आखिर कौन लेगा मोदी कार्यकाल में बैंकों के 71 हजार करोड़ रुपये के घोटालों की जिम्मेदारी

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हमारे देश का आम आदमी ईमानदार बनकर तरह-तरह की परेशानियों को झेलते हुए देश को आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है। देश के लिए वह सब कुछ लुटवाने के लिए तैयार रहता है। कोई भी सरकार देश के लिए उससे जो भी कुर्बानी मांगती है वह देने को तत्पर रहता है। समय-समय पर देता भी है। इन सबके पीछे उसका मकसद यही होता है कि किसी तरह से उसका देश आगे बढ़े और लोग खुशहाल हों। हर सरकार में वह देश का सुखद भविष्य देखता है। जैसा देश को चलाने वाले उससे कहते हैं वह वैसा ही करता है। 
वैसे तो हमारे देश की भोलीभाली जनता ने हर प्रधानमंत्री पर विश्वास करके पूरा सहयोग दिया है पर जब से देश की बागडोर संघ के प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी के हाथों में आई है तब से लोग हर परिस्थिति में उनका सहयोग कर रहे हैं। तमाम विरोधों के बावजूद उन्हें प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री बना दिया। लोगों को लगता है कि मोदी गरीब परिवार से उठकर प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं तो उनकी मेहनत का एक-एक पैसा देश के उत्थान में लगेगा। लोगों को लगता है कि मोदी के चलते कोई भ्रष्टाचारी अब भ्रष्टाचार नहीं कर पाएगा। मोदी पूंजपीतियों के पास रखे काले धन को उनके भले में इस्तेमाल करेंगे। मोदी की छवि लोगों की नजरों में ऐसी बन गई है कि कोई उनका कितना भी विरोध करे पर लोग मोदी के खिलाफ कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं।
देश की इस जनता के लिए प्रधानमंत्री मोदी क्या कर रहे हैं ? देश के संसाधनों को पूंजीपतियों के यहां गिरवी रख दे रहे हैं। बैंकों में जमा धन को धंधेबाजों को लुटवा दे रहे हैं। जनता की भावनाओं का जमकर दोहन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री युवाओं को रोजगार तो न दे सके पर बैंकों में रखा जनता का पैसा धंधेबाजों को दे दिया।
मोदी के पहले कार्यकाल में बैंकों में 71 हजार करोड़ का घोटाला हुआ है। यह एक बार में नहीं हुआ है। पांच साल में हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि इन घोटालों में बैंकों के अधिकारी और कर्मचारी सहभागी बने हैं। पांच साल तक बैंकों में घोटाले होते रहे पर सरकार ने कुछ नहीं किया।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि इन पांच सालों में कितने बैंक अधिकारी या कर्मचारी जेल भेजे गये। कितने घोटालेबाज गिरफ्तार हुए। इनमें कितने पैसों की रिकवरी हुई। आखिर यह पैसा कहां गया ? किन धंधों में लगा। यदि देश में है तो फिर कहां है? मोदी सरकार में तो सब कुछ आधार कार्ड से लिंक कर दिया गया है। मतलब जनता को बेवकूफ बनाया जा रहा है।
ये घोटालेबाज और बैंक अधिकारी और कर्मचारी वे ही हैं, जिन्होंने नोटबंदी में भी पूंजीपतियों से मिलकर चांदी काटी थी। तब कहा जा रहा था कि ये सब लोग जेल की सलाखों के पीछे होंगे। क्या हुआ? ये सब मौज मार रहे हैं। परेशान तो लोग हो रहे हैं। पैसों की तंगी के चलते कितने बच्चों की सही परवरिश नहीं हो पा रही है। कितने बच्चों को पौस्टिक आहार नहीं मिल पा रहा है। कितने लोग पैसों के अभाव में आत्महत्या कर ले रहे हैं।
जनता के साथ इससे बड़ा मजाक दूसरा नहीं हो सकता कि स्वयंभू नेता देश को विश्व गुरु होने का तमगा दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के रुतबे के बढ़ने का दावा किया जा रहा है और उसका श्रेय मोदी को दिया जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि देश भ्रष्टाचार मुक्त हो गया। इस बीच बैंकों को आधार कार्ड से जोड़ने के जरिये जनता के एक-एक पैसे के सुरक्षित होने का दावा किया जाता रहा।

आखिर यह 71 हजार करोड़ रुपये किसके थे ? जनता का ही न। पूंजीपति, नेता, ब्यूरोक्रैट तो बैंकों में तो कोई पैसा छोड़ते नहीं। उल्टे बैंकों से कर्जा जरूर लिये रहते हैं।
इसको घोटाला मैं नहीं कह रहा हूं। यह खुद केंद्र सरकार बता रही है। दरअसल, लोकसभा में गत पांच वर्षों में हुए बैंक घोटालों का ब्यौरा मांगा गया था। यह भी पूछा गया था कि सरकार ने इस संबंध में क्या कदम उठाए हैं?  सरकार की ओर से इसका जवाब देते हुए वित्तराज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने यह सब जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि बैंकों में धोखाधड़ी की घटनाओं को कम करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं।
सरकार का कहना है कि उसने बैंकों में घोटाले को रोकने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एनपीए की जांच, धोखाधड़ियों की पहचान करने और समय से सूचना देने के लिए एक सिस्टम बनाया है। सरकार का दावा है कि भगोड़े आर्थिक अपराधियों पर नकेल कसने के लिए भी नया कानून बनाया गया है। इन सबके बावजूद घोटाले होते रहे।

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सरकार ने आरबीआई को विभिन्न बैंकों में हुई वित्तीय धोखाधड़ियों की जानकारी लोकसभा में दी। जिस मोदी के कार्यकाल को घोटालेमुक्त बताया जा रहा था। उन मोदी के पहले कार्यकाल में उनके ही वित्तराज्य मंत्री अनुराग ठाकुर के अनुसार 2014-15 में बैंक संबंधी 2630 धोखाधड़ी की घटनाएं हुईं हैं। इनमें 20,005 करोड़ का घोटाला हुआ। 2015-16 में इस तरह के 2,299 मामले सामने आए। इस वर्ष 15,163 करोड़ की धोखाधड़ी सामने आयी। 2016-17 में 1,745 मामलों में 24,291 करोड़ की गड़बड़ी की गई। 2017-18 में 6,916 और 2018-19 में पांच हजार 149 करोड़ की धोखाधड़ी बतायी गयी। अनुराग ठाकुर के अनुसार इन दोनों वर्षों में क्रमश: 1,545 और 739 फ्राड के मामले दर्ज हुए हैं। मतलब ये सब घोटाले मोदी के पहले कार्यकाल में हुए हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जिन बैंकों के अधिकारियों और कर्मचारियों को मोदी नोटबंदी में ईमानदारी का तमगा दे रहे थे। उन्हीं लोगों की मिलीभगत से यह सब हुआ है। 71 हजार करोड़ में से 64 हजार करोड़ रुपये का घोटाला बैंकों के स्टाफ की मिलीभगत से होना बताया गया है। 
ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब नोटबंदी में बैंकों के मैंनेजरों और कर्मचारियों के खिलाफ धोखाधड़ी के इतने मामले सामने आये थे तो इन पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई ?
मतलब जनता का पैसा धंधेबाजों और पूंजीपतियों को लुटवाते रहो और जनता को देशभक्ति का पाठ पढ़ाते रहो। राष्ट्रवाद में उलझाते रहो। जिस देश में लाखों बच्चों भूखे साते हों। पीने का पानी न मय्यसर हो। पहनने के लिए कपड़ा न हो। उस जनता के खून-पसीने की कमाई को सरकार धंधेबाजों के हाथों लुटवा दे रही है। वह भी वह सरकार जो राष्ट्रवाद का झंडा लिये घूम रही है। सब कुछ कुर्बानी जनता ही देगी। देश के नेता, ब्यूरोक्रेट पूंजीपति, चोर उचक्के, लुटेरे सब देश के संसाधनों का मजा लूटते रहेंगे। जनता के पैसों पर अय्याशी करते रहेंगे। और आम आदमी को ईमानदारी और देशभक्ति का पाठ पढ़ाया जाता रहेगा।
देश का किसान रात दिन मेहनत कर इन बेगैरत लोगों के लिए अन्न उपजाये, मजदूर तपती धूप में इन लोगों के लिए आलीशान बिल्डिंग बनाए और ये लोग हैं कि जनता की भावनाओं से खेलने के साथ ही देश को लूटने और लुटवाने में लगे रहे। खोलो अपनी आंखें। जब मोदी के पहले कार्यकाल में बैंकों में घोटालेबाजों ने 71 हजार करोड़ को घोटाला कर लिया तो फिर देखना इस कार्यकाल में कितना बड़ा घोटाला होगा? यदि ऐसा नहीं है तो बताया जाए कि तत्कालीन वित्तमंत्री के साथ क्या किया गया? रिजर्व बैंक के गर्वनर से लेकर संबंधित बैंकों के मैनेजरों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई। कहां हैं वे घोटालेबाज?  कहां है वह पैसा ?
यह बड़ी हास्यास्पद स्थिति है कि पांच साल तक हर साल घोटाले दर घोटाले होते रहे और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। 

(चरण सिंह पत्रकार हैं और आजकल नोएडा से निकलने वाले एक दैनिक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।)

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