अब राजस्थान की राजनीति में भूचाल! क्या सिंधिया की राह पर हैं पायलट?

जयपुर। राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में जो ताजा भूचाल आया है, उसके पीछे प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और डिप्टी सीएम सचिन पायलट को एसओजी यानी स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप द्वारा भेजा गया कानूनी नोटिस बताया जा रहा है। चूंकि गृह विभाग मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पास ही है, इसलिए यह माना जा रहा है कि गहलोत की सहमति से ही पायलट को नोटिस दिया गया। 

एसओजी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक हरिप्रसाद ने यह नोटिस पायलट को 10 जुलाई को ही भिजवा दिया था। इस नोटिस के मिलने के बाद ही पायलट दिल्ली चले गए और राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति में भूचाल आ गया। 

सूत्रों के अनुसार पायलट को इस बात का अफसोस रहा कि भाजपा के शासन में पांच वर्ष तक सड़कों पर संघर्ष किया और अब जब कांग्रेस की सरकार बन गई तो उन्हें ही अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर का अधिकारी नोटिस भेज रहा है। पायलट की नाराजगी के चलते ही राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार खतरे में आ गई है। 

पायलट को नोटिस दिए जाने की खबर 12 जुलाई को न्यूज़ चैनलों में प्रसारित हुई। हालांकि 11 जुलाई को प्रेस कॉन्फ्रेंस में गहलोत ने कहा था कि एसओजी का नोटिस उन्हें भी प्राप्त हुआ है। लेकिन 12 जुलाई को पायलट को नोटिस देने की खबरें जिस अंदाज में प्रसारित हुईं उससे सीएम गहलोत भी चिंतित हो गए। गहलोत को ट्वीट कर सफाई देने पड़ी। 

गहलोत ने कहा कि विधायकों की खरीद-फरोख्त के प्रकरण में एसओजी ने सामान्य स्तर पर बयान देने के लिए मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री से समय मांगा है। गहलोत ने आरोप लगाया कि इस नोटिस को मीडिया में गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि भाजपा के दो कार्यकर्ता अशोक सिंह चौहान (उदयपुर) और भरत मालानी (ब्यावर) के बीच मोबाइल पर जो वार्ता हुई उसके आधार पर ही एसओजी ने मामला दर्ज किया है।

इस बातचीत में कहा गया है कि सचिन पायलट मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, जबकि भाजपा वाले पायलट को केन्द्र में मंत्री बनाना चाहते हैं। सूत्रों की मानें तो पायलट भाजपा के इन दोनों नेताओं के संवाद को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। लेकिन इस संवाद को आधार बना कर सचिन पायलट से उनके समर्थक भी नाराज हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि दो कार्यकर्ताओं की आपसी बातचीत क्या मायने रखती है?

सिब्बल का हमला:

राजस्थान की राजनीति में इन दिनों जो कुछ घट रहा है, उस पर कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री कपिल सिब्बल ने 12 जुलाई को रोचक और गंभीर टिप्पणी की है। सिब्बल ने ट्वीट कर कहा कि मैं अपनी पार्टी के हालातों को ले कर चिंतित हूं। क्या जब अस्तबल से घोड़े भाग जाएंगे तब हम जागेंगे? 

सूत्रों के अनुसार सिब्बल ने यह टिप्पणी कांग्रेस हाईकमान के रुख पर की है। राजस्थान में गहलोत और पायलट के बीच आपसी मतभेद समाप्त करवाने के लिए हाईकमान ने अभी तक भी कोई प्रयास नहीं किए हैं। 

पायलट समर्थकों ने गहलोत से बनाई दूरी

यूं तो पिछले दो दिनों से सीएम अशोक गहलोत के सरकारी आवास पर राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से घूम रहा है। हर समय बैठकों का दौर चल रहा है। लेकिन पायलट के समर्थक माने जाने वाले मंत्री और विधायक गहलोत सरकार के बचाव में सामने नहीं आ रहे हैं। 

खान मंत्री प्रमोद जैन हों या रमेश मीणा, ऐसा एक भी मंत्री मीडिया के सामने सीएम गहलोत के पक्ष में नहीं आ रहा है। इसी प्रकार कांग्रेस के विधायक हरीश मीणा, राकेश पारीक जैसे भी सामने नहीं आ रहे हैं। जहां तक परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास का सवाल है तो माना जा रहा है कि अशोक गहलोत से जानकारी लेने के लिए खुला छोड़ रखा है। जरूरत होने पर खाचरियावास भी निर्धारित स्थान पर पहुंच जाएंगे। पायलट समर्थक मंत्रियों और विधायकों के अचानक गायब हो जाने से भी प्रदेश की राजनीति गर्म हो गई है। 

भाजपा की नजर

बताया जा रहा है कि सचिन पायलट के समर्थक मंत्री और विधायक दिल्ली के निकट मानेसर स्थित आईटीसी होटल में हैं। इन में निर्दलीय विधायक भी शामिल हैं। भाजपा के बड़े नेताओं की नजर विधायकों की संख्या पर लगी हुई है। यदि 25 विधायक जमा होंगे तो ही भाजपा इस जंग में कूदेगी। 

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राजस्थान में गहलोत के नेतृत्व वाली सरकार गिराने के लिए कम से कम 25 विधायक चाहिए। हालांकि 13 निर्दलीय विधायकों पर दलबदल कानून लागू नहीं होता है। निर्दलीय विधायक किधर भी लुढ़क सकते हैं। जिन सुरेश टाक, ओम प्रकाश हुड़ला और खुशवीर सिंह को तीन दिन पहले तक सीएम गहलोत के संग माना जा रहा था, ये विधायक अब संदेह के घेरे में हैं। 

एसीबी का आरोप है कि ये तीनों विधायक गहलोत की सरकार गिराने के षड्यंत्र में शामिल हैं। 12 जुलाई को कई निर्दलीय विधायकों ने जयपुर में गहलोत से मुलाकात की। लेकिन ये तीनों विधायक शामिल नहीं हुए। सुरेश टाक से तो अब मोबाइल पर भी सम्पर्क नहीं हो रहा है। 

पायलट ने दी गहलोत को मात

राजस्थान में कांग्रेस की सरकार गिराने के लिए 11 जुलाई को जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सारा दोषारोपण भाजपा पर कर रहे थे, तब मौजूदा समय में सारी सियासत प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट के इर्दगिर्द घूम रही थी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जितनी ताकत भाजपा को कोसने में लगा रहे हैं उससे आधी ताकत भी यदि कांग्रेस के आंतरिक मतभेदों को दूर करने में लगा देते तो आज सचिन पायलट से मात नहीं खानी पड़ती। 

सब जानते हैं कि राज्यसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा ही माहौल बना था, लेकिन तब गहलोत ने 10 जून को ही सीमा सील कर किसी भी विधायक को दिल्ली नहीं जाने दिया। यही वजह रही कि 12 जून को गहलोत ने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की उसमें पायलट के साथ-साथ प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे भी मौजूद थे, लेकिन 11 जुलाई की प्रेस कॉन्फ्रेंस में गहलोत अकेले नजर आए। न पायलट रहे और न पांडे जी। 

हालांकि प्रेस कॉन्फ्रेंस के तुरंत बाद गहलोत के निर्देशों पर प्रदेश की सीमा फिर से सील कर दी गई, लेकिन सीमा सील होने से पहले पायलट 15 विधायकों के साथ दिल्ली पहुंच गए। इधर, जयपुर में गहलोत भाजपा को कोसते रहे उधर पायलट दिल्ली के मजबूत किले में पहुंच गए। 

गहलोत और उनके इशारों पर नाचने वाले अधिकारी सीमा सील करने के कारण भले ही कोरोना संक्रमण को बताएं, लेकिन सब जानते हैं कि गहलोत ने किन कारणों से सीमा सील करवाई है। बड़ी अजीब बाते हैं कि राजस्थान में आने पर कोई पाबंदी नहीं है, लेकिन बाहर जाने के लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी। इस आदेश से ही सरकार की नियत का पता चलता है। चूंकि इस बार पायलट ने गहलोत को मात दे दी है, इसलिए अब दिल्ली में कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के बुलावे पर भी पायलट उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। 

पायलट को लेकर मीडिया में बेवजह की खबरें चल रही हैं। सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल से मिलने की खबर का चैनल वाले खुद ही खंडन कर रहे हैं। पायलट 11 जुलाई की सुबह से किसी भी पत्रकार का फोन रिसीव नहीं कर रहे हैं। पायलट और समर्थक विधायक कहां हैं, इसकी जानकारी अब शायद सीएम गहलोत को भी नहीं होगी, क्योंकि गहलोत की खुफिया एजेंसियां तो राजस्थान में ही नजर रख सकती है। 

किस करवट बैठेगा सियासत का ऊंट

अब देखना है कि पायलट दिल्ली में सोनिया गांधी से मिलते हैं या फिर मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह कांग्रेस सरकार को धराशाही करते हैं। अब गहलोत की यह आशंका सही हो सकती है कि राजस्थान में भी मध्यप्रदेश की तरह खेल खेला जा सकता है। हालांकि बगावत करने वाले कांग्रेसियों को गहलोत गद्दार कह चुके हैं। यदि पायलट भाजपा के साथ मिलकर राजस्थान में सरकार बनाएंगे तो गहलोत की नजर में पायलट गद्दार होंगे। 

जहां तक जयपुर में मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर मंत्रियों और विधायकों के जमावड़े का सवाल है तो सीएमआर पर परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास भी उपस्थित हैं। खाचरियावास किसके साथ हैं, यह पूरा प्रदेश जनता है। जब सीएम गहलोत की एसीबी निर्दलीय विधायक सुरेश टाक को गहलोत विरोधी मान सकती है तब राजनीति में कुछ भी संभव है। अब प्रदेश की सियासत पूरी तरह सचिन पायलट के किरदार पर निर्भर है।

(जयपुर से स्वतंत्र पत्रकार मदन कोथुनियां की रिपोर्ट।) 

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