Tue. Oct 15th, 2019

…हाँ, कन्हैया गद्दार नहीं हो सकता

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प्रेम कुमार

पहले दिन से कन्हैया के लिए ये मेरा विश्वास था कि वो देशद्रोही नहीं हो सकता।

बात साफ करें तो कन्हैया कभी भारत को टुकड़े करने जैसे नारे नहीं लगा सकता। कन्हैया के लिए मेरे विश्वास की जीत होता देख मुझ जैसे कई लोगों को संतोष हो रहा होगा।

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‘मैं’ या ‘मेरा’ कहने का मतलब एक व्यक्ति कतई नहीं है। दरअसल बात ‘मैं’ या ‘मेरा’ से इसलिए शुरू करनी पड़ी कि जिस नाजुक विषय पर बात करने जा रहा हूं, उस पर सिर्फ अपनी ही गारंटी पर बात आगे बढ़ायी जा सकती है।

विश्वास का ठोस आधार

फेसबुक पर साथियों ने पूछा था आखिर इस विश्वास का आधार क्या है? आधार दो हैं। एक कन्हैया का AISF और CPI से जुड़ा होना। सिर्फ इसलिए नहीं कि ये दोनों ही संगठन आज़ादी की लड़ाई में शरीक रहे थे बल्कि इसलिए भी कि ऐसा करते हुए पहले भी ये दोनों संगठन देशद्रोह का आरोप झेल चुके हैं।

याद कीजिए 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का इतिहास, जिसका इन संगठनों ने यह कहकर विरोध किया था कि इससे द्वितीय विश्वयुद्ध में नाज़ी विरोधी ताकतें कमज़ोर होंगी (तब अंग्रेज़ नाज़ी विरोधी ताकत का हिस्सा थे)। मैं मानता हूँ कि तर्क के स्तर पर इन संगठनों को आज भी अपने अतीत पर शर्म करने की ज़रूरत नहीं है।

हालांकि इसमें संदेह नहीं कि इसका ख़ामियाज़ा इन्हें भुगतना पड़ा। देशभर में राष्ट्रभक्तों की जमात से ये अलग घोषित कर दिए गये। बावजूद इसके ये कम्युनिस्ट न तब देश विरोधी या देशद्रोही थे और न आगे कभी रहे। वैचारिक स्तर पर ये ईमानदारी की ऐसी ऐतिहासिक बारीक लकीर के गिर्द रहे जिस पर बने रहना ही साहस का काम है।

सन् 42 के 33 साल बाद इमरजेंसी के दौरान कांग्रेस के साथ खड़ा होना। यानी सन् 42 से उलट स्थिति। यह फैसला भी सीपीआई ने तत्कालीन सियासी धारा के विपरीत लिया। अलोकप्रिय फैसले का समर्थन करने की कोई मजबूरी नहीं थी, लेकिन फिर भी ये फैसला हुआ क्योंकि तब जयप्रकाश नारायण ने सैनिकों को भी बगावत के लिए उकसाया था। ऐसी परिस्थितियां थीं जिस आधार पर आज भी ये विश्लेषण बनता है कि लोकतंत्र खतरे में था और इस लिहाज से सीपीआई का इमरजेंसी को समर्थन देने का फैसला बिल्कुल सही था।

गलती आगे हुई कि आपातकाल के दौरान जो लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवता की खिल्ली उड़ायी गयी, बड़ी तादाद में लोगों को जेलों में ठूंसा गया, पत्रकारों पर जुल्म हुए, उसका भी समर्थन सीपीआई करती रही।

आरक्षण के मसले पर भी सीपीआई ने अपने मास बेस की कीमत पर वीपी सिंह की सरकार का समर्थन किया और तब भी चुप रही जब आरक्षण विरोधी आंदोलन में नौजवान आत्मदाह कर रहे थे। पहला कदम वैचारिक प्रतिबद्धता और राजनीतिक साहस का प्रतीक है तो आत्मदाह की घटनाओं पर चुप्पी और बाद में लालू के जंगलराज का आंख मूंदकर समर्थन करते रहना उसकी भारी गलती मानी जानी चाहिए। बावजूद इसके सीपीआई को दलित समर्थक,  सवर्ण विरोधी या सवर्ण मानसिकता और दलित विरोधी जैसे इल्ज़ामों में नहीं बांधा जा सकता।

सीपीआई या एआईएसएफ से जुड़े व्यक्ति अलोकप्रिय फैसले तो कर सकते हैं, ऐसा करने का दुस्साहस दिखा सकते हैं लेकिन देशद्रोही या देशविरोधी नहीं हो सकते।

इन घटनाओं का ज़िक्र इसलिए ज़रूरी है कि सीपीआई या एआईएसएफ से जुड़े व्यक्ति अलोकप्रिय फैसले तो कर सकते हैं, ऐसा करने का दुस्साहस दिखा सकते हैं लेकिन देशद्रोही या देशविरोधी नहीं हो सकते।

अफजल गुरु पर खुद सीपीआई में कोई एक राय हो ऐसी बात नहीं, लेकिन पार्टी में इस विषय पर सवाल उठाने की आज़ादी रही है। सवाल इस रूप में नहीं उठते कि अफजल गुरु ने सही किया या वो शहीद है, बल्कि इस रूप में उठते हैं कि सिर्फ अफजल ही क्यों?, जिस मुद्दे को अफजल ने उठाया यानी कश्मीर की आज़ादी का मुद्दा, उस मुद्दे के कारणों पर क्यों न बातचीत की जाए यानी उस मुददे को क्यों नहीं सरकार एड्रेस करे? क्यों फांसी जैसी सज़ा को एक लोकतांत्रिक देश में हम जारी रखे हुए हैं जबकि ये दुनिया के ज्यादातर देशों में ख़त्म हो चुकी है?

ऐसे सवाल उठाने का साहस दूसरे संगठन या दलों में नहीं दिखता। कन्हैया भी ऐसे ही सवाल उठाते रहने वाला छात्र है।

वीडियों में जिस तरह से सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे विद्वान को धिक्कारते हुए कन्हैया दिखते हैं क्योंकि स्वामी ने जेएनयू को जेहादियों का अड्डा कह डाला था, जिस तरह से आतंकवाद पर वो बहस की उन्हें चुनौती देते हैं, वो एक AISF का नेता ही कर सकता है।

इसके बावजूद यह कहना भी ज़रूरी है कि AISF को इससे पहले कन्हैया जैसा नेता नहीं मिला, जिसके लिए अपने दम पर जेएनयू का अध्यक्ष बनना बहुत छोटी उपलब्धि है।

कन्हैया की गिरफ्तारी अनायास नहीं है। जरा सोचिए, देशविरोधी नारे लगाने वालों को पकड़ने की तत्परता सरकार ने नहीं दिखाई लेकिन कन्हैया को जेल में डालने, उन्हें बदनाम करने और जेल में सड़ा देने के इरादे से देशद्रोह का मुकदमा ठोंक देने में सरकार पीछे नहीं रही। दोष सिर्फ पुलिस पर इसलिए नहीं देना चाहिए क्योंकि बाद की घटनाओं ने कन्हैया की गिरफ्तारी को सत्ता की मर्जी के रूप में सामने रखा है।

सीपीआई और एआईएसएफ कन्हैया का ऋण नहीं चुका पाएगी जिसमें इन दोनों संगठनों को पुनर्जीवन देने की क्षमता दिख रही है।

पृष्ठभूमि और जन्मभूमि

कन्हैया देशविरोधी या देशद्रोही नहीं हो सकता। ऐसा मानने के पीछे उसकी पृष्ठभूमि और जन्मभूमि भी बड़ी वजह है।

कम्युनिस्टों का मॉस्को बेगूसराय और बेगूसराय का लेनिनग्राद बीहट से आता है कन्हैया। वो भूमि जो राजनीतिक सोच के मामले में बेमिसाल रही है, जहां कांग्रेस और कम्युनिस्टों के बीच तगड़ा राजनीतिक मुकाबला रहा है।

राजनीतिक रूप से जाग्रत भूमि में आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं। हालांकि अब यहां की राजनीतिक परिस्थिति बदल चुकी है। फिर भी देशप्रेम और देशभक्ति के मामले में इस ज़मीं से कोई उल्टी आवाज़ निकलेगी, ऐसी उम्मीद कोई नहीं कर सकता।

कन्हैया का गांव बीहट राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का भी गांव है और इस गांव का सपूत देशद्रोही नारे लगाएगा, ये मान लेना मुझ जैसों के लिए असंभव रहा।

जिस हालात में कन्हैया का परिवार है, जो गरीबी वह परिवार झेलता रहा है और इन सबसे बेपरवाह जो वैचारिक मजबूती इस परिवार के सदस्यों में है, वो बेमिसाल है।

एक कम्युनिस्ट का परिवार। ऐसे परिवार से कन्हैया की मां आंगनबाड़ी का काम कर सकती है, बीमार पिता लाचार होकर भी अपने बच्चों की तालीम के लिए फिक्रमंद दिख सकते हैं, परिवार के लिए उम्मीदों का चिराग देश के लिए उम्मीद बनकर उभर सकता है, लेकिन ऐसे परिवार से कोई देशद्रोह नहीं बन सकता।

एक बार फिर ये विश्वास का सवाल है जिसे बाद की घटनाएं मजबूत करती रहेंगी।

दिल्ली पुलिस के बदले सुर ने बता दिया है कि कन्हैया के ख़िलाफ़ देशद्रोह साबित करने वाले कोई सबूत उसके पास नहीं हैं। ये बात मान लेनी चाहिए कि कन्हैया का किसी हाफ़िज़ सईद से कोई रिश्ता नहीं रहा होगा। यानी इस देश का गृहमंत्री झूठा हो सकता है लेकिन कन्हैया की देशभक्ति झूठी नहीं हो सकती।

(17 फरवरी 2016 को फेसबुक और ब्लॉग पर लिखा पत्रकार प्रेम कुमार का आलेख जो आज भी बेहद प्रासंगिक है। आपको मालूम है कि अभी 12 अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने कन्हैया समेत 15 छात्रों के खिलाफ जेएनयू की अनुशासनात्मक कार्रवाई को रद्द कर दिया है और छात्रों की दोबारा से सुनवाई के आदेश दिए हैं।)

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