Mon. May 25th, 2020

योगी जी! आप जीत गए, आपका अहंकार जीत गया

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प्रतीकात्मक फोटो।

योगी जी आप जीत गए। आप का अहंकार जीत गया। आपकी वह प्रतिज्ञा भी जीत गयी जिसका आपने संकल्प लिया था। आपने तय किया था कि कांग्रेस द्वारा मुहैया करायी गयी बसों को यूपी की सड़कों पर नहीं दौड़ने देना है तो नहीं दौड़ने देना है। आपने उसको पूरा करके दिखा दिया। आपने यह भी बता दिया कि योगी हठ क्या होता है। भले ही 1000 बसों में से आपके नौकरशाहों ने 879 को फ़िट करार दिया था और यह बता दिया था कि उनको सड़कों पर चलाया जा सकता है। बावजूद इसके आप अपने संकल्प से एक तिनका पीछे नहीं हटे। आप अपनी अंगदी प्रतिज्ञा पर अड़े रहे। आपने देश को यह भी बता दिया कि कैसे सत्य को झूठ में बदला जा सकता है जिसमें 879 बसों का चुस्त-दुरस्त होना बेमानी साबित हो जाएगा और 50 टेपों और एंबुलेंसों की संख्या सबसे बड़ा सच।

और यह 100-125 की संख्या 879 पर भारी पड़ जाएगी। क्योंकि आप नरेटिव बदलना जानते हैं। क्योंकि आपके पास एक ऐसा आईटी सेल है जो झूठ को सच और सच को झूठ में बदलना जानता है। क्योंकि मीडिया को आपने अपनी जेब में कर रखा है। अंजना ओम कश्यप सरीखे लोग अभी भी आप की जगह कांग्रेस से ही सवाल करते दिखेंगे कि आख़िर उसने कैसे आटो और एंबुलेंस के नंबर दे दिए। वो कभी भी आपसे यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाएंगे कि आख़िर सही सलामत और चुस्त-दुरुस्त 879 बसों से भूखी-प्यासी, तड़पती-बिलखती और विपत्ति की मारी जनता को ढुलवाने का काम क्यों नहीं हुआ। बाक़ी बसें तो उस प्रक्रिया में आ जातीं। लेकिन आप तो ठहरे योगी। बाल हठ से भी बड़े हठी। आपने कहा कि नहीं चलने देना है तो नहीं चलने देना है। यहाँ तक कि अगर 1000 बसें भी आ जातीं फिर भी शायद ही आप अनुमति देते। 

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हारी तो योगी जी वह मानवता है जो सड़कों पर कराहती दिख रही है। कहीं हज़ारों हज़ार किमी चलने के बाद पड़ने वाले पैरों में फफोले हैं। तो किसी सड़क पर बच्चा जनी स्त्री। कहीं बुजुर्ग माँ को सीने से चिपकाए गोद में लिए जा रहा बेटा है। तो कहीं बेटे के कंधे पर सवार बाप। कोई डिहाइड्रेशन से मरता बच्चा है। तो कहीं पटरियों पर जान लेती ट्रेनें और सड़क पर मौत बनकर घूम रही ट्रकें हैं। हादसे जैसे जनता की इस महायात्रा की नियति बन गए हैं। जनता और उनका चोली-दामन का साथ हो गया है। कोई ऐसा दिन नहीं गया जब 5-10 लोग नहीं मरे। कुछ ख़बरें सामने आ रही हैं तो बहुत सारी दरकिनार भी कर दी जा रही हैं।

जीती तो निर्मला ताई भी हैं। पाँच दिन का उनका घोषणाओं का अश्लील उद्घोष इसी बीच जारी रहा। ऐसा निर्लज्ज प्रदर्शन जिसमें सबसे पीड़ित जनता के लिए कुछ नहीं था लेकिन उसके नाम पर अमीर और कारपोरेट घरानों के लिए कुबेर के ख़ज़ाने का दरवाज़ा खोल दिया गया। ऐसी हिम्मत कोई जनता से कटी हुई फ़ासिस्ट जमात की पैदाइश ही कर सकती है। पैदल चलने वाले मज़दूरों से राहुल गांधी के मिलने को जिसने मज़दूरों के समय की बर्बादी करार दिया था उसे भी राजस्थान-यूपी सीमा पर आगरा के पास खड़ी ये बसें नहीं दिखीं। आख़िर उनके चलाने से मज़दूरों का कितना समय बचाया जा सकता था।

इस दौरान मोदी जी बिल्कुल शांत बैठे रहे। वैसे तो वह गंगा के बेटे हैं। और गंगा उन्हें बीच-बीच में बुलाती भी रहती हैं। और अब तो सांसद बनकर बक़ायदा सूबे के राजनीतिक प्रतिनिधि बन गए हैं। बावजूद इसके उन्हें यूपी की सड़कों पर जाते इन हजारों-हजार लोगों के पैरों के न तो फफोले दिखे। न ही डिहाईड्रेशन और हीट स्ट्रोक से जाती जानें। योगी जी अगर हठ कर बैठे थे तो क्या एक बार आपको उन्हें मनाना नहीं चाहिए था? लेकिन भला वो क्यों ऐसा करते। वह तो ख़ुद ‘महायोगी’ हैं। पहले उन्होंने विमानों से विदेश में बसे एक-एक नागरिक को भारत लाने का काम किया। और उससे शहरों में कोरोना फैलवाया। और अमीरों की ये बीमारी जब ग़रीबों में फैल गयी तब उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया।

दो महीने के लॉकडाउन में न तो उन्हें भोजन नसीब हुआ और न ही मालिक ठेकेदारों से उनकी तनख्वाहें। वेतन न देने और कटौती करने की शुरुआत भी सबसे पहले सरकार और मोदी जी के चहेते उद्योगपति मुकेश अंबानी ने की। सरकार ने डीए काटा और अंबानी ने पचास प्रतिशत अपने कर्मचारियों का वेतन। और फिर रही सही कसर सरकार ने अपने उस नोटिफिकेशन को रद्द करके पूरी कर दिया जिसमें उसने कंपनियों और संस्थानों को लॉकडाउन के दौरान काम न करने वालों को भी वेतन देने का निर्देश दिया था।

और फिर अब जब कोरोना पूरे देश में फैल गया। गांव-गांव में चला गया। शायद ही  देश का कोई जिला बचा हो जहां कोरोना ने अपनी उपस्थिति दर्ज न करा दी हो। और अब तो इलाक़े दर इलाक़े रेड ज़ोन में तब्दील होते जा रहे हैं। आँकड़ा एक लाख के पार चला गया है। और रोज़ाना रिकार्ड मामले सामने आ रहे हैं और लगातार पिछले दिन से अगले दिन का आँकड़ा बड़ा होता जा रहा है। यह अजीब विडंबना है जब आँकड़ा सबसे कम था तब लॉकडाउन किया गया और कर्फ़्यू लगाया गया और अब जबकि वह अपने पीक पर है तब लॉकडाउन को खोला जा रहा है। ऐसा फ़ैसला कोई हार्डवर्क वाला ही ले सकता है। लेकिन पहली बार देशवासियों को हार्डवर्क और हार्वर्ड के बीच अंतर को बेहद नज़दीक से देखने, समझने और जानने का मौक़ा मिला।

यह एक ऐसा त्रासदपूर्ण समय था जिसमें किसी बौने शख्स के कृत्रिम नेतृत्व से काम नहीं चलाया जा सकता था। यहाँ एक ऐसे विजनरी व्यक्ति की ज़रूरत थी जो चीजों को बहुत दूर तक देख सके और उसके अनुसार समय-समय पर फ़ैसले ले सके। नेतृत्व की उस कमजोरी ने आज पूरे देश को एक ऐसे मौत के कुएँ में धकेल दिया है जहां से निकलने का कोई रास्ता ही नहीं दिख रहा है। अब जब कि केंद्रीय नेतृत्व हर मोर्चे पर फेल हो गया है। और अपनाए गए सभी उपाय बीमारी को कम करने की जगह उसे बढ़ाने में सहायक साबित हुए। तब उसने पूरे मामले को अब राज्यों के भरोसे छोड़ दिया है। क्योंकि उसके पास अब इसको हल करने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है। हार्डवर्क और हार्वर्ड के बीच क्या फ़र्क़ होता है और उसमें हार्वर्ड क्यों बेहद अहमियत रखता है उसका सबसे बेहतरीन उदाहरण ताइवान है।

चीन के पड़ोसी ताइवान को चीन के बाद सबसे ज़्यादा ख़तरा था। डब्ल्‌यूएचओ ने उसे आगाह भी किया था। तक़रीबन 5 करोड़ की आबादी वाले ताइवान के 8 लाख से ज़्यादा नागरिक चीन में रहते हैं। लिहाज़ा उसका पूरा आर्गेनिक रिश्ता भी चीन से बना हुआ था। लेकिन ताइवान का राष्ट्रपति लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स का प्रोडक्ट है। और उप राष्ट्रपति ख़ुद एक डाक्टर जो कभी डब्ल्यूएचओ के मिशन में काम कर चुका है। लिहाज़ा दोनों ने मिलकर अभी जबकि चीन में मामला शुरू ही हुआ था अपने यहाँ हर तरह का जरूरी एहतियात और उसके मुताबिक़ उपाय किए जो कोरोना को रोकने के लिए ज़रूरी थे। और उसी का नतीजा है कि ताइवान में कोरोना से सिर्फ़ सात मौतें हुईं हैं। और पूरा ताइवान इस महामारी की चपेट में आने से बच गया। यह तो रहा हार्वर्ड के पैदाइशी दिमाग़ का नतीजा और एक हमारे हैं हार्डवर्क वाले। जिनके प्रयोगों ने कोरोना को गांव-गांव में फैला दिया। और सब कुछ देखकर अगर कोई इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सत्ता जैसे अपनी जनता को सज़ा देने पर उतारू हो तो कोई अतिशयोक्ति बात नहीं होगी।

और हाँ एक बात कहे बग़ैर यह बात समाप्त नहीं होगी। यह सही बात है कि तात्कालिक तौर पर योगी जी आप जीत गए। आपकी राजनीति भी जीत गयी। लेकिन जनता की यह हार आपके पूरे निज़ाम पर भारी पड़ने जा रही है। इतिहास का यह सबक़ जनता हमेशा याद रखेगी। जो काम अंग्रेज नहीं कर सके जो विभाजन की विभीषिका में भी नहीं हुआ उसको आपने पूरा कर दिखाया। यह बात सही है कि भारत के लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है लेकिन इस दौरान मिलने वाली चोटें जनता की जेहनियत पर स्थायी लकीर बन गयी हैं। जिसमें उनके सड़कों पर पैदल चलने के निशान दर्ज हो चुके हैं। और वह कभी नहीं मिटने वाले। और अगर कहीं वह आपकी तरह संकल्प ले ली तो फिर अगले आने वाले कई दशकों तक आप सत्ता में नहीं होंगे वह महज़ आपके ख़्वाबों में ही रहेगी।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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