क्यों इस देश के सवर्ण एससी-एसटी-ओबीसी के संवैधानिक अधिकारों को स्वीकार नहीं कर पाते?

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भारतीय संविधान में दर्ज स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुता, व्यक्ति की गरिमा जैसे अन्य संवैधानिक मूल्य हमारे जीवन के घोषित आधार हैं। लेकिन आजाद भारत के 75 वर्ष बाद हम संवैधानिक मूल्यों को कितना स्वीकार पाए? 

हमारे देश में संवैधानिक मूल्यों का कितना पालन होता है, इसको जानने-समझने के लिए मैंने सागर जिले (मध्यप्रदेश) के एससी-एसटी और ओबीसी लोगों से बात-चीत किया।

अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले सागर के मकुंदी बंसल बताते है कि, हम आजाद जरूर हो गए है, लेकिन हमारे साथ गांव में ऊंची जाति वाले ऐसे पेश आते हैं कि हमें लगता है कि हम गुलामी की जंजीरों में जकड़े हैं। वे हमारे दूल्हे को घोड़े पर नहीं बैठने देते। अच्छे कपड़े पहनने पर, ऊंची जाति वालों से राम-राम ना करने पर, उनके सामने जमीन पर ना बैठने पर ऊंची जाति वाले खफा हो जाते हैं। सामाजिक नियमों को नहीं मानने पर हमें गालियां सुननी पड़ती है। यहां सोचनीय है बात यह है कि आखिर मकुंदी जैसे लोगों के व्यक्तिगत गरिमा का क्यों सम्मान नहीं किया जाता। उनके संवैधानिक मूल्यों का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता है?

फिर, बंडा विधानसभा क्षेत्र के बिहारी आदिवासी मुंहजुबानी यह वाकया पेश करते हैं, “अपने आप को ऊंचा समझने वाले लोगों के यहां, जब हम लोग समारोह में खाना खाने जाते हैं तब हमें आदरपूर्वक खाना नहीं खिलाया जाता। हमारे साथ बंधुतापूर्ण व्यवहार नहीं किया जाता।”

वे आगे बताते हैं “जब बड़े लोग हमें मजदूरी पर बुलाते हैं और हमारी जाने की इच्छा नहीं होती तो हमें गालियां सुननी पड़ती हैं। ऐसे में, कभी-कभी तो हमें मार भी पड़ जाती है। क्या यहां सामाजिक न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य का उल्लंघन नहीं होता?”  

आगे हमने अरबिंद बंसल से बातचीत की। वे कहते हैं कि सामाजिक असमानताएं ग्रामीण अंचलों में इस तरह हावी हैं कि सेन समाज का नाई अनुसूचित जाति के लोगों के सिर के बाल नहीं काटता। ऐसे में हम लोग बंडा तहसील में सिर के बाल कटवाने जाते है या स्वयं घर पर अपने सिर के बाल काटते हैं। पूछने पर अरबिंद बताते है कि, नाई हमारे बाल इसलिए नहीं काटता, क्योंकि नाई के ऊपर ऊंची जाति के लोगों का दबाब रहता है।

अनुसूचित जाति के लोगों के बाल काटने पर ऊंचा समाज नाई और अनुसूचित जाति के लोगों पर सामाजिक प्रतिबंध लाद देता है। अनुसूचित जाति के लोगों के सिर के बाल ना काटने के हालात बंडा क्षेत्र के कई गांव में बने हुए हैं। अरबिंद अपनी मुंहजुबानी सुनी ये बातें हमें सोचने पर विवश करती हैं कि हम समानता जैसे संवैधानिक मूल्य का कब पालन करेंगे?

आगे हमारी मुलाकात बरा गांव की राजकुमारी बाल्मीकि से हुई। राजकुमारी प्रधानमंत्री आवास योजना होने बाद भी कच्चे मकान में रहने को मजबूर है। राजकुमारी हमें बताती हैं कि, “गांव में हम नीची जाति है, इसलिए हमें कोई अच्छा रोजगार नहीं देता। आज भी हमारा रोजगार सड़क पर झाड़ू लगाना, टोकरी बनाना, छोटे-छोटे घरेलू समान बनाने तक सीमित है। यदि हम बाजार में खान-पान कि, कोई अच्छी दुकान खोलते हैं तब हमारा सामाजिक बहिष्कार किया जाता है।”

आगे हम रूबरू होते हैं करेवना गांव के शालकराम चौधरी से। वह कहते है कि  “हमारे गांव में हम नीची जाति वालों को चाय की टपरी पर चाय तक पीने नहीं देते है, ना ही बैठने देते हैं। आज भी आजाद भारत में समाज में बराबरी का हक नहीं है।”

हमारे सामने सागर संभाग के छतरपुर जिले से एक ताज़ा घटना भी सामने आयी। यह घटना एक दलित की घोड़े से राज फेरने के दौरान ऊंची जाति के लोगों द्वारा पत्थर मारने की है। दरअसल, शादी समारोह में दलित दूल्हे की राज पुलिस की अगुआई में फेरी जा रही थी। लेकिन ऊंची जाति के लोगों को यह पसंद नहीं आया। ऐसे में उन्होंने शादी वाले पक्ष पर पथराव कर दिया, जिसमें तीन पुलिस वाले घायल हो गए। पुलिस ने मामले को अपने संज्ञान में लिया है। ऐसी घटनाएं क्या इस ओर संकेत नहीं करती कि लोगों का स्वतंत्रता जैसा संवैधानिक मूल्य खतरे में है?

एक तरफ हमारे संविधान के स्वतंत्रता, समानता, न्याय जैसे विभिन्न संवैधानिक मूल्य हैं, जो लोगों को कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनाकर, उनके अधिकारों और‌ कर्तव्यों के संरक्षण का बोध कराते हैं। वहीं, दूसरी ओर वे सामाजिक मूल्य हैं, जो इंसान को इंसान बनने में रोड़ा उत्पन्न करते हैं। जैसे, जातिवाद, छुआछूत, सामाजिक भेदभाव, कुप्रथाएं, गैर जरूरी परंम्पराएं‌ और रीतिरिवाज जैसे अन्य सामाजिक मूल्य। 

(सतीश भारतीय स्वतंत्र पत्रकार और विकास संवाद परिषद में संविधान फेलो हैं।)

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