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सातवें चक्र की वार्ता: क्या अपने पूर्वाग्रहों से निकलने के लिए तैयार है सरकार?

पूरे देश की नज़र कल 30 दिसंबर को 2 बजे विज्ञान भवन में भारत सरकार और 40 किसान संगठनों के बीच बातचीत पर टिकी हुई है। पहले भी 5 वार्ताएं हो चुकी हैं। इस बार भारत सरकार की ओर से आमंत्रण पत्र कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव संजय अग्रवाल द्वारा भेजा गया है। सरकार की ओर से एजेंडा में तीनों कृषि कानूनों, एमएसपी की खरीद व्यवस्था, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के आस पास वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए आयोग, अध्यादेश एवं विद्युत संशोधन विधेयक 2020 में किसानों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा एजेंडा बनाया गया है।

भारत सरकार द्वारा इसके पहले किसान संगठनों को लिखे गए पत्रों में एमएसपी के सवाल उठाने को भारत सरकार के संयुक्त सचिव विवेक अग्रवाल द्वारा भेजे गए पत्र में कहा गया था कि कृषि सुधार से संबंधित तीनों कानून से न्यूनतम समर्थन मूल्य का कोई संबंध नहीं है। इस विषय को वार्ता में शामिल किया जाना तर्कसंगत नहीं लगता है।

इससे यह स्पष्ट है कि भारत सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर किसान संगठनों से चर्चा को आगे बढ़ाने की मंशा मजबूरी में दर्शाई है। अभी तक हुई 5 बैठकों के लिए पत्र संयुक्त सचिव विवेक अग्रवाल द्वारा लिखे जाते थे लेकिन इस बार का पत्र कृषि मंत्रालय के सचिव द्वारा लिखा गया है। इससे यह लगता है कि किसानों द्वारा गत 34 दिनों से चल रहे दिल्ली और देश भर में चलाए जा रहे किसान आंदोलन का सरकार पर असर पड़ना शुरू हुआ है हालांकि पत्र में तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने के मुद्दे पर चर्चा का कोई उल्लेख नहीं करने से स्पष्ट है कि सरकार ने किसानों द्वारा दिए गए एजेंडे को स्वीकार नहीं किया है तथा खुले मन से किसान संगठनों से अभी भी बात करने को सरकार तैयार नहीं है।

अभी भी सरकार और भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस

अपनी पूरी ताकत गोदी मीडिया का इस्तेमाल करते हुए कानूनों को किसानों का उद्धार करने वाला बताने और किसान आंदोलन को बदनाम करने में लगा रही है। इस बीच किसान संगठनों ने देशभर में आंदोलन को तेज करते करते हुए पटना, थंजवुर (तमिलनाडू), हैदराबाद और इंफाल(मणिपुर ) में हज़ारों किसानों की रैली आज और अगले 2 दिनों में करने की घोषणा की है। कोलकाता और मुंबई में किसानों की विशाल रैलियां आयोजित की जा चुकी हैं।

200 जिलों में दिल्ली की तरह के अनिश्चितकालीन धरने दिए जा रहे हैं। हरियाणा के सभी टोल प्लाजा मुफ्त किए जाने, 30 दिसंबर को हजारों ट्रैक्टरों की रैली निकाले जाने तथा 1 जनवरी को संविधान की प्रस्तावना की शपथ के साथ तीन कृषि कानून रद्द करने, बिजली संशोधन बिल 2020 को वापस लेने, सभी कृषि उत्पादों की लागत से डेढ़ गुना दाम पर सरकारी खरीद सुनिश्चित करने के कानूनी अधिकार आदि मुद्दों को लेकर हर कुर्बानी देने का देशभर में संकल्प लेने की घोषणा की गई है। 26 जनवरी तक के कार्यकर्मों पर विचार किया जा रहा है।

आंदोलन में आम किसानों और नागरिकों की भागीदारी बढ़ती जा रही है। देश का श्रमिक आंदोलन भी खुलकर किसानों के साथ खड़ा हो गया है।

इससे स्थिति से साफ है कि 30 दिसंबर की बातचीत से तत्काल कोई हल निकलने वाला नहीं है। लेकिन दोनों पक्ष बिना शर्त वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध दिखलाई दे रहे हैं। देश के नागरिकों को यह जानना जरूरी है । सरकार कुछ भी दावा करे पर वह खुले मन से किसानों से बात करने को तैयार नहीं है। शुरू से जानबूझकर भारत सरकार द्वारा 250 किसान संगठनों के मंच अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के वर्किंग ग्रुप को वार्ता से साजिशपूर्ण तरीके से बाहर रखा है।

वर्किंग ग्रुप के एक सदस्य डॉ दर्शन पाल को क्रांतिकारी किसान यूनियन के पंजाब राज्य के अध्यक्ष के तौर पर, कविता कुरुगंटी को महिला किसान अधिकार मंच के तौर पर, हन्नान मौल्ला को कुल हिंद किसान संघर्ष तालमेल कमेटी के तौर पर शामिल किया गया है। लेकिन 40 किसान संगठनों में 250 संगठनों के मंच के प्रतिनिधि के तौर पर एक भी प्रतिनिधि को आमंत्रित नहीं किया गया है।

यह सर्वविदित है कि वर्किंग ग्रुप के सदस्य पूर्व सांसद राजू शेट्टी जी ने लोकसभा में किसानों की ओर से दोनों बिल पेश किए थे। वे संयुक्त किसान मोर्चा की 7 सदस्यीय समिति के सदस्य हैं। इसी तरह योगेंद्र यादव जी को अमित शाह की आपत्ति पर जानबूझ कर बाहर किया गया है।

मेधा पाटकर जी को 35 वर्षों का सरकारों के साथ वार्ता का अनुभव है।अतुल कुमार अनजान स्वामीनाथन कमीशन के सदस्य रहे हैं। राजाराम सिंह 3 बार विधायक रहे हैं। वर्किंग ग्रुप के वी एम सिंह सहित तमाम सदस्य 3 से 5 दशकों का किसान आंदोलनों तथा सरकारों के साथ बातचीत का अनुभव रखते हैं, सभी को वार्ता से दूर रखा गया है ।

सरकार को सबसे ज्यादा परहेज वामपंथी किसान संगठनों से है

यह जगजाहिर है,परन्तु देश के सबसे बड़े किसानों के समन्वय को नकारने के बावजूद एआईकेएससीसी ने इसे मुद्दा नहीं बनाया है ताकि सरकार को कोई बहाना न मिले। यह किसान आंदोलन के भीतर एक दूसरे के प्रति आपसी विश्वास की भावना और एकजुटता को भी दर्शाता है ।

यह केंद्र सरकार की आंदोलन को मुख्यतः पंजाब तक सीमित आंदोलन साबित करने की रणनीति का हिस्सा भी है। मतलब यह है कि भारत सरकार देशभर के करोड़ों किसानों की भागीदारी के साथ लगभग देश के एक लाख से अधिक गांव में सक्रिय तौर पर अध्यादेश के लाने के बाद से ही चल रहे किसान आंदोलन के राष्ट्रीय स्वरूप को स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

जबकि सरकार को यह मालूम है कि बातचीत में भले ही 40 में से 32 किसान संगठन पंजाब के ही क्यों ना हो परंतु पंजाब के किसान संगठन पंजाब के लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए इन कानूनों को रद्द करने के लिए आंदोलन कर रहे है।

जिस तरह से सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर, पलवल, शाहजहांपुर, गाजीपुर में किसानों की संख्या बढ़ रही है उससे यह पता चलता है कि आने वाले समय में दिल्ली की पूरी तरह से नाकेबंदी होना तय है।

सरकार किसान संगठनों को बांटने, थकाने तथा तमाम तरह के उकसावे की कार्यवाही कर टकराव बढ़ाने तथा सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से किसान आंदोलन को खत्म करने की रणनीति पर काम कर रही है। लेकिन आंदोलन का नेतृत्व कर रहे 500 किसान संगठनों में से एक भी संगठन का अब तक सरकार से अलग बातचीत करने के लिए तैयार नहीं होना यह बतलाता है कि दुनिया का सबसे बड़ा एवं लंबा किसान आंदोलन फौलादी एकजुटता लिए हुए है।

केंद्र सरकार के लिए यह नया अनुभव है क्योंकि अब तक वह राजनीतिक दलों का सामना कर रही थी। 2014 से अब तक सरकार सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स विभागों के माध्यम से आसानी से कई पार्टियों के नेताओं को दबाव में लाकर अपनी ताकत बढ़ाई है तथा तमाम राज्यों में सरकार गिराने और बनाने में कामयाब होती रही है लेकिन केंद्र सरकार का यह फार्मूला किसान नेताओं पर रत्ती भर भी कारगर होता दिखाई नहीं पड़ रहा है।

दूसरा हथकंडा सरकार द्वारा फर्जी मुकदमे में जेल भेजकर आंदोलन को कुचलने का रहा है। देश भर के उभरते दलित आंदोलन को भीमा कोरेगांव के केस में 16 लोगों को जेल भेजकर,  नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ चले आंदोलन के 30 नेतृत्वकारियों को दिल्ली के दंगों में फर्जी तौर पर फंसा कर जेल भेजने की कार्रवाइयां की हैं।

इसी तर्ज पर किसान आंदोलन का दमन करने के लिए हरियाणा सरकार ने हर संभव प्रयास किया। किसान नेताओं पर गम्भीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए । 100 से अधिक नेताओं को जेल भेजा। परन्तु किसान पीछे नहीं हटे।

अब किसानों की संख्या बल को देखते हुए इस दिशा में आगे बढ़ने की सरकार की फिलहाल हिम्मत नहीं पड़ रही है।

सरकार लॉकडाउन को लगातार बढ़ाकर यह सोचती थी कि वह किसान आंदोलन को रोक देगी लेकिन यह फार्मूला भी किसानों ने फेल कर दिया है। सरकार ने चुनाव करा लिए, लॉकडाउन जमीनी स्तर पर देश में लगभग समाप्त हो चुका है लेकिन सरकार जानबूझकर सभी ट्रेनें चालू नहीं कर रही है। सरकार को मालूम है कि ट्रेन चालू होने के बाद देश का किसान आना फ्री, जाना फ्री, पकड़ा गए तो खाना फ्री के नारे के साथ लाखों की संख्या में दिल्ली तथा देश भर की राजधानियों में पहुंच जाएगा तथा सभी राजधानियों को जाम कर देगा।  इसलिए केंद्र सरकार दुनिया की सबसे बड़ी यातायात रेलवे व्यवस्था को ठप्प किए हुए हैं, जिससे रोजाना चार करोड़ की संख्या में यात्रा करने वाले रेल यात्री देश भर में परेशान हैं लेकिन सरकार किसान आंदोलन के डर से ट्रेन शुरू नहीं कर रही है।

सरकार सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का इंतजार भी कर रही है लेकिन फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय अपनी गिरती साख को देखते हुए किसानों के खिलाफ खड़ा होने को तैयार दिखलाई नहीं पड़ रहा है । परन्तु सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियां खत्म होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता ।

किसान आंदोलन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जन संगठनों का समर्थन लगातार बढ़ता जा रहा है। किसानों के व्यवस्थित, अनुशासित एवं शांतिपूर्ण तरीके से चलाए जा रहे आंदोलन की देश और दुनिया में प्रशंसा हो रही है। किसान संगठन बार-बार आगामी 6 महीने के आंदोलन के लिए तैयार होने की घोषणा कर रहे हैं जिसके चलते सरकार को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना लगभग तय माना जा रहा है। किसान संगठनों ने अडानी अंबानी के खिलाफ अपने पंजाब से शुरू अभियान को जितनी तेज गति से देशभर में बढ़ाया है उसके चलते अडानी अंबानी के दबाव में आने का असर सरकार पर पड़ने की संभावना बढ़ गई है।

(डॉ. सुनीलम पूर्व विधायक और किसान नेता हैं। और मौजूदा किसान आंदोलन के नेतृत्व के लिए बनी कमेटी के सदस्य हैं।)

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This post was last modified on December 29, 2020 4:41 pm

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