल थे। शेख का कहना था कि सीबीआई को मामला लीपापोती के लिए सौंपा गया था। यह काम उसे इसलिए सौंपा गया क्योंकि सीबीआई की साख चलते हर कोई उस पर आसानी से भरोसा कर लेगा।  

अब जबकि 2011 में हाईकोर्ट के फैसले के बाद पांड्या मामले में कुछ नये तथ्य सामने आए तो उन पर गौर करने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट के सामने बढ़ गयी थी। जिसमें सबसे महत्वपूर्ण सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई के दौरान मुंबई स्थित सीबीआई की स्पेशल कोर्ट में दिया गया एक गवाह आजम खान का बयान है। जिसमें उसने कहा था कि “सोहराबुद्दीन ने बातचीत के दौरान मुझे बताया था कि नईम खान और शाहिद रामपुरी के साथ उसको गुजरात के गृहमंत्री हरेन पांड्या की हत्या का ठेका मिला था। और उन लोगों ने उनकी हत्या कर दी। मैं बेहद दुखी हुआ और मैंने सोहराबुद्दीन को बताया कि उन लोगों ने एक अच्छे इंसान की हत्या कर दी। सोहराबुद्दीन ने मुझे बताया था कि इसका ठेका उसे वंजारा ने दिया था।” इसके साथ ही आजम के मुताबिक सोहराबुद्दीन का कहना था कि खत्म करने का यह आदेश उन लोगों के पास से आया था जो ऊंचे पदों पर बैठे हैं। उसने बताया कि “ऊपर से यह काम दिया गया था।”
दिलचस्प बात यह है कि इन नये तथ्यों के आइने में इस पूरे मामले की कोर्ट की निगरानी में अलग से जांच करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर की गयी थी। इस फैसले के साथ कोर्ट ने न केवल पीआईएल को रद्द कर दिया बल्कि उसको दायर करने वाले एनजीओ सीपीआईएल यानि सेंटर फार पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन के ऊपर 50 हजार रूपये का जुर्माना भी ठोक दिया।

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अशोक मिश्र ने दिया है। जिनके बारे में बहुत सारी बातें चर्चे में रही हैं। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण इनके ऊपर बीजेपी नेताओं के घरों पर आयोजित होने वाली पार्टियों में शरीक होने का आरोप लगा चुके हैं। यह वही जज हैं जिनके बारे में कहा गया था कि मनमुताबिक फैसले लेने के लिए तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ऐसे मामलों को उनके पास भेज देते थे। और सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने न केवल उसका विरोध किया था बल्कि उन लोगों ने प्रेस कांफ्रेंस तक कर दी थी। जज लोया मामले के साथ भी यही हुआ था उसे जस्टिस अशोक मिश्र के पास भेज दिया गया था। हालांकि बाद में बवाल मचने पर उन्होंने खुद को उससे अलग कर लिया।

आपको बता दें कि ट्रायल कोर्ट ने अशगर अली, मोहम्मद रऊफ, मोहम्मद अब्दुल कयूम शेख, परवेज खान पठान, मोहम्मद फारूक, शाहनवाज गांधी, कलीम अहमेदा समेत 12 लोगों को दोषी करार दिया था। और पांड्या की हत्या के पीछे 2002 के दंगों से उपजे आक्रोश को प्रमुख कारण बताया था।

दिलचस्प बात फैसले का दिन भी है। आज वित्तमंत्री संसद में जब देश का बजट पेश कर रही थीं तब सुप्रीम कोर्ट इतने महत्वपूर्ण मामले पर फैसला सुना रहा था। कोई कह सकता है कि उससे क्या फर्क पड़ता है। और इन दोनों के बीच भला क्या संबंध हो सकता है। अगर किसी को याद हो तो उसे लोया मामले की उस घटना को एक बार फिर याद करना चाहिए जिसमें जजमेंट के ड्राफ्ट की कॉपी सौंपे जाने के बाद लोया से कहा गया था कि फैसला उस दिन सुनाया जाना चाहिए जिस दिन धोनी टेस्ट क्रिकेट से सन्यास की घोषणा करेंगे। और जज लोया की संदिग्ध मौत के बाद जब दूसरे जज ने जब केस संभाला तो उन्होंने सोहराबुद्दीन मामले में अमित शाह के बरी होने का फैसला ठीक उसी दिन सुनाया जब मुंबई में धोनी के स्वागत में लोगों का सड़क पर रेला उतरा हुआ था और पूरा देश उसको टीवी पर देख रहा था उसी समय टिकर में एक खबर चल रही थी कि अमित शाह सोहराबुद्दीन मामले में बरी।

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