एग्जिट पोल में भाजपा पहली बार इस तरह क्यों हारती दिख रही?

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पिछले कई सालों में यह संभवत: पहला मौका है, जब किसी चुनाव के बाद हुए एग्जिट पोल में भारतीय जनता पार्टी को निर्णायक तौर पर हारते दिखाया गया है। इससे पहले किसी चुनाव में खास कर उन राज्यों में जहां भाजपा सीधे मुकाबले में होती है, वहां कम से कम एग्जिट पोल में भाजपा को स्पष्ट रूप से हारते हुए नहीं दिखाया जाता था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। जो टीवी चैनल दिन-रात भाजपा के एजेंडा पर काम करते हैं और चुनाव के दौरान उसका खुल कर प्रचार करते हैं, उन चैनलों पर भी एग्जिट पोल में भाजपा को सीधे तौर पर हारते हुए और कांग्रेस को बहुमत मिलते हुए दिखाया गया है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि ये चैनल सुधर गए हैं और अब इन्होंने पेशागत ईमानदारी के साथ काम करना शुरू कर दिया है।

आमतौर पर जिस भी प्रदेश में भाजपा मुख्य मुकाबले में होती है वहां एग्जिट पोल में उसे जीतते हुए दिखाया जाता है। अगर चुनाव प्रचार या आम मतदाताओं के व्यवहार से बनी धारणा के आधार पर यह स्पष्ट भी दिख रहा हो कि भाजपा नहीं जीत रही है तब भी वहां कांटे का मुकाबला या उसे कम से कम जीत के नजदीक तक जाते हुए जरूर दिखाया जाता है। टीवी चैनलों के बारे में यह धारणा पिछले 8-10 सालों के दौरान हुए चुनावों के एग्जिट पोल के निष्कर्षों पर आधारित है।

टीवी चैनलों और सर्वे करने वाली एजेंसियों के इस व्यवहार को दो अलग किस्म के राज्यों के एग्जिट पोल अनुमानों से समझा जा सकता है। पहला राज्य पश्चिम बंगाल है, जहां 2021 में विधानसभा चुनाव हुए थे। बंगाल में भाजपा का बहुत जनाधार नहीं था और वह तृणमूल कांग्रेस से दलबदल कर आए शुभेंदु अधिकारी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही थी। उसके ज्यादातर उम्मीदवार भी तृणमूल कांग्रेस अन्य पार्टियों से दलबदल कर आए नेता ही थे। फिर भी राष्ट्रीय स्तर के कहे जाने वाले कम से कम दो टीवी चैनलों ने भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने का अनुमान जताया था।

इंडिया टुडे समूह के आज तक और इंडिया टीवी ने भाजपा के जीतने की भविष्यवाणी की थी और टीवी 9, एबीपी न्यूज सहित कई चैनलों ने कांटे का मुकाबला दिखाते हुए भाजपा को 100 से ज्यादा सीटें मिलने का अनुमान जताया था। किसी भी टीवी चैनल या सर्वे एजेंसी ने तृणमूल कांग्रेस की एकतरफा जीत का अनुमान नहीं जताया था। लेकिन वास्तविक नतीजों में भाजपा को सिर्फ 77 सीटों पर जीत हासिल हुई, जबकि 292 सदस्यों की विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस ने दो तिहाई से ज्यादा सीटें हासिल की। जाहिर है कि सारे टीवी चैनलों और सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल नतीजे औंधे मुंह गिरे।

दूसरा राज्य हिमाचल प्रदेश है, जहां छह महीने पहले विधानसभा चुनाव हुए थे। वहां भाजपा सत्ता में थी और हर पांच साल पर सत्ता बदल के रिवाज को बदलने के नाम पर चुनाव लड़ रही थी। सारे टीवी चैनलों ने भी चुनाव के दौरान ऐसा माहौल बना दिया था कि भाजपा इस बार सत्ता बदल के रिवाज को बदलने जा रही है। हिमाचल प्रदेश भाजपा के मजबूत असर वाला राज्य रहा है। वहां के चुनाव में 12 बड़े मीडिया समूहों ने एग्जिट पोल के नतीजे जारी किए थे, जिनमें से छह ने भाजपा की स्पष्ट जीत बताई थी।

जी न्यूज, एबीपी न्यूज, इंडिया टीवी, रिपब्लिक टीवी, टाइम्स नाउ और न्यूज एक्स ने भाजपा को बहुमत मिलने की भविष्यवाणी की थी। आजतक एकमात्र चैनल था, जिसने कांग्रेस की जीत का अनुमान जताया था। बाकी टीवी चैनलों ने बराबरी का मुकाबला दिखाते हुए त्रिशंकु विधानसभा बनने की बात कही थी। लेकिन वास्तविक नतीजों में कांग्रेस ने 70 सदस्यीय विधानसभा में 40 सीटें जीती और भाजपा को 25 सीटें हासिल हुईं।

इन दो उदाहरणों के अलावा इनसे पहले कुछ चुनावों के उदाहरण भी दिलचस्प और गौरतलब हैं। जैसे बिहार में 2015 के विधानसभा चुनाव में जब लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की अगुवाई में राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यू) और कांग्रेस के महागठबंधन का मुकाबला भाजपा के गठबंधन से था, जिसमें लोक जनशक्ति पार्टी और जीतनराम मांझी व उपेंद्र कुशवाह की पार्टी भी शामिल थी। जमीनी स्तर पर लालू और नीतीश के महागठबंधन की जीत साफ दिख रही थी लेकिन लगभग सभी टीवी चैनलों और सर्वे एजेंसियों ने अपने एग्जिट पोल में भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन को बहुमत मिलने का अनुमान जताया था। जबकि वास्तविक नतीजों में महागठबंधन को 178 सीटों के साथ करीब तीन चौथाई बहुमत हासिल हुआ था और भाजपा नीत गठबंधन महज 55 सीटें जीत सका था। इस प्रकार सभी एग्जिट पोल्स के नतीजे बुरी तरह बोगस साबित हुए।

इसी तरह 2018 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भी एग्जिट पोल के नतीजों की यही कहानी रही। इन तीनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी थी लेकिन ज्यादातर टीवी चैनलों या सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल अनुमान सिर्फ राजस्थान में ही वास्तविक नतीजों के करीब रहे थे। हालांकि किसी भी एग्जिट पोल में यह नहीं बताया गया था कि कांग्रेस भी बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पाएगी, जबकि वास्तविक नतीजों में कांग्रेस को बहुमत के आंकडे से एक सीट कम आई थी और उसने बहुजन समाज पार्टी और निर्दलीय विधायकों की मदद से सरकार बनाई थी।

दूसरी ओर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के वास्तविक नतीजे ज्यादातर चैनलों और सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल अनुमानों के उलट आए थे। उस चुनाव में दस बडे़ मीडिया समूहों और सर्वे एजेंसियों में से छह ने अपने एग्जिट पोल में अनुमान जताया था कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सत्ता बरकरार रहेगी। जिन चार टीवी चैनलों और सर्वे एजेंसियों ने कांग्रेस को बहुमत मिलने का अनुमान जताया था उन्होंने भी यह नहीं बताया था कि कांग्रेस प्रचंड बहुमत से सरकार बनाएगी। चारों ने कांग्रेस को सामान्य बहुमत मिलने का अनुमान जताया था लेकिन कांग्रेस ने 90 सदस्यीय विधानसभा की तीन चौथाई यानी 68 सीटें जीत कर सरकार बनाई थी।

उस चुनाव में मध्य प्रदेश के मामले में आठ मीडिया समूहों में से पांच ने भाजपा को फिर से बहुमत मिलने का अनुमान जताया था और तीन ने कांग्रेस को बहुमत मिलते दिखाया था। लेकिन जब वास्तविक नतीजे आए तो दोनों ही पार्टियां स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर सकी थीं। कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले पांच सीटें अधिक मिली थीं लेकिन बहुमत का आंकड़ा छूने में उसे दो सीटें कम पड़ गई थीं और उसने निर्दलीय विधायकों और सपा-बसपा के समर्थन से सरकार बनाई थी।

इसलिए कहा जा सकता है वास्तविक नतीजे कुछ भी हों, एग्जिट पोल में भाजपा निर्णायक रूप से कभी नहीं हारती है। इस बार कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में न्यूज नेशन एकमात्र चैनल है, जिसने भाजपा के एक सौ सीट का आंकड़ा पार करने और कांग्रेस के सौ सीट से नीचे रहने का अनुमान जताया है। इसके अलावा चार बड़े चैनलों ने कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिलने की बात कही है। अन्य चैनलों ने कांग्रेस को एक सौ से ज्यादा सीट मिलने और भाजपा के सौ सीट से नीचे रहने का अनुमान जताया है।

यानी ज्यादातर चैनलों ने नजदीकी मुकाबले में भाजपा को हारते दिखाया है। अगर ज्यादातर चैनल भाजपा को हारते दिखा रहे हैं तो इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि मुकाबला नजदीकी नहीं होगा। अगर मुकाबला कांटे का होता तब तो एग्जिट पोल में भाजपा जरूर जीत रही होती।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार है।)

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