Monday, October 25, 2021

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अनगिनत कुर्बानियों के बावजूद मुसलमान देने को मजबूर हैं देशभक्ति का प्रमाणपत्र !

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रमाशंकर सिंह

गूगल पर जाइए और हिंदी में टाइप कीजिए-अपने भारत पर कभी आंच न आने देंगे। फिर आपको जो रिजल्ट मिलेंगे, उनमे पहले छह रिजल्ट आपको अक्टूबर 2016 में यूट्यूब पर लोड किए गए एक वीडियो मिलेंगे।यह वीडियो मैं आपसे शेयर कर रहा हूं।मेंहदी से रंगी दाढ़ी वाला एक मुसलमान बुज़ुर्ग बहुत ही रियाजी और मार्मिक स्वर में गाता है-

जान दे देंगे मगर आन न जाने देंगे 

अपने भारत पे कभी आंच न आने देंगे 

ये है बापू की ज़मीं, ये है हमारा गुलशन 

ये भगत सिंह की है धरती, ये है मेरा भी वतन 

(वीडियो देखें : https://www.youtube.com/watch?v=YFhaO531u8M)

यह वीडियो 26 जनवरी की सुबह एक मित्र ने मुझे व्हाट्स एप पर भेजा था। मैंने डाऊनलोड करके देखा और रो पड़ा। इसका एक कारण तो यह था कि  देश का वह राग जो उस बुज़ुर्ग के अन्दर बजता है, और मेरे भी अंदर बजता है। आखिर हम अपने देश से प्यार करते समय मारकाट की ही बात क्यों करते हैं? हम एक कल्पित दुश्मन की खोज में क्यों रहते हैं? दूसरा कि उस बुजुर्ग को यह कहना पड़ रहा है कि ‘ये है मेरा भी वतन।’

कुछ लोग कह रहे हैं कि यह ‘उनका ही वतन’ है। दूसरों का कहना पड़ रहा है कि नहीं भाई, यह मेरा भी वतन है। यह ऐसे नहीं हुआ है। मुस्लिमों से उनकी देशभक्ति का प्रमाण मांगा जा रहा है। उनके अंदर देशभक्त न होने का पछतावा और अपराधबोध बैठाया जा रहा है। वे घबरा गए हैं। वह बुज़ुर्ग इसी घबराहट में उसका प्रमाण देना चाह रहा है कि वह भी देशभक्त है। यह इधर के कुछ वर्षों में यह ज्यादा बढ़ गया है कि लोग अपने रोजमर्रा के जीवन के बीच देशभक्त दिखने की कोशिश करें लेकिन इसके सबसे ज्यादा भुक्तभोगी मुसलमान हैं। और इसके लिए भाजपा को दोषी बताया जा रहा है। यह कुछ वैसा ही है जैसा दुनिया की हर बुराई के लिए अमेरिका को बुरा कहा जाता है।

मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि इसके लिए हर गैर-मुस्लिम जिम्मेदार है। इस देश की राजनीति और सिविल सोसाइटी का मुस्लिमों के प्रति व्यवहार एक धार्मिक समुदाय के सदस्य से आगे नहीं बढ़ पाया है। उनसे नागरिकता और संविधान के धरातल बातचीत की गुंजाइश भी राजनीतिक पार्टियों ने बहुत पहले ही ख़त्म कर दी है। अब गैर मुस्लिम जनता सोसल मीडिया पर या तो उनके प्रति आक्रामक दिखती है या उनपर दयाभाव दिखाती मिल जाती है। यह दोनों बातें गलत हैं।

यह कहानी कोई एक दिन में नहीं पैदा हुई है। यह सब आजादी के ठीक बाद शुरू हो गया था। जवाहरलाल नेहरू के जाने के बाद कांग्रेस और जनता पार्टी की सरकारों ने इस बात की कोशिश नहीं कि मुस्लिम भी उतना ही सहज महसूस करें जितने अन्य धार्मिक समुदाय। रोजी-रोजगार और शिक्षा के मामले में वे पिछड़ते गए. आज वे पूरे देश में दर-दर भटक रहे हैं। उनके पास वह शिक्षा नहीं है जो उन्हें रोजगार दे सके और दूसरी तरफ उनके हर पेशे को तकनीक और आधुनिकता ने नष्ट कर दिया है। 

एक ऐसी कौम जो हुनरमंदों, दस्तकारों, संगीतज्ञों, विद्वानों, दार्शनिकों की कौम रही है, जिसमे वीर अब्दुल हमीद हुए हैं, उसे देशभक्ति का प्रमाण देना पड़ रहा है। मुझे क्षमा करें, मैं भी तो वही लिख रहा हूं कि यह कौम इसलिए देशभक्त है कि इसमें वीर अब्दुल हमीद हुए हैं। अगर देश के लिए वीर अब्दुल हमीद शहीद न हुए होते? तो क्या मुस्लिम देशभक्त न होते?

यह कैसे हो गया है कि जब पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी आती है तो मुस्लिमों को अपने फेसबुक पेज पर ऐसे वीडियो अपलोड करने होते हैं। मैंने सोशल मीडिया पर इस वीडियो की पड़ताल की तो पाया कि कुछ लोगों ने अपनी देशभक्ति को प्रमाणित करने के लिए यह वीडियो अपलोड किया है तो कुछ ने यह कहा कि ‘सब मुस्लिम एक जैसे नहीं होते।’ 

देशभक्ति वास्तव में मिट्टी, पर्वत, नदियां, जानवर, पक्षी, मछली और लोगों के प्रति सम्मान और प्यार का नाम है। जबसे आधुनिक किस्म के देश बने, तब से राष्ट्रवाद का उभार ज्यादा देखने को मिला। हर देश के लोगों ने अपने देश को प्यार करने का सार्वजनिक अवसर सृजित किया है, इसके अलावा आधुनिक शिक्षा और सार्वजानिक ढांचों के द्वारा देश के प्रति प्यार का बीजारोपण किया जाता है। लोग अपने देश को प्यार करने के क्रम में ही तो अपने देश के लोगों प्यार करने लगते हैं लेकिन भारत में हिंदू-मुस्लिम के उसके साझे अतीत के गुणगान के बावज़ूद एक ‘अन्य भाव’ अभी भी बना है। यह वीडियो उसी त्रासदी को बयान करता है।

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