Thu. Aug 22nd, 2019

धूम मचा रही है नोटबंदी के खिलाफ बनी “बार-बार फेंको…” पैरोडी

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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। 1962 में बनी फिल्म ‘चाइना टाउन’ के गाने की एक पैरोडी आजकल केंद्र की मोदी सरकार के लिए मुसीबत बन गयी है। मुंबई स्थित ‘दि बैन्ड’ म्यूजिक समूह के कुछ कलाकारों ने उसे नोटबंदी को ध्यान में रखते हुए बनाया है। नोटबंदी की पहली सालगिरह को जब केंद्र सरकार कालेधन के खिलाफ लड़ाई के अभियान की शुरुआत के तौर पर पेश कर रही है। तब ये गाना सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर प्रहार करता हुआ दिख रहा है।

नोटबंदी से त्रस्त लोगों के इसे पसंद करने का ही नतीजा है कि वीडियो बाजार में आने के साथ ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

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पैरोडी के पूरे विचार और उसके निर्माण के बारे में पूछ जाने पर समूह के केंद्रक की भूमिका निभाने वाले मयंक सक्सेना का कहना था कि इस तरह की आइडिया पर विचार बहुत दिनों से चल रहा था लेकिन लागू अब हो सका। उन्होंने कहा कि दुनिया के दूसरे देशों में खासकर पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में बाकायदा सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर काम करने वाले म्यूजिक समूह हैं। और उन्हें वहां मुख्य धारा का दर्जा हासिल है। ये ऐसे म्यूजिक ग्रुप हैं जो लगातार सरकार और उसकी जनविरोधी नीतियों के खिलाफ अपने संगीत और गानों के जरिये आवाज उठाते रहते हैं। इस धारा को ‘प्रोटेस्ट म्यूजिक’ के तौर पर जाना ही जाता है।

यहां तक कि पाकिस्तान में भी इस तरह के म्यूजिक समूहों का वजूद है। ‘लाल बैंड’ वहां का एक लोकप्रिय प्रोटेस्ट म्यूजिक ग्रुप है। बांग्लादेश भी इससे अछूता नहीं है। वहां कई म्यूजिक समूह काम कर रहे हैं। लेकिन विडंबना देखिये हर क्षेत्र में कायमाबी का झंडा बुलंद करने वाले अपने देश में इस तरह का कोई समूह नहीं है। लिहाजा दि बैन्ड की कोशिश है कि अपने जरिये उस कमी को पूरा कर देश में उस धारा की शुरुआत कर सके। 

मयंक का कहना है कि समय के साथ चीजें बदलती हैं। लिहाजा नई पीढ़ी क्या चाहती है और उसका रूप-रंग और जायका क्या होगा जब तक उसको समझा नहीं जाएगा और फिर उसके मुताबिक चीजें नहीं तैयार की जाएंगी। किसी नये निर्माण का कोई मतलब नहीं है। हां इस बात का जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि निर्मित चीजें पापुलर हों लेकिन चीप नहीं।

उन्होंने बताया कि इसके अलावा समूह दो और आइडिया पर काम कर रहा है। जिसको आने वाले दिनों में लोग देख सकेंगे। दूसरे गाने की थीम लोकतंत्र, तानाशाही और उसके बीच फंसे लोगों पर केंद्रित है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि आधार के खिलाफ भी एक गीत तैयार किया जा रहा है। खास बात ये है कि दोनों गाने ओरिजनल होंगे किसी गाने की पैरोडी नहीं।

इस गाने में काम करने वाले कलाकारों के परिचय की जहां तक बात है तो इसके केंद्र में रहने वाले मयंक सक्सेना पत्रकार और लेखक हैं। गिटार बजाने वाले सज्जन का नाम रॉकी डिसूजा है। इसके मुख्य गायक धम्म रक्षित हैं। वो सतारा के रहने वाले हैं और दलित समुदाय से आते हैं। रक्षित सोच और विचार से अंबेडकरवादी हैं और दलित विमर्श से जुड़े गाने लिखते हैं और उन्हें गाते भी हैं। इसमें घुंघराले बाल वाले शख्स सिद्धार्थ हैं वो भी सतारा के ही रहने वाले हैं। अंबेडकरवादी हैं और यलगार म्यूजिक समूह से भी जुड़े रहे हैं।

इस समूह में मिथुन नाम के एक सज्जन हैं जो फुटपाथ पर सब्जी की दुकान चलाते हैं। मूलतः यूपी के जौनपुर के रहने वाले हैं। लेकिन इस बीच उन्होंने कई क्षेत्रों में प्रगति की। म्यूजिक के साथ-साथ इतना अध्ययन किया कि अब उनके लेख छप रहे हैं और साथ ही वो गीत भी लिख रहे हैं।

एक और कलाकार रमणीक सिंह हैं जो कश्मीरी सिख हैं। मूलतः पुंछ के रहने वाले हैं। और अब उनका परिवार जम्मू में रहता है। रमणीक कवि और गायक हैं। समूह के एक दूसरे सदस्य पुनीत शर्मा बालीवुड के लिए गीत लिखते हैं। बरेली की बरफी, इंदु सरकार और रिवाल्वर रानी के लिए उन्होंने गीत लिखे थे।

  • म्यूजिक समूह में कुल 8 सदस्य
  • आधार पर भी तैयार हो रहा है गाना

मयंक ने बताया कि चीजों को पापुलर टर्म में पेश करने की कोशिश है। एसी कमरों से बहस को बाहर लाने की जद्दोजहद है। जो आम आदमी की भाषा में हो। जिसे उसके लिए समझना आसान हो। इस सिलसिले में वो लोकप्रिय गजल गायक अदम गौंडवी के हवाले से कहते हैं कि गजल को अब गांवों और उसकी पगडंडियों की तरफ ले जाने की जरूरत है।

एक चीज को लेकर मयंक बेहद खिन्न दिखे। उन्होंने कहा कि मीडिया के कई संस्थान इसको कांग्रेस प्रायोजित गाना बता रहे हैं। लेकिन सच ये है कि उनका या फिर उनकी टीम का कांग्रेस से कहीं दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है। और सच्चाई ये है कि अगर कल कांग्रेस भी सत्ता में होगी तो उसका भी इसी तरह से विरोध किया जाएगा।

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