Tue. Aug 20th, 2019

जस्टिस लोया संबंधी खबर को मारने के लिए किस तरह पीएमओ ने बुना जाल,पढ़िए इनसाइड स्टोरी

1 min read
जनचौक ब्यूरो

(जस्टिस लोया की मौत और उसके बाद की परिस्थितियों का एक खास महत्व है। इस संदर्भ में उनके पिता औह बहन द्वारा उठायी गई आशंकाएं हों या फिर उनके बेटे का कबूलने और मुकरने का मसला। सब मिल कर कई नई आशंकाओं को जन्म दे देते हैं। इन्हीं हालात के बीच सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी वायरल हो रही है। जिसमें इससे जुड़े कई पक्षों का जिक्र है। जो अनायास लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। जनचौक इसको ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहा है। हालांकि जनचौक इस टिप्पणी की पुष्टि नहीं करता-संपादक)

जिस दिन कारवां पत्रिका ने सीबीआई की विशेष अदालत के जज बृजगोपाल लोया की रहस्यमय मौत पर खबर छापी थी, उस दिन भाजपा के अंदर स्पष्ट चुप्पी थी। स्टोरी ने स्पीड पकड़ी और सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी। प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने, जो पूरे दिन सोशल मीडिया संदेशों की निगरानी करते हैं, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़ी स्टोरी के सोशल मीडिया में प्रमुखता हासिल करने के बारे में सरकार को बताया। शाम तक, कैबिनेट मंत्री पीयूष गोयल को स्थिति की निगरानी करने और जरूरत के मुताबिक जवाब देने का काम सौंप दिया गया। गोयल का पहला काम यह सुनिश्चित करना था कि मुख्यधारा के मीडिया में से कोई भी कारवां स्टोरी को न चलाने पाए। इस लिहाज से मुख्यधारा के कुछ प्रिंट मीडिया के मालिकान को फोन करके इसका बाकायदा निर्देश दिया गया।

देश दुनिया की अहम खबरें अब सीधे आप के स्मार्टफोन पर Janchowk Android App

अगले दिन कारवां ने स्टोरी के दूसरे भाग में असली प्रमाण के तौर पर जस्टिस लोया के परिवार का वीडियो इंटरव्यू जारी किया। जिससे गोयल काफी परेशान हो गए। इस बीच, कारवां स्टोरी के मराठी, हिंदी, मलयालम और बंगाली क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद दिखने लगे। क्षेत्रीय भाषा में अनुवाद के चलते स्टोरी की पहुंच लाखों-करोड़ों में हो गयी। और उसको देखने वालों की सख्या कई गुना बढ़ गयी। इस बीच, गोयल को एहसास हुआ कि इस मामले में भाजपा की तरफ से काउंटर करने के लिए एक और ठोस प्रयास की जरूरत है। लिहाजा अमित शाह, अरुण जेटली, देवेंद्र फड़नवीस और पीयूष गोयल को मिलाकर 4 सदस्यों की एक टीम गठित की गयी। देवेन्द्र फड़नवीस नागपुर से हैं, वही शहर जहां न्यायाधीश लोया का निधन हुआ था। संबंधित दोनों अस्पतालों – दांडे अस्पताल और मेडिटिरीना- को सतर्क कर दिया गया। मेडिटिरीना हॉस्पिटल महाराष्ट्र के वित्तमंत्री सुधीर मुंगेंतिवार से जुड़ा हुआ है।

ईसीजी रिपोर्ट।

एक ईसीजी रिपोर्ट दांडे अस्पताल से मिली थी। जज लोया के साथ दो न्यायाधीश जो नागपुर गये थे, जस्टिस कुलकर्णी और न्यायमूर्ति मोडक से संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया। दो अन्य जजों ने 1 दिसंबर 2014 की रात को जज लोया के साथ होने का दावा किया था, वो ऑन रिकॉर्ड बात करने के लिए सहमत हो गए। मेडिटिरीना हॉस्पिटल के रिकॉर्ड, इन दोनों न्यायाधीशों के उद्धरणों की प्रतिलिपि, दांडे अस्पताल से ईसीजी रिपोर्ट सभी को एक फाइल के रूप में संकलित कर लिया गया था।

अरुण जेटली का मानना था कि यह दस्तावेज मुख्यधारा की मीडिया को दिया जाना चाहिए, मुख्य रूप से उन लोगों को जिन्हें सरकार के पक्ष में नहीं देखा जाता है। इसलिए चार मीडिया प्रकाशनों को चुना गया जिसमें कुछ तथाकथित ‘वाम उदार’ मीडिया प्रतिष्ठान भी शामिल थे। दस्तावेज इन मीडिया घरानों को दिया गया था। पीयूष गोयल ने व्यक्तिगत रूप से मीडिया हाउसों को फोन किया ताकि वो एक ऐसी स्टोरी प्रकाशित कर सकें जिससे भेजे गयी सामग्री का उपयोग करके कारवां की स्टोरी को बदनाम किया जा सके। एनडीटीवी एक काउंटर स्टोरी प्रकाशित करने वाला पहला चैनल था। यह एनडीटीवी के लिए आसान निर्णय था क्योंकि उसने स्टोरी के कारवां पक्ष पर पहले से ही दो शो प्रसारित किए थे। अगला इंडियन एक्सप्रेस था, जो पहले इसे अपने फ्रंट पेज पर ले जाने से हिचकिचा रहा था। लेकिन दबाव के बाद वो मान गया। और आखिर में स्टोरी पहले पेज पर छपी।

एनडीटीवी और इंडियन एक्सप्रेस की कहानियां समान ईसीजी रिपोर्ट के साथ लगभग समान हैं। 27 नवंबर की सुबह जब इंडियन एक्सप्रेस के सामने वाले पृष्ठ पर यह स्टोरी छपी, तो अरुण जेटली और अमित शाह कोर टीम के अन्य सदस्यों के साथ टेलीफोन पर बात कर रहे थे तभी उन्हें पता चला कि ईसीजी रिपोर्ट में एक गलती हो गयी है। रिपोर्ट में उल्लिखित तारीख गलत थी। ईसीजी रिपोर्ट की तारीख 30 नवंबर 2014 थी, जबकि न्यायाधीश लोया को 1 दिसंबर 2014 को अस्पताल ले जाया गया था। यह निर्णय लिया गया कि अस्पताल इस गलती को छुपाने के लिए ‘तकनीकी गड़बड़ी’ की बात कहकर अपना स्पष्टीकरण जारी करेगा। अमित शाह व्यक्तिगत रूप से उत्सुक थे कि स्टोरी “इसी सप्ताह खत्म हो जाए”। ठीक उसी लाइन पर काम करते हुए दिन में अस्पताल ने दावा किया कि ईसीजी रिपोर्ट में ‘तकनीकी गड़बड़’ थी।

यह टीम जज लोया के परिवार के साथ लगातार संपर्क में थी और उन्हें कारवां पत्रिका को दिए गये अपने पिछले साक्ष्यों से मुकर जाने के लिए राजी कर रही थी। जज के बेटे अनुज लोया पर मामले से पीछे हटने का बड़ा दबाव बनाया जा रहा था। गौरतलब है कि अनुज ने पहले एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने मुख्य न्यायाधीश मोहित शाह द्वारा अमित शाह के पक्ष में मामले को सुलझाने के लिए अपने पिता को 100 करोड़ रुपए की रिश्वत दिए जाने की पेशकश का दावा किया था। इस मामले का हवाला देते हुए परिवार के खिलाफ होने वाले किसी मानहानि के मुकदमे के असर को बताया गया था। और ये भी समझाया गया था कि कैसे उनका पूरा भविष्य दांव पर है। अनुज लोया काफी डर गए थे। और ऐसा माना जा रहा था कि वो जल्द ही मामले से वापसी की बात उठाएंगे।

न्यायाधीश लोया की बहन, अनुराधा बियानी जो खुद डॉक्टर हैं और अपने भाई की मौत पर कारवां के साथ बातचीत में स्पष्ट संदेह जाहिर की थीं, उन पर भी कारवां को दी गयी अपनी टिप्पणी से इनकार करने का दबाव डाला जा रहा है। और इसके लिए उन्हें टीवी पर आने के लिए कहा जा रहा है। ये अगला समाधान होगा जिसको आगे पेश किये जाने की उम्मीद है। बीजेपी की कोर टीम कारवां पत्रिका के मालिकों के साथ भी बातचीत कर रही है ताकि परिवार के सदस्यों द्वारा इनके खारिज होने के बाद स्टोरी को वेबसाइट से हटाया जा सके। इस बीच न्यायमूर्ति मोहित शाह द्वारा कारवां पत्रिका और पत्रकार निरंजन टकले के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करने की आशंका जाहिर की जा रही है।

(मूल पोस्ट अंग्रेजी में थी उसका हिंदी में अनुवाद शैलेंद्र सिंह गौर ने किया है।)

Donate to Janchowk
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people start contributing towards the same. Please consider donating towards this endeavour to fight fake news and misinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

Leave a Reply