बंगाल पर फतेह पाने को इतनी बेताब क्यों है भाजपा!

भाजपा बंगाल पर फतह पाने को इतनी बेताब क्यों है? लोकतंत्र में चुनाव होना एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और कोई दल सत्ता में आता है तो कोई विपक्ष में बैठता है। पर यहां तो सवाल फतेह का है, क्योंकि भाजपा की फौज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में बंगाल पर हमला बोल दिया है। सफलता पाने के लिए उन्हें साम, दाम, दंड, भेद किसी भी हथियार का इस्तेमाल करने से कोई परहेज नहीं है। भाजपा का कोई भी ऐसा नेता और भाजपा शासित प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बचा है, जिसने बंगाल में आकर जोर आजमाइश न की हो। इसके साथ ही उनके पास सीबीआई, ईडी और एनआईए का भी हथियार है।

भाजपा की इस बेताबी को समझने के लिए हमें इसका विश्लेषण दो चरणों में करना पड़ेगा। पहला चरण पश्चिम बंगाल सहित चार राज्यों में निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव कराए जाने की घोषणा से शुरू होता है। दूसरे चरण का विश्लेषण असम के चुनाव के समाप्त होने और उसके साथ ही त्रिपुरा में हुए एक छोटे से चुनाव के नतीजों के साथ जोड़कर किया जा सकता है। भाजपा का मंसूबा रहा है कि उत्तर पूर्व के सभी राज्यों को भगवा चादर से ढक दिया जाए। असम से शुरू होने के बाद बंगाल में ही आकर इसकी सरहद समाप्त होती है। इसके लिए चुनाव की घोषणा होने के साथ ही एक ऐसी फिजा बनाई गई जैसे बंगाल में बस चुनाव भर होने की देर है और भाजपा की सरकार बनना तय है। अबकी बार भाजपा दो सौ के पार का प्रचार कुछ इस तरह किया गया कि सभी यह मान बैठे कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बन ही रही है, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

अब आइए जरा पश्चिम बंगाल की विधानसभा सीटों का जातिगत समीकरण के आधार पर विश्लेषण किया जाए, क्योंकि भाजपा तो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को ही आधार बनाकर चुनाव लड़ रही है। बंगाल में विधानसभा की 294 सीटें हैं। उनमें से 60 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता चुनाव परिणाम तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। भाजपा के अभी तक के चुनावी प्रचार के चरित्र के आधार पर क्या इस बात की संभावना बनती है कि ये मतदाता भाजपा को वोट देंगे। भाजपा ने रस्म निभाने के लिए करीब आठ दस मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है। उधर दार्जिलिंग जिले के नए चुनावी समीकरण के कारण विधानसभा की पांच सीटों पर भाजपा का खाता बंद हो गया है। इस तरह बची 229 सीटें और इनमें से भाजपा दो सौ के पार चली जाएगी तो तृणमूल कांग्रेस और संयुक्त मोर्चे का क्या होगा। अब कोई अगर दिमाग से पूरी तरह पैदल हो तो ही इस गणित पर यकीन कर सकता है।

भाजपा नेताओं को यह पता था, इसीलिए उन्होंने सांप्रदायिकता को ही अपना चुनावी आधार बनाया। इसके साथ ही सारे छल फरेब भी किए गए। मसलन तृणमूल सहित अन्य राजनीतिक दलों को तोड़ने के साथ ही मतदाताओं को नकदी देने की पेशकश भी की गई। जैसे दक्षिण 24 परगना के राय दिघी में मतदाताओं को एक-एक हजार रुपये के कूपन दिए गए। भाजपा की तरफ से कहा गया कि गांव वालों ने भाजपा को चंदा दिया है। अब कोई भला कैसे यकीन कर ले कि दक्षिण 24 परगना जिले के एक गांव के मतदाता इतने समृद्ध हैं कि वे भाजपा को एक-एक हजार रुपये चंदा दे सकते हैं। हकीकत तो यह है कि यह कूपन मोदी की रैली में आने और भाजपा को वोट देने के लिए दिए गए थे। कहा गया था कि वोट देने के बाद भाजपा के स्थानीय कार्यालय से कूपन दिखाने पर एक हजार रुपये मिल जाएंगे।

असम में चुनाव समाप्त होने के बाद भाजपा की बुलंदी की हवा निकलने लगी। इसके साथ ही त्रिपुरा में भाजपा की सरकार होने के बावजूद स्वायत्तशासी जिला परिषद के चुनाव में भाजपा को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। असम में चुनाव से पहले जो उम्मीद थी वह चुनाव के बाद दरकने लगी है। इस तरह असम से लेकर बंगाल तक भगवाकरण करने की उम्मीद टूटने लगी तो भाजपा की पूरी फौज बंगाल पर टूट पड़ी है। अब उन्हें नैतिकता को ताख पर रखते हुए किसी भी हथियार का इस्तेमाल करने से कोई परहेज नहीं है। मसलन चुनावी प्रक्रिया जारी रहने के दौरान ही राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी, विधायक मानस भुइयां और तृणमूल कांग्रेस के कमरहाटी से उम्मीदवार मदन मित्रा के पुत्र स्वरूप मित्रा को ईडी ने एक चिटफंड कंपनी आई कोर के बाबत पूछताछ करने के लिए तलब किया है।

इतना ही नहीं एक ऑडियो टेप भी जारी किया गया है। इसमें, जैसा कि कहा जा रहा है, ममता बनर्जी अपनी पार्टी के कूचबिहार जिला के अध्यक्ष से कहती हैं कि सीतलकुची में फायरिंग में मारे गए चार लोगों की लाशों के साथ एक जुलूस निकाला जाएगा। पहला सवाल है दो लोगों के बीच निजी बातचीत को किस तरह और किसके आदेश पर टेप किया गया। क्या यह टेलिग्राफ एक्ट और आईटी एक्ट का उल्लंघन नहीं है? प्रधानमंत्री मोदी इस सवाल का जवाब देने के बजाय आसनसोल में एक जनसभा को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी को कटघरे में खड़ा करते हैं। कहते हैं कि ममता बनर्जी लाश के साथ राजनीति कर रही हैं। पर यह भूल जाते हैं कि पिछले साल संदेशखाली में पुलिस फायरिंग में मारे गए तीन लोगों के शव को लेकर भाजपा ने जुलूस निकाला था।

इसके साथ ही मोदी 2018 में आसनसोल में रामनवमी के मौके पर हुए दंगे की याद दिलाते हुए ममता बनर्जी को कटघरे में खड़ा करते हैं। इस दंगे में इमाम इमादुल्लह रसीदी का 16 साल का बेटा मारा गया था। उसे ईदगाह में दफनाते समय इमाम ने सभी धर्म के लोगों से अपील की थी के बदले की कार्रवाई न हो और दंगे को रोका जाए। उन्होंने कहा था कि आसनसोल हमारा है और हम सभी को मिलकर इसके सांप्रदायिक सौहार्द की रक्षा करनी पड़ेगी। अब इमाम, मोदी से सवाल करते हैं कि जो जख्म भर चुके हैं उन्हें क्यों कुरेदे जा रहे हो। पर मोदी पर इसका कोई असर नहीं होता है, वे सांप्रदायिक आधार पर आसनसोल में वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए बेताब हैं। मोदी यह भी भूल जाते हैं कि इस दंगे के लिए उनकी पार्टी ने जिसे जिम्मेदार ठहराया था वही जितेंद्र तिवारी पांडेश्वर विधानसभा में उनकी पार्टी के उम्मीदवार बन गए हैं। ये तृणमूल छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं।

भाजपा की बंगाल फतेह की इस जंग को लेकर लोगों का सवाल है कि क्या बंगाल में जातिगत संघर्ष का दौर शुरू हो जाएगा। यहां तो अभी तक राजनीतिक, आर्थिक और सरकार की सफलता एवं असफलता के आधार पर चुनाव लड़े जाते रहे हैं। भाजपा की ध्रुवीकरण की इस नीति के कारण क्या बंगाल फिर वापस 19वीं सदी में चला जाएगा जब सामाजिक विकास पर जाति की मुहर लगी होती थी। क्या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का यह प्रयास बंगाल को 1947 के मुकाम पर ले जाएगा। लोग कहते हैं कि उस समय तो एक गांधी थे, आज दूसरा गांधी कहां से लाएंगे।

(जेके सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और पश्चिम बंगाल में रहते हैं।)

This post was last modified on April 20, 2021 7:17 pm

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