दुनिया को न तो मध्यकालीन बर्बर तालिबान चाहिए; न बर्बर अमेरिकी या कोई अन्य साम्राज्यवाद

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न्याय, समता, बंधुता, लोकतंत्र और समृद्धि पर सबके समान हक का पक्षधर कोई भी व्यक्ति या संगठन किसी भी ऐसे व्यक्ति, संगठन, समुदाय या देश का समर्थन नहीं कर सकता या उसके पक्ष में खड़ा नहीं हो सकता, जो इन विचारों एवं मूल्यों में विश्वास न रखते हों और व्यवहार में लागू करने की पुरजोर कोशिश न करते हों।

न्याय, समता, बंधुता, लोकतंत्र और समृद्धि पर सबके समान हक के मूल्य मानव जाति ने लंबे संघर्षों के बाद अर्जित किया है और यह मानव जाति के सार्वभौमिक मूल्य हैं और ये मूल्य आज एवं भविष्य के मानव समाज के मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।

इन मूल्यों में विश्वास करने का, न तो तालिबान का इतिहास रहा है, न ही मूल्यों को लागू करने का कोई इरादा तालिबान का दिखाई दे रहा है, भले ही अपने मध्यकालीन बर्बर मूल्यों में थोड़ी उदारता दिखाने की कोशिश वे कर रहे हों। बहुत ज्यादा उदार हो जाएंगें, तो सऊदी अरब जैसा बन जाएंगे। सऊदी अरब में महिलाओं या अन्य नगारिकों को कितना नागरिक अधिकार है, कितनी स्वतंत्रता है, यह जगजाहिर है। तालिबान बर्बर कबीलाई विचारों और मध्यकालीन बर्बर मूल्यों के वाहक हैं, न तो उनका समर्थन किया जा सकता है और न ही उनके पक्ष में खड़ा हुआ जा सकता है और न होना चाहिए। यदि कोई ऐसा करता है, तो उसको स्वयं के विचारों-मूल्यों पर गंभीर चिंतन-मनन करना चाहिए। तालिबान या तालिबान जैसी किसी भी शक्ति के पक्ष में खड़ा होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, भले ही दुनिया के देश अपने-अपने शासक-शोषक वर्गों के स्वार्थों में तालिबान को मान्यता ही क्यों ने दे दें, और उसमें भारत भी क्यों न शामिल हो।

इसी तरह देशों की संप्रभुता और वहां के नागरिकों के नगारिक अधिकारों में विश्वास करने वाले किसी भी व्यक्ति को बर्बर अमेरिकी साम्राज्यवादी सेना या किसी अन्य देश की सेना की अफगानिस्तान या किसी देश में उपस्थिति और वर्चस्व का समर्थन नहीं करना चाहिए। हां उसके उलट अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से पूर्ण वापसी का स्वागत करना चाहिए। यह वही अमेरिकी सेना है, जिसने 2001 के 2021 के बीच लाखों (एक अनुमान के अनुसार 5 लाख से अधिक) अफगानियों की बमबारी में या गोली मारकर हत्या की, जिसमें लाखों मासूम बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल थे, जिनका तालिबान से कोई लेना-देना नहीं था। अफगानियों के साथ अमेरिकियों के अत्याचार रोंगटे खड़े कर देने वाले थे। पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका के सैनिक जमीन पर युद्ध बहुत कम करते हैं, ज्यादातर हवाई बमबारी करते हैं, जिसमें बहुलांश निर्दोष लोग मारे जाते हैं।

इसके साथ ही किसी भी सूरत में अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रति थोड़ा भी उदार नहीं होना चाहिए, भले आदर्श लोकतंत्र का तथाकथित एक उदाहरण अमेरिका अपने देश के भीतर सापेक्षिक तौर पर जितना भी न्याय, समता, लोकतंत्र को लागू करता हो या करता रहा हो, हालांकि अपने ही देश के कालों के प्रति अमेरिकियों का कानूनन (संवैधानिक तौर पर- 1961 के बाद पूरी तरह से अमेरिकी संविधान में काले अमेरिकियों को समान हक दिया गया) एवं व्यवहारिक तौर पर बर्ताव शर्मनाक रहा है और आज भी है, महिलाओं को अमेरिकी समाज लंबे समय तक दोयम दर्जे का मानता रहा है, इतना दोयम की 1920 में जाकर उन्हें वोट का अधिकार दिया, रूस द्वारा 1917 में अपने देश की महिलाओं को पुरूषों के समान वोट का अधिकार देने के बाद। जहां तक समृद्धि पर सबके समान हक का प्रश्न है, इस मामले में अमेरिका का रिकार्ड इतना बदतर है कि कोविड महामारी के काल में भी चरम असमानता दिखाई दी। श्वेत अमेरिकियों की तुलना में 3 गुना अधिक अश्वेत अमेरिकी मारे गए। अमेरिका के कई प्रांतों में कोविड से मरने वालों में 70 प्रतिशत अश्वेत थे, जबकि उनकी आबादी वहां सिर्फ 20 से 30 प्रतिशत थी।

अपने देश के भीतर अमेरिका सापेक्षिक तौर पर थोड़ा बेहतर लोकतांत्रिक भी हो, तो भी, दुनिया के संदर्भ में उसका इतिहास बर्बर हमलों, लोकतांत्रिक सरकारों का तख्तापलट, समाजवादी सरकारों का तख्तापटल या उसकी कोशिश, लोकतांत्रिक और समाजवादी परिवर्तनकारी शक्तियों के बरक्स शाहों (मध्यपूर्व में सऊदी अरब सहित अन्य शाहों का समर्थन), तानाशाहों (लैटिन अमेरिका में तानाशाहों का समर्थन), राजाओं और अलोकतांत्रिक सरकारों और मध्याकालीन बर्बर मूल्यों में विश्वास करने वाली शक्तियों के समर्थक का रहा है और है। अफगानिस्तान में सोवियत संघ को हटाने के नाम पर मुजाहिद्दीन का खुला समर्थन और उन्हें इस्लाम की रक्षा के नाम पर मध्यकालीन बर्बरों में बदल देना। और इसके साथ दुनिया के स्रोत-संसाधनों पर अमेरिकी कार्पोरेट के कब्जे का रास्ता साफ करना, चाहे इसके लिए कितने बड़े पैमाने पर कत्लेआम ही क्यों न करना पड़े। यह अमेरिका की आम नीति रही है।

उदाहरण के लिए लैटिन अमेरिका (चिली, क्यूबा, पनामा, बोलिबिया, बेनेजुएला आदि), एशिया (1949 से पहले चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मध्यपूर्व के अरब देश, मिस्र आदि)। इसमें अफ्रीकी देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप को भी शामिल कर लें। ईराक,  लीबिया और सीरिया की, अमेरिकी और उसके पश्चिमी मित्रों द्वारा तबाही- बर्बादी और सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी की बर्बर और निर्मम हत्या हाल के उदाहरण हैं।

अमेरिका का यही रिश्ता अफगानिस्तान के साथ भी रहा है और उसने वहां भी कभी न्याय, समता, बंधुता, लोकतंत्र और समृद्धि के समान बंटवारे के लिए आक्रमण या अप्रत्यक्ष प्रवेश नहीं किया। हमेशा उसका उद्देश्य अमेरिकी साम्राज्यवादी स्वार्थों को पूरा करना रहा है। आज जब यह स्वार्थ पूरे होते नहीं दिखाई दिए, तो भाग खड़ा हुआ। इस तथ्य की पुष्टि अमेरिकी राष्ट्रपित जो बाइडेन के इस कथन से भी होती है कि अमेरिका अफगानिस्तान में नेशलन बिल्डिंग करने नहीं गया था, वह अपने देश पर हमले का बदला लेने गया था और यह सुनिश्चित करने गया था कि पुन: उस पर हमला न हो।

प्रश्न उठता है कि फिर क्या किया जाए, कुछ लोग विश्व बिरादरी द्वारा अफगानिस्तान में हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं, प्रथम दृष्ट्या यह मांग अच्छी भी लग रही है, लेकिन विश्व बिरादरी के नाम पर हस्तक्षेप कौन करेगा। अब तक तो विश्व बिरादरी के नाम पर अमेरिकी के नेतृत्व में पश्चिमी देश (फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी आदि) हस्तक्षेप करते रहे हैं या एक समय तथाकथित समाजवाद स्थापित करने के नाम पर सोवियत सामाजिक साम्राज्यवादी करते रहे हैं, जैसे सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में किया था। ये हस्तक्षेप कभी सुरक्षा परिषद के अनुमति से, अक्सर सुरक्षा परिषद को किनारे लगाकर पश्चिमी देश या कुछ समय तक सोवियत संघ करता रहा है। सुरक्षा परिषद स्वयं ही एक अलोकतांत्रिक संस्था है।  इन हस्तक्षेपों को कभी भी जिन देशों में हस्तक्षेप किया गया, उन देशों में न्याय, समता, बंधुता, लोकतंत्र और समृद्धि का समान बंटवारा करने के लिए नहीं किया गया, हमेशा हस्तक्षेप करने वाले देशों या देशों के समूह ने अपने देश के शासक-शोषक वर्गों के हितों की पूर्ति के लिए काम किया।

दूसरी बात यह कि न तो लोकतंत्र का निर्यात किया जा सकता है और क्रांति या समाजवाद का। मानव इतिहास इस बात का साक्षी है, लोकतंत्र या क्रांति या समाजवाद के निर्यात की कोई भी कोशिश आज तक सफल नहीं हुई है। लोकतंत्र या क्रांति का जन्म जनता के गर्भ से होता है, तभी टिकता है, जड़ जमाता है और फैलता है।

फिर प्रश्न यह उठता है कि यदि नागरिक अधिकारों, मानवाधिकारों या लोकतंत्र के लिए कोई सर्वमान्य और सार्वभौमिक व्यवस्था द्वारा अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया जाए तो, यह हस्तक्षेप क्यों अफगानिस्तान तक सीमित रहना चाहिए। क्यों इस वैश्विक व्यवस्था का इस्तेमाल फिलिस्तीन को इजराइल के रूह कंपा देने वाले अन्यायों से मुक्त कराने के लिए न किया जाए और वहां हस्तक्षेप क्यों न किया जाए, क्यों इस विश्व व्यवस्था के तहत सऊदी अरब में न हस्तक्षेप किया जाए और वहा महिलाओं और अन्य नागिरकों को उनके नागरिक अधिकार उपलब्ध कराए जाएं, क्यों न म्यंमार (वर्मा) में हस्तक्षेप करके वहां के अत्याचारी सैनिक शासन को खत्म किया जाए और चुनी हुई सरकार को बहाल किया जाए।

क्या हम सब भारत में इस विश्व विरादरी को नागरिक और मानवाधिकारों के भयानक उल्लंघन को रोकने के लिए आमंत्रित करेंगे। भारत में 2002 के गुजरात नरसंहार के कर्ता-धर्ता इस समय भारत के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री हैं, बाबरी मस्जिद ध्वंस के कर्ता-धर्ता भी भारत के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बने थे ( अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आणवानी) क्या लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और मानवाधिकारों के इन उल्लंघन कर्ताओं को दंडित करने के लिए विश्व बिरादरी को आमंत्रित करना चाहिए था, ऐसा करना क्यों अनुचित होता या होगा। कश्मीरियों के मानवाधिकारों के संदर्भ में विश्व बिरादरी की क्या भूमिका होनी चाहिए।

यह सिर्फ इसलिए अनुचित होगा, क्योंकि चुनाव में उन्हें पड़े वोटों का बहुमत मिला है, तो क्या यदि अफगानिस्तान की जनता का बहुमत तालिबान का समर्थन करे तो, उनके कुकृत्य जायज हो जाएंगे और तब विश्व बिरादरी को वहां हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। एक आकलन के अनुसार अफगानिस्तान के बहुलांश लोगों का तालिबान को समर्थन प्राप्त है, उनकी इतनी आसान विजय भी इस ओर इशारा करती है।

मैं न तो सऊदी अरब, मिस्र और म्यांमार में सैनिक प्रवेश द्वारा किसी हस्तक्षेप का हिमायती हूं, न भारत में इंच मात्र भी किसी देश या विश्व बिरादरी के सीधे प्रवेश का हिमायती हूं और न ही अफगनिस्तान में। फिलहाल दुनिया में न्याय, समता, लोकतंत्र, बंधुता और समृद्धि पर समान हक के पक्ष में खड़ी होने वाली कोई संगठित या संस्थाबद्ध विश्व बिरादरी नहीं है, जो केवल न्याय के पक्ष में खड़ी हो।

पूरी दुनिया अफगानिस्तान के लिए सिर्फ एक ही चीज कर सकती है, वह उसे अपने हितों को साधने का साधन न बनाए। न अमेरिका, न चीन, न रूस न ही पाकिस्तान और न किसी तरह से भारत। कभी भी अफगानिस्तानियों को खुद अपनी नियति और भविष्य तय करने का मौका नहीं दिया गया। पहले ब्रिटेन ने हस्तक्षेप किया, फिर सोवियत संघ ने और उसके बाद 40 वर्षों से निरंतर अमेरिका कर रहा है, पहले अमेरिका ने सोवियत संघ को हटाने के लिए मुजाहिद्दीन खड़े किए, जिन्हें वह आतंकवादी कहता, फिर आतंकवादियों को खत्म करने के लिए 20 वर्षों ( 2001 से 2021) तक अफगानिस्तान में कब्जा जमाए रखा और अपने कठपुतलियों के माध्यम से शासन करता रहा।

फिर हम कर क्या सकते हैं, हम एक ही काम कर सकते हैं, अपने-अपने देशों में न्याय, समता, बंधुता, लोकतंत्र और समृद्ध के समान हक के संघर्ष को अंजाम तक पहुचां दे और विश्व नागरिक के तौर दुनिया में न्याय,समता, बंधुता, लोकतंत्र और समृद्धि पर समान हक के लिए हर संघर्ष का समर्थन करे,लेकिन इस समर्थन के नाम पर किसी इस या उस देश या देशों  के समूह के प्रवेश का किसी भी सूरत में समर्थन न करे। चाहे वे लोकतंत्र स्थापित करने के नाम पर प्रवेश कर रहे हों या क्रांति या समाजवाद के नाम।

हमें न तो बर्बर तालिबानियों के पक्ष खड़ा होना चाहिए और न ही बर्बर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के पक्ष में। अफगानियों को खुद ही अपना भविष्य तय करने का मौका देना चाहिए, कोई सीधा सैनिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

फिर याद कर लें, न लोकतंत्र निर्यात होता है, न क्रांति और न ही समाजवाद का। खुद हमारे देश का लोकतंत्र गंभीर खतरे में है, न्याय, समता, बंधुता और समृद्धि पर समान हक प्रश्न काफी पीछे छूट चुका है। यदि हम अपने देश के लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचा लेते हैं और संविधान मूल्यों की रक्षा कर लेते हैं, तो दुनिया के लिए बहुत बड़ी मदद होगी, जिसमें अफगानिस्तान भी शामिल है। जिस तेजी से भारत मध्यकालीन मूल्यों की ओर बढ़ रहा है, वह अफगानिस्तान को और अधिक मध्यकाल की ओर ले जाएगा, लेकिन यदि इसके उलट हम अपने देश में वर्तमान परिघटना को उलट देते हैं, तो अफगानी जनता की बड़ी मदद होगी और उन्हें लोकतंत्र-जनतंत्र स्थापित करने की प्रेरणा मिलेगी।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

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