Tue. Oct 22nd, 2019

चाय बागानों की “अंधकार भूमि” पर जब पड़ा रासमोहन का प्रकाश

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रवीश कुमार

कलश में पानी भरा था, तांबे का सिक्का था, तुलसी पत्ता तैर रहा था, चारों तरफ आम के पत्ते लगे थे। लोग भी बहुत थे मगर कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कि कलश को हाथ में लेकर शपथ ले सकें। उस भीड़ से एक हट्ठा कट्ठा नौजवान निकलता है। भगवान जगन्नाथ का नाम लेते हुए शपथ लेता है कि मैं यूनियन के प्रति निष्ठावान रहूंगा। इस तरह से भगवान जगन्नाथ का नाम लेकर लेबर यूनियन की शुरुआत होती है।
शपथ लेने वाले उस गबरू जवान का नाम था रासमोहन। उसके इस साहस ने चाय बाग़ानों के भीतर पहली बार आवाज़ को जन्म दिया। उस आवाज़ से बदलने लगी मज़दूरों की दुनिया। सोमनाथ होरे ने रासमोहन की शानदार स्केच बनाई है। सेना का कपड़ा पहनने लगा था रासमोहन। गर्व का भाव रखता था। किसी अंग्रेज़ अफसर और कंपनी मैनेजर के आगे नहीं झुकता था।
उसके पहले चाय बाग़ान के मज़दूरों की दुनिया मैनेजर से शुरू होती थी, मैनेजर पर ख़त्म हो जाती थी। मैनेजर बेटियों को उठा ले जाता था, दुल्हनों को अपने पास रख लेता था। मां और बेटी के बीच दो साड़ियां होती थीं। एक ठीक-ठाक और दूसरी फटी हुई। एक शाम का खाना होता था। शायद माड़ से ज़्यादा नसीब नहीं था।

शोषण और दासता की इन्हीं दास्तानों से गुज़रते हुए सोमनाथ होरे ने इसे अंधकार की भूमि कहा था। मज़दूरी इतनी ही मिलती थी कि शरीर आधा भूखा रहे और भूख का पीछा करते हुए शरीर मैनेजर के लिए काम करता रहे। अंग्रेज़ी मालिक चले गए। भारतीय आ गए। कुछ नहीं बदला।
मज़दूर संघ आवाज़ उठाने लगा। बच्चे खेल-खेल में इंक़लाब ज़िंदाबाद बोलने लगे थे। 1940 का यह दशक था। न इलाज के लिए डाक्टर न दवा। औरतों में अब साहस आने लगा। वे मैनेजर और सुप्रीटेंडेंट के सामने खड़ी होने लगीं। बोलने लगीं। उनकी मज़दूरी बढ़ी। मर्दों की भी बढ़ी।
बहुत जल्दी ख़त्म हो जाने वाली और देर तक ज़हन में ठहर जाने वाली पहली ऐसी किताब मेरे जीवन में आई है। आवाज़ उठाने वालों की हम नाम जानते होंगे, तस्वीर नहीं जानते होंगे।

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सोमनाथ होरे के स्केच से आप इंक़लाब बोलने वाले प्रथम मज़दूरों का हुलिया देख सकते हैं। उनके चेहरे को पढ़ सकते हैं। यह किताब कम्युनिस्ट नज़रिए की नहीं है। दुनिया से दासता ख़त्म हो रही थी मगर चाय बाग़ानों में बची हुई थी। उस ग़ुलामी से मुक्ति की कहानी है। उनकी कहानी जो बिहार, यूपी, चेन्नई से मज़दूरी करने गए थे और हमेशा के लिए ग़ुलाम बन गए थे।
1500 की यह किताब सभी के लिए ख़रीद कर पढ़ने की भले न हो मगर प्रकाशक के यहां जाकर देखने का मौका मत छोड़िएगा। सोमनाथ जुत्शी ने क्या ही बढ़िया लिखा है। सोमनाथ की अंग्रेज़ी की लिखावट से आप काफी कुछ सीख सकते हैं। पानी की तरह निर्मल है उनकी भाषा। लगता है आप कोई अच्छी डाक्यूमेंट्री देख रहे हैं।
सोमनाथ होरे के स्केच से आप आज़ादी के पहले के चाय बाग़ानों के मज़दूरों को देख सकते हैं। उनके कपड़ों और चेहरे को देख सकते हैं। सोमनाथ होरे का जन्म 1921 में हुआ था। चिटगॉन्ग में। इंडियन आर्ट कालेज और दिल्ली पोलिटेकनिक में पढ़ाया था। उसके बाद शांतिनिकेतन के कला भवन में पढ़ाने आए। एम एस यूनिवर्सिटी बड़ौदा में विजिटिंग लेक्चरर थे। बाद के दिनों में शिल्पकार बनने से पहले सोमनाथ होरे स्केच करते थे। भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया था। 2006 में उनकी मौत हो गई।
सोमनाथ होरे को कम्युनिस्ट पार्टी ने चाय बाग़ानों में भेजा था ताकि वे वहां उभर रहे कम्युनिस्ट आंदोलन को अपने रेखाचित्रों के ज़रिए दस्तावेज़ों में बदल सके। कोलकाता के सीगल प्रकाशन ने इसे छापा है। किताब लंबी है, तस्वीरें भव्य हैं। आप कभी कोलकाता जाएं तो भवानीपुर थाने के सामने ही सीगल प्रकाशन है। ऐसे ही घूमने चले जाएं। पढ़ने लिखने का शौक रखते हैं तो मुझे याद करेंगे। मैं किस्मत वाला हूं कि इस तरह की किताब से गुज़रने का मौक़ा मिला है।
(ये लेख रवीश कुमार के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)

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