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बाइडेन की जीत पर क्यों खामोश हैं चीन और रूस?

नई दिल्ली। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन की जीत पर उन्हें बधाई देने के लिए पूरी दुनिया से तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्षों का तांता लग गया है। लेकिन इस मामले में दो देशों की चुप्पी बेहद रहस्यमय है। गुजरे जमाने की महाशक्ति रूस और मौजूदा दौर में अमेरिका की नजर से नजर मिला कर बात करने वाले चीन ने इस मसले पर चुप्पी साध रखी है। आपको बता दें कि रूस पर 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को जिताने में साइबर तरीके के जरिये मदद करने का आरोप लगा था।

मालद्वीव के राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह इस मामले में सबसे आगे थे। उन्होंने बाइडेन के 270 के आंकड़े को पार करने के 24 मिनट के भीतर ही ट्वीट कर उन्हें बधाई दे डाली। उसके ठीक विपरीत रूस के व्लादीमिर पुतिन और चीन के जिनपिंग ने दो दिन बाद भी अभी तक अपनी जुबान नहीं खोली है।

ट्रम्प के प्रतिबंधों से परेशान ईरान के लिए तो मानो बाइडेन की जीत खुशियों का खजाना लेकर आया है। और उसने इसको छुपाने की भी कोशिश नहीं की। उसने ट्रम्प के जाने का जश्न मनाया। साथ ही सरकार की ओर से आए सामने आए आधिकारिक वक्तव्य में ईरान के साथ गलतियों के लिए अमेरिका से उसकी भरपाई की मांग तक कर दी गयी है।

ईरान के राष्ट्रपति हसन रौहानी ने कहा कि कुछ भी फैसला करने से पहले वह देखेंगे कि बाइडेन क्या करते हैं। क्या ट्रम्प और उनको पदस्थापित करने वाले के बीच कोई अंतर है भी या नहीं?

रौहानी ने कहा कि “ट्रम्प की विध्वंसकारी नीति की अमेरिका के लोगों ने विरोध किया है। अगले अमेरिकी प्रशासन को इस अवसर को अपनी पिछली गलतियों की भरपाई करने में इस्तेमाल करना चाहिए।”

ईरान के विदेशमंत्री जावेद ज़रीफ ने कहा कि शब्द नहीं बल्कि वाशिंगटन के काम मायने रखेंगे। सुप्रीम नेता अयातोल्लाह अली खुमैनी ने अमेरिकी चुनावों का मजाक बनाते हुए कहा कि उदार लोकतंत्र का चेहरा कितना भद्दा हो सकता है यह उसका बेहतरीन उदाहरण है। इसने अमेरिकी प्रशासन में एक निश्चित राजनीतिक, नागरिक और नैतिक पतन को दिखाया है।

इसके अलावा तुर्की के माथे से भी तनाव चला गया है। जिसमें उसके शासक रेसेप तैयिप एर्डोगन ने बाइडेन को सीरियाई कुर्द को समर्थन न देने और मध्यपूर्व में तुर्की की महत्वाकांक्षाओं के रास्ते में न आने की चेतावनी दी है।

तुर्की के उप राष्ट्रपति फौट आक्टे ने कहा कि ट्रम्प की हार दोनों देशों के रिश्तों पर कोई असर नहीं डालने जा रही है। दोनों के बीच संचार के साधन पुराने तरीके से ही काम करेंगे। लेकिन निश्चित तौर पर इस मामले में एक संक्रमण काल होगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अंकारा बाइडेन की विदेश नीति के रवैये पर नजदीक से नजर रखेगा।

माना जा रहा है कि बाइडेन और तुर्की के बीच सीरिया में कुर्दों को लेकर मतभेद हो सकते हैं। मध्यपूर्व को लेकर ट्रम्प की तदर्थवादी कूटनीति ने उस क्षेत्र में अमेरिका के प्रभाव को काफी चोट पहुंचायी है। माना जा रहा है कि इसके चलते तुर्की और रूस को इसका फायदा मिला है।

सऊदी राजपरिवार की ओर से चुनाव पर तत्काल कोई भी बयान नहीं आया है। आप को बता दें कि सऊदी अरब अपनी रक्षा के मामले में पूरी तरह से अमेरिकी रक्षा प्रणाली पर निर्भर है। डेमोक्रेटिक पार्टी में लेफ्ट ब्लॉक युद्धों को हमेशा हमेशा के लिए खत्म कर देने के पक्ष में है। खासकर यमन में सऊदी युद्ध को दिए जाने वाले अमेरिकी समर्थन को वह तत्काल वापस लेना चाहता है।

इस्राइली नेता बेंजामिन नेतनयाहू जिन्हें ट्रम्प के काफी नजदीक माना जाता था, ने चुने गए राष्ट्रपति का बगैर नाम लिए बाइडेन को औपचारिक बधाई संदेश भेजा है। लेकिन इस्राइल निश्चित तौर पर बाइडेन से ईरान पर दबाव जारी रखने तथा इस्राइल और अरब के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया में जारी प्रयासों को समर्थन देने की अमेरिकी नीति को बरकरार रखने की अपेक्षा करेगा।

एशिया में ज्यादातर देश चीन के मसले पर अमेरिकी की कठोर नीति को बरकरार रखने के पक्षधर हैं। इसके साथ ही वे चाहेंगे कि विश्व की इस उभरती शक्ति के साथ सहयोग और विवाद के बीच संतुलन को भी अमेरिका साधता रहे।

एंजेला मार्केल ने कहा कि अगर इस समय की चुनौतियों से हम निपटना चाहते हैं तो ट्रांसएटलांटिक दोस्ती को प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है। जबकि मैक्रान का कहना है कि मौजूदा चुनौतियों से पार पाने के लिए यूरोप और अमेरिका को बहुत कुछ करना है। आइये एक साथ मिलकर काम करते हैं।

यूरोपियन कौंसिल के अध्यक्ष चार्ल्स माइकेल ने कोविड-19, बहुपक्षीयवाद, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भविष्य में सहयोग के इलाके के तौर पर चिन्हित किया।

(‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट पर आधारित।)

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This post was last modified on November 9, 2020 10:44 am

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