Sunday, May 29, 2022

उत्तराखंड: महिलाशक्ति फिर बनी निर्णायक

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उत्तराखंड में महिला शक्ति समय-समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने के साथ ही विभिन्न आंदोलनों में निर्णायक भूमिका निभाती रही है। विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन हो या नशा विरोधी आंदोलन या फिर उत्तराखंड राज्य आंदोलन, सभी जगह महिलाएं निर्णायक भूमिका में रही हैं। हाल में राज्य में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी की एकतरफा जीत में महिलाओं की बड़ी भूमिका बताई जा रही है। दरअसल इसका आधार राज्य की ज्यादातर सीटों पर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का मत प्रतिशत और मतसंख्या ज्यादा होना है।

इस विधानसभा चुनाव में राज्य में मतदाताओं की संख्या पर नजर डालें तो पर्वतीय जिलों की 34 में से 28 सीटों पर पुरुष मतदाताओं की संख्या महिला मतदाताओं के मुकाबले ज्यादा है। केवल 6 सीटों रुद्रप्रयाग, केदारनाथ, पिथौरागढ़, डीडीहाट, धारचुला और द्वाराहाट में पुरुषों से ज्यादा महिला मतदाता हैं। राज्य में कुल 16,23,951 पुरुष मतदाताओं में से केवल 8,59,642 ने यानी सिर्फ 52.94 प्रतिशत पुरुषों ने मतदान किया। 34 में से 33 पर्वतीय सीटों पर पुरुषों के मुकाबले ज्यादा महिलाओं ने वोट डाले। पर्वतीय क्षेत्रों में एक मात्र उत्तरकाशी जिले की पुरोला सीट पर महिला मतदाताओं के मुकाबले 1260 ज्यादा पुरुष मतदाता वोट देने पहुंचे। पर्वतीय जिलों की प्रत्येक सीट पर औसतन 29,169 महिलाओं ने और 25,284 पुरुषों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। यानी हर सीट पर पुरुषों के मुकाबले औसतन 3,885 महिलाओं ने ज्यादा वोट डाले। मैदानी जिलों की 5 सीटों पर भी पुरुषों से ज्यादा महिलाएं वोट देने पहुंची।

कुल मिलाकर राज्य की 70 में से 38 विधानसभा सीटों पर पुरुषों के मुकाबले ज्यादा महिलाओं ने वोट डाले। पुरुषों के मुकाबले इन सीटों पर महिलाओं का मतदान प्रतिशत भी ज्यादा रहा। 67.2 प्रतिशत महिलाओं और 62.6 प्रतिशत पुरुषों ने मतदान किया। यानि कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 4.6 प्रतिशत ज्यादा रहा।

महिलाएं बैठक करती हुईं

पर्वतीय क्षेत्रों की जिन 34 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा मतदान किया, उनमें सिर्फ 6 सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों ने बमुश्किल जीत हासिल की, जबकि एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार की जीत हुई। ज्यादा महिलाओं वाली जिन सीटों पर कांग्रेस की जीत हुई, उनमें चमोली जिले की बदरीनाथ, टिहरी की प्रतापनगर, पिथौरागढ़ जिले की पिथौरागढ़, अल्मोड़ा जिले की अल्मोड़ा, चंपावत की लोहाघाट और बागेश्वर की कपकोट सीट शामिल हैं। इनमें से भी ज्यादातर सीटों पर भाजपा कड़े मुकाबले में रही। बदरीनाथ सीट पर तो अंत तक मुकाबला रहा और एक समय ऐसा भी आया, जब दोनों उम्मीदवारों के वोटों का अंतर सिर्फ एक था।

खास बात यह है कि भाजपा ने उत्तराखंड में महिला सशक्तीकरण के लिए पिछले पांच वर्षों में ऐसा कोई खास काम नहीं किया, जिसे प्रचारित करके महिलाओं को प्रभावित किया गया हो। नये कार्यकाल के लिए भी पार्टी के घोषणा पत्र में महिलाओं को लेकर कोई ऐसा वायदा नहीं किया गया था, जिससे महिलाएं प्रभावित हुई हों और उन्होंने एकमुश्त भाजपा को वोट डाल दिया हो। उत्तराखंड में महिलाओं की पीठ का बोझ कम करने की बातें तो खूब हुईं, लेकिन ऐसी कोई योजना धरातल पर नहीं उतरी, जो सचमुच महिलाओं के पीठ का बोझ कम करने में कारगर रही हो। हाल के महीनों में एक घसियारी योजना (घास काटने वाली यानी पशुपालक महिलाओं के लिए) की बात उछाली गई, लेकिन यह योजना लागू ही नहीं हुई तो योजना का लाभ किसी को मिलने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

उत्तराखंड में महिलाओं को सबसे ज्यादा परेशानी स्वास्थ्य के मामले में उठानी पड़ती है। ज्यादातर गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। छोटी-मोटी बीमारियों के इलाज के लिए पुरुष सीधे हल्द्वानी या देहरादून की दौड़ लगाते हैं, लेकिन महिलाओं पर घर-बाहर की सारी जिम्मेदारियां होने के कारण उनका इलाज के लिए हल्द्वानी अथवा देहरादून दौड़ लगाना आसान नहीं होता। इंटीट्यूशनल डिलीवरी का नारा देश के अन्य राज्यों की तरह ही पहाड़ों में भी खूब उछाला जाता है, लेकिन वास्तव में आज भी दूर-दराज के पर्वतीय क्षेत्रों में प्रसव के लिए परंपरागत दाइयों का ही सहारा लेना पड़ता है, हाल के वर्षों में इन दाइयों को कोई ट्रेनिंग देने तक की व्यवस्था नहीं की गई। यदि किसी महिला को प्रसव संबंधी कोई दिक्कत होती है तो उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए कई बार सैकड़ों किमी चलना पड़ता है।

कई गांव सड़कों से दूर होने के कारण सड़क तक महिला को डोली में लोग सड़क तक पहुंचाते हैं। ऐसे मौकों पर गांव से कुछ महिलाओं को भी साथ ले जाना पड़ता है, ताकि रास्ते में प्रसव जैसी बात हुई तो वे संभाल सकें। हाल के वर्षों में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं, जिनमें महिलाओं का रास्ते में प्रसव हुआ। ऐसे में महिलाएं चादर आदि की आड़ करवाकर प्रसव करवाती हैं। हर साल प्रसव के लिए अस्पताल ले जाते कई महिलाओं की मौत हो जाती है। भाजपा के पिछले 5 वर्षों के कार्यकाल में स्वास्थ्य और खासतौर पर प्रसव संबंधी सुविधाएं देने के लिए कुछ खास व्यवस्थाएं नहीं की गई, बल्कि इस बारे में कोई बात तक नहीं की गई। कांग्रेस के दौर में शुरू की गई टेली मेडिसिन सेवा भी भाजपा के कार्यकाल में लगभग बंद हो गई। उत्तराखंड की महिलाओं पर इस सबका कोई असर नहीं हुआ, ऐसा माना जा सकता है।

कांग्रेस का घोषणापत्र

इस सबके उलट यदि कांग्रेस का घोषणा पत्र टटोलें तो इसका एक बड़ा हिस्सा महिलाओं के नाम है। घोषणा पत्र के इस हिस्से को ‘आधी आबादी, राज्य के विकास में पूर्ण भागीदारी’ नाम दिया गया है। पार्टी ने स्वाभिमान, स्वावलंबन, शिक्षा, सम्मान, समानता, सेहत और सुरक्षा को महिलाओं के लिए आधार बिन्दु मानकर इसी अनुरूप योजनाएं बनाने की बात कही है। स्कूल यूनीफार्म और दुग्ध उत्पादन जैसे 28 व्यवसायों में महिलाओं को प्रोत्साहन और सहयोग देने, 50 प्रतिशत से ज्यादा महिला भागीदारी वाले व्यवसायों को टैक्स और बिजली बिल में छूट देने, महिला उद्यमिता पार्क बनाने, कामकाजी महिलाओं को शिशु गृह सेवाएं उपलब्ध करवाने और छात्रावास बनाने, कुछ चिन्हित सरकारी विभागों में 40 प्रतिशत पदों पर महिलाओं को नियुक्ति देने, खून की कमी वाली महिलाओं के इलाज के लिए विशेष अभियान चलाने, ब्लॉक स्तर पर जच्चा-बच्चा वार्ड और स्त्री रोग विशेषज्ञ की सेवाएं उपलब्ध करवाने, गर्भवती और धात्री महिलाओं को अतिरिक्त पौष्टिक आहार उपलब्ध करवाने, एकल और विकलांग महिलाओं का प्रशिक्षण और रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए अलग से एक विभाग बनाने, उच्च हिमालयी क्षेत्र में महिलाओं के लिए विशेष खेल अकादमी स्थापित करने जैसे कुल 34 वायदे कांग्रेस ने किये थे।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि कांग्रेस ने इस घोषणा पत्र को बनाने में काफी रिसर्च की थी और इसे लागू करना बहुत कठिन भी नहीं होता। इसके अलावा कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में राज्य में पुरानी पेंशन स्कीम लागू करने और गैस सिलेंडर 500 रुपये का देने की भी बात कही थी। संभवतः यह बात भी राज्य की महिलाओं की समझ में नहीं आ पाई, जबकि पेंशन न मिलने और महंगी गैस के कारण महिलाओं को ही सबसे ज्यादा परेशानी होने वाली है। 

अब सवाल यह उठाया जा रहा है कि इतना सब होने के बावजूद महिलाओं ने भाजपा के पक्ष में कथित रूप से एकतरफा वोट क्यों दिया? दून यूनिवर्सिटी के मास काम विभाग के प्रो. हर्ष डोभाल कहते हैं कि दरअसल राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में इन चुनाव में कोई मुद्दा था ही नहीं। भाजपा को किसी मुद्दे ही जरूरत थी ही नहीं। वे यहां के जनमानस को एक अनदेखे शत्रु का डर दिखाकर पहले ही अपने पक्ष में कर चुके थे। जो बाकी कसर थी, वह हर महीने 5 किलो राशन ने पूरी कर दी थी।

वे कहते हैं कि जहां तक कांग्रेस का सवाल है, कांग्रेस ने घोषणा पत्र तैयार करने में मेहनत तो खूब की, लेकिन इस घोषणा पत्र को आम लोगों तक पहुंचाने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया। जोशीमठ नगर पालिका के पूर्व सभासद प्रकाश नेगी मानते हैं कि भाजपा के हिंदुत्व और 5 किलो राशन ने जबरदस्त काम किया, खासकर महिलाओं के बीच। उनका कहना है कि पुरुष मतदाताओं का एक हिस्सा किसी न किसी लालच में दूसरे उम्मीदवारों की तरफ भी खड़ा था, लेकिन घर के पुरुषों के विपरीत महिलाएं पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में थीं।

इस बीच सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटीज (सीएसडीएस) लोकनीति ने उत्तराखंड के चुनावों पर आधारित एक सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड में भाजपा को राज्य सरकार के कारण नहीं बल्कि मोदी फैक्टर के कारण वोट पड़ा है। राज्य सरकार से केवल 8 प्रतिशत लोग संतुष्ट थे, जबकि मोदी सरकार से 54 प्रतिशत लोग संतुष्ट थे। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार जब लोगों से पूछा गया कि मतदान करते वक्त वे राजनीतिक दल को ध्यान में रखेंगे या उम्मीदवार को, इस पर 59 प्रतिशत लोगों ने पार्टी के लिए वोट करने की बात कही, केवल 35 प्रतिशत ऐसे लोग थे, जिन्होंने उम्मीदवार की योग्यता देखकर वोट देने की बात कही। यानि कि लोगों ने उत्तराखंड में सिर्फ भाजपा की विचारधारा को वोट दिया। यही वजह रही कि कांग्रेस से भाजपा में गये किशोर उपाध्याय, सरिता आर्य, दुर्गेश लाल, प्रीतम पंवार, राम सिंह कैड़ा तो जीत गये, लेकिन भाजपा से कांग्रेस में गये मालचंद, संजीव आर्य, दीपक बिजल्वाण जैसे उम्मीदवार हार गये।

देहरादून स्थित एसडीसी फाउंडेशन का चुनाव नतीजों पर आधारित एक विश्लेषण बताता है कि पर्वतीय क्षेत्रों और देहरादून जैसे पर्वतीय जिलों के मूल निवासियों की बहुलता वाले जिले में भाजपा को एक तरफा वोट पड़े, जबकि हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे जिले में भाजपा उतने वोट नहीं बटोर पाई। फाउंडेशन ने दोनों पार्टियों को मिले मतों के आधार पर राज्य को ए, बी और सी, तीन रीजन में बांटा है। रीजन ए में देहरादून, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग जिलों की 30 सीटों को शामिल किया गया। ये सभी जिले गढ़वाल मंडल के हैं, जहां लगभग सभी सीटों पर महिलाओं का मतदान प्रतिशत ज्यादा रहा है। रीजन ए भाजपा के लिए अत्यधिक उपजाऊ साबित हुआ।

यहां भाजपा ने 89 प्रतिशत सफलता के साथ 26 सीट झटक ली। जबकि कांग्रेस का सफलता प्रतिशत 10 रहा। उसके हिस्से में 3 सीट आई। एक सीट निर्दलीय को मिली। एसडीसी फाउंडेशन ने रीजन बी में कुमाऊं मंडल के नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर और चंपावत जिलों को शामिल किया है। इन जिलों में कुल 20 सीट हैं। यहां भाजपा कुछ नीचे आती और कांग्रेस कुछ ऊपर जाती प्रतीत हुई। भाजपा को यहां 70 प्रतिशत सफलता मिली।

उसके हिस्से में 14 सीट आई। कांग्रेस को 30 प्रतिशत सफलता के साथ 8 सीट मिली। रीजन सी में दो पूर्ण रूप से मैदानी जिलों हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को शामिल किया गया। इन दोनों जिलों में महिलाओं की संख्या और महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले कम रहा। इन जिलों में कुल 20 सीटें हैं। यहां भाजपा पर कांग्रेस भारी रही। भाजपा का सफलता प्रतिशत 35 और कांग्रेस का 50 रहा। 7 सीट भाजपा को और 10 कांग्रेस को मिली। दो सीट बसपा के खाते में गई तो एक पर निर्दलीय ने जीत दर्ज की।

(त्रिलोचन भट्ट वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

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