क्या ऐसे समर्थक ‘बोझ‘ होते हैं?

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वह आंदोलनों का सच्चा समर्थक है। खुद भी आंदोलनकारी रहा है। अब भी आंदोलनकारी ही है। जीवन भर उसने तन, मन और धन लगाकर एक बेहतर समाज के लिए योगदान किया है। इस जुनून के कारण उसने यातना भी सही है। उसने त्याग किया और अवसर भी गंवाए हैं। संभव है, पारिवारिक दायित्व की सीमा में उलझ गया हो, फिर भी जितना करता है, बड़ी बात है। 

उसे हर आंदोलन से लगाव है। गांधीवादी, समाजवादी, प्रगतिशील, वामपंथी, जनवादी, साम्यवादी, बहुजनवादी इत्यादि सबसे उम्मीद है। किसी से थोड़ा कम, किसी से थोड़ा ज्यादा। किसी एक धारा से उसका ज्यादा वैचारिक लगाव होता है। लेकिन अन्य धाराओं की उपलब्धियों पर भी वह उतना ही खुश होता है। दूसरी धाराओं के नायकों की भी तारीफ करता है। उसे देश के धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक चरित्र को बनाए रखने की चिंता है और आम आदमी के हक में खुलकर बोलता है।

इस लिहाज से वह जनांदोलनों के लिए एक बड़ी ‘पूंजी‘ है। लेकिन कई बार ऐन मौके पर वह अचानक भ्रमित व्यवहार करता है। किसी विवाद या संकट के वक्त वह आंदोलन की ताकतों का पक्ष समझने के बजाय विरोधियों के कुप्रचार का शिकार हो जाता है। ऐसे में वह विरोधियों से भी अधिक चीखकर आंदोलनकारियों के खिलाफ दुष्प्रचार को हवा देता है। ऐसा करके वह आम समर्थक जनता में भ्रम और हताशा पैदा करता है।

ऐसे में वह आंदोलनों के लिए ‘पूंजी‘ है, या उसे ‘बोझ‘ कहना ठीक होगा। अर्थशाष्त्र की भाषा में वह ‘एस्सेट‘ है या ‘लाइबिलिटी‘ समझा जाए?

ताजा प्रसंग देखें। केरल विधानसभा चुनावों में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने इस बार भी शानदार विजय हासिल की। वर्ष 2016 से इस बार आठ सीटें ज्यादा मिलीं। कुल 140 सीटों वाली विधानसभा में 99 सीटें हासिल करके पी. विजयन के नेतृत्व में दुबारा सरकार बन रही है। मंत्रिमंडल में पी. विजयन सहित सीपीएम के कुल 12 विधायकों को जगह मिल रही है।

सीपीएम ने कल मंत्रिमंडल के लिए अपने 12 नाम घोषित किए। इसके बाद गोदी मीडिया और भक्तमंडली ने रातों रात इस सूची पर विवाद खड़ा कर दिया। पूछा गया कि कोरोना महामारी में अच्छा प्रदर्शन करने वाली स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा टीचर को मंत्री क्यों नहीं बनाया जा रहा? इसके साथ ही, पी. विजयन के दामाद और केरल राज्य सीपीएम के सचिव की पत्नी को मंत्री बनाने पर भी सवाल किए गए। इसे वंशवाद, परिवारवाद जैसी संज्ञा दी गई।

सबको मालूम है कि आज भारत के मीडिया का बड़ा हिस्सा किस तरह ‘गोदी मीडिया‘ में बदल गया है। वह आंदोलन की ताकतों के खिलाफ मसाले की तलाश में लगा रहता है। उसे बीजेपी आईटी सेल की बड़ी ताकत मिली हुई है। दोनों मिलकर रातों रात कोई भी नरेटिव खड़ा करने की महारत रखते हैं। बीजेपी आईटी सेल के पास सोशल मीडिया में महिलाओं, मुस्लिम, दलित, आदिवासी, पिछड़े नामों वाले लाखों फर्जी एकाउंट्स और प्रोफाइल हैं। इनके जरिए वह आंदोलन की ताकतों के बीच घुसपैठ करके हितैषी बनते हुए भ्रम फैलाते हैं।

केरल मामले में भी यही हुआ। इसके कारण कुछ आंदोलन समर्थकों में भी तत्काल असुरक्षा भावना पैदा हुई। ऐसे लोग पूरी बात जाने बगैर हायतौबा मचाने लगे। जबकि यह समय ठंडे दिमाग से पूरी जानकारी लेने का था। सीपीएम ने क्या किया है, यह जाने बगैर अचानक ‘आदर्शवादी‘ तरीके से भ्रम फैलाने वाले समर्थकों ने खुद को ‘बोझ‘ साबित किया। यानी लाइबिलिटी।

आइए, समझते हैं, पूरा मामला क्या है।

हर आंदोलनकारी संगठन कुछ खास सिद्धांतों पर चलता है। चाहे कम्युनिस्ट हो, सोशलिस्ट हो, गांधीवादी या आम आदमी पार्टी जैसी नई ताकतें। ऐसे संगठन सिद्धांतों की खातिर बड़ी कुर्बानियां देते हैं, अवसर भी गंवाते हैं। नुकसान सहकर उस पर गर्व भी करते हैं।

1996 में सीपीएम ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। बाद में इसे ‘ऐतिहासिक भूल‘ कहा। लेकिन यह स्मृति ईरानी जैसी किसी अल्पशिक्षित और पराजित को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री बनाने जैसी ‘भूल‘ नहीं थी। 

यह एक व्यावहारिक भूल थी। यह किसी ‘आदर्श‘ से संचालित थी। ऐसी भूल पर गर्व होता है। संभव है, ज्योति बसु को पीएम बनाने से ज्यादा फजीहत होती। तब शायद पीएम बनने को ‘ऐतिहासिक भूल‘ कहा जाता। यह शर्म की बात होती। अभी गर्व तो है।

अभी क्या हुआ केरल में? इस विधानसभा चुनाव में सीपीएम ने तीन महत्वपूर्ण सैद्धांतिक फैसले किए। पहला- लगातार दो बार विधायक रहे लोगों को टिकट नहीं मिलेगा। दूसरा- किसी मंत्री को दुबारा मंत्री नहीं बनाया जाएगा। तीसरा- युवाओं और महिलाओं को ज्यादा अवसर देंगे।

नतीजा यह हुआ कि पांच वरिष्ठ मंत्रियों को विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट तक नहीं मिला। इनमें केरल के चर्चित वित्तमंत्री थॉमस इशाक और पीडब्ल्यूडी मंत्री जी. सुधाकरण जैसे दिग्गज मंत्री भी शामिल हैं। 

इनके अलावा, कानून मंत्री एके बालन, शिक्षा मंत्री सी. रवींद्रनाथ और उद्योग मंत्री ई.पी. जयराजन को भी चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिला। इन पांच मंत्रियों सहित कुल 33 विधायकों को विधानसभा चुनाव की टिकट नहीं मिली।

सीपीएम ने 12 महिलाओं को टिकट दिए। तीस साल से कम आयु के पांच उम्मीदवार खड़े किए गए। कुल 62 सीटों पर सीपीएम की शानदार जीत के बाद अब मंत्रिमंडल में पुराने सारे चेहरों को बदल दिया गया है। यानी, यह सिर्फ के.के. शैलजा टीचर को मंत्री नहीं बनाने का मामला नहीं, बल्कि पिछले मंत्रिमंडल के किसी भी व्यक्ति को मंत्री नहीं बनाया गया है। 

फिर से जान लें- पिछले मंत्रिमंडल के पांच मंत्रियों को विधायक बनने तक का मौका नहीं मिला। स्पीकर पी. श्रीरामकृष्णन को भी टिकट नहीं मिला।

दूसरी ओर, के.के. शैलजा टीचर को पार्टी का मुख्य सचेतक मनाया गया है। यह कैबिनेट मंत्री का दर्जा होता है। कम्युनिस्ट पार्टी में सरकार से ज्यादा महत्वपूर्ण संगठन का पद होता है।

सीपीएम की ऐसी सिद्धांतनिष्ठता के कई उदाहरण हैं। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को बाहर का रास्ता दिखाया था। राज्यसभा सदस्य और महासचिव जैसे पदों पर लगातार जमे नहीं रहने देने के नियम के तहत सीताराम येचुरी और प्रकाश करात जैसे दिग्गजों को वंचित होना पड़ा है। 

यह आपको सही लगे, चाहे गलत लगे, लेकिन यही चीजें हैं जो किसी कम्युनिस्ट पार्टी का आधार होती हैं। ऐसी सिद्धांतनिष्ठता हर किसी के नसीब में नहीं।

लेकिन इतनी बातें समझने की फुर्सत हमारे इस बेचारे आंदोलन समर्थक के पास नहीं। वह तो गोदी मीडिया के नरेटिव का शिकार हो चुका है। वह भड़का हुआ है कि पी. विजयन के दामाद तथा राज्य सचिव की पत्नी को मंत्री बनाया जा रहा है। 

जबकि मो. रियाज दामाद बाद में हैं, पहले वह सीपीएम के चर्चित युवा नेता हैं। वह डीवाईएफआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। राज्य सचिव की पत्नी प्रो. आर बिंदु भी कम नहीं। वह जेएनयू प्रोडक्ट हैं और त्रिसूर नगर निगम की मेयर रह चुकी हैं। इन्हें महज दामाद या पत्नी के रूप में देखना बचकानी हरकत है। 

ऐसे फैसले कोई एक आदमी नहीं, पार्टी करती है। इस मंत्रिमंडल में कुल तीन महिलाओं को जगह दी गई है। इसलिए पितृसत्ता जैसी बातें भी बेमानी हैं।

इस तरह देखें, तो नए चेहरों, युवाओं और महिलाओं को जगह देकर सीपीएम ने एक सराहनीय काम किया है। जिन पार्टियों में ऐसा करने का नैतिक साहस नहीं, उनके नरेटिव में न फंसें। 

शैलजा अच्छा काम कर रही थीं, तो नए मंत्रियों पर भी भरोसा रखें।

और हां, यह मत पूछना कि सबको बदल दिया, तो मुख्यमंत्री को क्यों दुबारा मौका मिला?

पहली बात तो यह कि उन्होंने खुद ही कह दिया है कि अगली बार चुनाव नहीं लडूंगा। 

दूसरी बात, सारे फैसले हम ही कर लेंगे, तो पार्टी क्या करेगी? 

इस मामले में मोदी समर्थकों का जवाब नहीं। वे सचमुच ‘पूंजी‘ हैं। भाजपा की सफलता का रहस्य उनका यही संयम है। कुछ भी हो जाए, वह विचलित नहीं होता। साफ कहेगा- ‘मोदी जी ने कुछ सोचकर ही किया होगा।‘ 

वह हमारी तरह अकबका कर विरोधी प्रचार की आग में घी नहीं डालता। उसे कुछ अनुचित लगे, तो चुपचाप वक्त का इंतजार करता है।

आशय यह नहीं कि हम गलत चीजों का साथ दें। लेकिन जो बात समझ में न आए, उस पर विरोधी नरेटिव बढ़ावा न दें। विरोधी की बात से आंदोलन समर्थक विचलित नहीं होंगे। लेकिन समर्थकों की बात से तो भ्रम फैलता है। 

बेहतर रणनीति यही है कि किसी संकट या विवाद के मौके पर साथ न दे सकें, तो चुप रहकर धुंध छंटने का इंतजार करें। बाद में चाहे जो कह लें। अभी एक कसम खा लें कि ऐसे किसी भी नरेटिव में नहीं बहना है, जो आंदोलन की ताकतों के खिलाफ हो।

(विष्णु राजगढ़िया वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल झारखंड में रहते हैं।)

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