Sunday, May 29, 2022

ग्राउंड रिपोर्ट: भारत के सबसे गरीब जिले में बढ़ रहा चाय उत्पादन चंद पूंजीपतियों तक ही क्यों है सीमित

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किशनगंज। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे गरीब राज्य बिहार का सबसे गरीब जिला किशनगंज में लगातार चाय की खेती का रकबा बढ़ता जा रहा है। जिस वजह से इस जिले में रोजगार मिलने के साथ ही पलायन की समस्या खत्म हुई है। हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि किशनगंज में चाय की खेती चंद अमीर व्यापारियों तक ही सीमित है।

वजूद की लड़ाई लड़ते किशनगंज के छोटे चाय-किसान और मजदूर

किशनगंज के ठाकुरगंज प्रखंड के कनकपुर पंचायत की 65वर्षीय आशा देवी विगत 35 सालों से चाय के खेतों में मजदूरी का काम करती हैं। आशा बताती हैं कि “चाय के खेतों में पुरुष से ज्यादा महिलाओं को मजदूरी पर रखा जाता है। क्योंकि पुरुष की अपेक्षा हम लोग मजदूरी कम लेते हैं। एक महिला मजदूर को तीन से चार रुपए किलो चाय पत्ता तोड़ने के लिए मिलता है। एक मजदूर पूरे दिन में 60 से 70 किलो पत्ता तोड़ पाता है। मतलब 200 से 250 रुपये की मजदूरी बनती है। खाना भी अपना ले जाना पड़ता है। कभी पत्ती का रेट गिर जाता है तो 2 रुपये किलो भी तोड़ना पड़ता है।”

“पश्चिम बंगाल में चाय मजदूरों को सरकार के द्वारा राशन की सुविधा फ्री में दी जाती है। साथ ही मजदूरी भी प्रत्येक दिन दी जाती है। चाय बागान में हो या फिर चाय की फैक्ट्री में, लेकिन बिहार में सिर्फ चाय बागान में ही काम करना पड़ता है। राशन की भी कोई सुविधा नहीं है।” आगे आशा देवी बताती हैं।

बिना सरकार की मदद के छोटे किसान चाय की खेती नहीं कर सकते

1996 तक किशनगंज के ठाकुरगंज प्रखंड में अधिकतर किसान केला की खेती करते थे। एक भयंकर चक्रवात आने के बाद किशनगंज के बहुत केला व्यापारी चाय की खेती की तरफ शिफ्ट कर गए। उसी में एक राधे कृष्णा भी थे। राधे कृष्णा जनचौक को बताते हैं कि “एक एकड़ में चाय की खेती शुरू करने में शुरुआती लागत लगभग एक लाख से डेढ़ लाख रुपए की आती है। उसके बाद शुरुआती तीन साल पौधे विकसित होने में लगते हैं। फिर चौथे साल से प्रतिवर्ष 15 से 20 हजार रुपया आने लगता है। अगले पांच साल में पूरी लागत वसूल हो जाती है। आठवें साल से मिलने वाली रकम शुद्ध मुनाफा होता है,जो अगले 50 वर्षों तक मिलता रहता है।”

राधे कृष्णा आगे बताते हैं, “इस दौरान पौधों के रखरखाव पर भी अच्छा खासा खर्च आता है। जैसे कभी-कभी चाय के पौधे में लूपर नाम का कीड़ा लगता है। जिसे हटाने के लिए ‘रीसेंट’ नाम के दवाई का छिड़काव किया जाता है। जिस दवाई के 100 ग्राम वाले पैकेट की कीमत 3200 रुपये है। मतलब एक छोटे किसान को लागत वसूल करने में 4-5 साल लगता है। सरकार की तरफ से सब्सिडी के रूप में कुछ नहीं मिलता है। टी बोर्ड की तरफ से जो कुछ भी मिलता है वह बड़े बगान वाले और अफसर तक ही सीमित है। इसलिए गरीब किसान सिर्फ मजदूर बनकर ही रह जाते हैं। इसलिए आज भी चाय बागानों पर चंद अमीरों का ही कब्जा है।”

टी बोर्ड को मुख्य रूप से राजकरण दफ्तरी और राजीव लोचन जैसे मारवाड़ी हैंडल करते हैं।

किशनगंज में वर्ष 1992 में पांच एकड़ से शुरू हुई चाय की खेती का रकबा बढ़कर आज 14-15 हजार एकड़ तक पहुंच गया है। अभी जिले में नौ निजी और एक सरकारी टी-प्रोसेसिंग प्लांट चल रहे हैं। डेढ़ हजार टन से ज्यादा चायपत्ती तैयार होकर बाजार में जा रही है। किशनगंज के पूरे चाय व्यवसाय पर आज भी चंद पूंजीपतियों का ही कब्जा है।

किशनगंज के समाजसेवी और स्थानीय नेता बच्छराज नखत जनचौक को बताते हैं कि “किशनगंज का चाय व्यापार चंद अमीरों तक ही सीमित है। चाय व्यापार की मदद से व्यापारियों ने मीडिया में विज्ञापन के जरिये चेहरा चमकाया, सरकार से बड़े बड़े अवॉर्ड लिए। हालांकि सच यह है कि पूंजीपतियों ने अपनी ब्लैक मनी इस कार्य मे लगाया है। गलत तरीके से जमीनें रजिस्ट्री की गईं जिसमें अधिकारियों और दलालों की भी पौ बारह हुई है। इस सब की शुरुआत 1990-1992 में हुई थी। जब श्याम बिहारी सिंह अधिकारी थे। उन्होंने बड़े-बड़े व्यापारियों को जमीन लीज पर दे दी थी। आज भी इन व्यापारियों के द्वारा पहले तो अपने परिवार के नाम पर जमीन खरीदी जाती है, फिर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाकर कई पार्टनरों को जोड़ा जाता है। इसके बाद भी यदि चाय बागान के अंदर भूदान,लालकार्ड या बिहार सरकार की जमीन आ जाती है तो फिर उस लाभार्थी से जमीन लिखवा ली जाती है और इसमे सरकारी कार्यालय के कर्मचारी बड़ी भूमिका निभाते हैं।”

24 साल का कृष्णा बाहर जाने की बजाए किशनगंज में चाय की खेती का शुरूआत किया है।

ठाकुरगंज के किसान संघ अध्यक्ष चंदन पटेल बताते हैं कि “सीमांचल में चाय उद्योग को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 1995 की औद्योगिक नीति के तहत 1999 में एक पॉलिसी बनायी थी। जिसे कुछ दिनों बाद वापस ले लिया गया। पॉलिसी के तहत सरकार पांच एकड़ बगान में चाय उगाने पर एक एकड़ जमीन मुफ्त देने वाली थी। जिसका लाभ चंद अमीर व्यापारी ही उठा सकें। जिनकी पहचान दफ्तरों में थी। साथ ही किशनगंज में भूदान की जमीन का मसला भी विवादित है। एक ही परिवार के दस सदस्यों के नाम पर जमीनें खरीदी गई हैं। इसमें ज्यादातर तो भूदान और लालकार्ड की जमीनें हैं। अब ये जमीनें कैसे खरीदी गईं यह विवाद का विषय जरूर है लेकिन बीच बीच में इसी कारण खूनी झड़प भी आम है। इसी भूदान मसले की वजह से 2019 में किशनगंज के पोठिया प्रखंड में आदिवासियों ने जाकर चाय बागानों पर कब्जा कर लिया था।”

70% मुसलमानों की आबादी में एक भी बड़ा किसान मुस्लिम नहीं

कोचाधामन विधानसभा के पूर्व विधायक अख़्तरूल ईमान जनचौक को बताते हैं कि “किशनगंज बिहार का एकमात्र ऐसा जिला है जहां 70% मुस्लिम आबादी है। इसके बावजूद 10 बड़े चाय के व्यापारियों में एक भी मुस्लिम नहीं है। 1990 में जब इस बात का खुलासा हुआ कि यहां चाय की खेती की जा सकती है। उस वक्त इसकी सूचना यहां के आम लोगों में नहीं थी। इसलिए यहां की ज़मीनें कपड़ा व्यापारी राजकरण दफ्तरी और अन्य मारवाड़ी व बंगाली समुदाय के बड़े बनिया लोगों ने औने-पौने दामों में ख़रीद ली। इसके बावजूद अभी भी कुछ किसान ऐसे हैं,जो अपनी छोटी-सी ज़मीन पर भी जी-जान के साथ चाय की खेती में लगे हुए हैं।’

कौन है राजकरण दफ्तरी?

किशनगंज में चाय व्यापार का जिक्र राजकरण दफ्तरी के बिना अधूरा है। कोई राजकरण को किशनगंज में चाय उत्पादन का भगवान मानता है। वहीं कई लोगों का मानना है कि राजकरण दफ्तरी जैसे लोग ही चाय की खेती को चंद लोगों तक सीमित रखे हैं।

राजकरण दफ्तरी, जिन्होंने किशनगंज में चाय की खेती की शुरुआत की

स्थानीय पत्रकार शैलेश बताते हैं कि “वर्ष 1992 में ‘टी बोर्ड ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट में किशनगंज के मौसम को चाय बागान के अनुकूल बताया गया था। किशनगंज के कपड़ा व्यापारी राजकरण दफ्तरी इसी रिपोर्ट को देखते हुए किशनगंज में चाय की खेती शुरू किए। शुरू करने से पहले दफ्तरी साहब ने पश्चिम बंगाल में जाकर चाय उद्योग के बारे में जानकारी जुटाई और 1994 में जिले के पोठिया में पहली बार 10 एकड़ जमीन से खेती की शुरुआत की थी। राजकरण ने बलुआ मिट्टी वाली 25 एकड़ जमीन खरीदी। जिस जमीन पर कोई फसल नहीं हो पाती थी। किशनगंज में राजबाड़ी चाय डॉ.राज करण दफ्तरी का ही ब्रांड है।”

घोटाले की वजह से नहीं हो सका टी प्रोसेसिंग व पैकेजिंग यूनिट का निर्माण

किशनगंज के किसानों का मानना है कि किशनगंज में प्रोसेसिंग प्लांट लगे तो और खेती बढ़ेगी। स्थानीय पत्रकार शैलेश बताते हैं कि “किशनगंज के पोठिया ब्लॉक में भारत सरकार की स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत 2004 में टी प्रोसेसिंग व पैकेजिंग यूनिट का निर्माण हुआ था। 2006-2007 के समय लोकल अखबार में इसी यूनिट से जुड़ी एक घोटाले की खबर छपी थी। फिर अचानक घोटाले की खबर के बाद वह यूनिट बंद कर दी गयी। 10 अगस्त, 2015 को इसे ‘संचेती टी कम्पनी’ नाम के एक प्राइवेट कम्पनी के हाथों सौंप दिया गया। प्राइवेट कंपनी थी तो पैसे कमाने में जुट गई। छोटे किसान वहीं के वहीं रह गए।”

सरकारी महकमों का सुनिए

सहायक निदेशक उद्यान डॉ रजनी सिन्हा जनचौक को बताती हैं कि “बिहार के एकमात्र उद्योग चाय ने सीमांचल इलाके से मजदूरों के पलायन पर रोक लगाया है। विशेष फसल उद्यानिकी विकास योजना के तहत इस बार चाय की खेती को शामिल किया गया है। सरकार के द्वारा चाय के नए पौधे लगाने वाले किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान मिलेगा। किशनगंज में 75 हेक्टेयर का लक्ष्य है। इसके लिए 700 आवेदन आए हैं।”

(किशनगंज से राहुल की रिपोर्ट।)

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