गुजरात में पटेलों, दलितों के बाद अब आदिवासियों की बारी

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अहमदाबाद। समस्त आदिवासी भील एकता संगठन की मानें तो अहमदाबाद शहर में अनुसूचित जनजाति की आबादी 3 लाख से भी ज्यादा है। लेकिन सरकारी आंकड़े के मुताबिक यह संख्या मात्र 50000 के आस-पास है। लम्बे समय से कई आदिवासी संगठन मांग कर रहे हैं कि रक्त संबंध और वंश के आधार पर सरकार अनुसूचित जनजाति को प्रमाण पत्र जारी करे। जबकि गुजरात सरकार अनुसूचित जनजाति को प्रमाण पत्र जारी करने से पहले 1950 से पहले के दस्तावेज़ को मांगती है। मंगलवार को समस्त आदिवासी भील एकता संगठन के अध्यक्ष चेतन डूंडिया के नेतृत्व में आदिवासी संगठनों ने अहमदाबाद के रानिप से कलेक्टर ऑफिस तक पैदल मार्च कर जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा।

आदिवासी संगठनों का कहना है उनके पूर्वज निरक्षर थे। जंगलों से शहर मजदूरी करने आये थे। बहुत से परिवार शादी ब्याह कर परिवार से अलग हो गए। 1947 में देश की आज़ादी के बाद देशव्यापी दंगे हुए। लोग स्थानांतरित भी हुए। ऐसे में 1950 के पहले का दस्तावेज़ दिखाना असंभव है। चेतन के अनुसार वो लोग अहमदाबाद के मूलनिवासी हैं। और अगर उन्हें उनके अधिकार से वंचित रखा गया तो सरकार चुनाव से बड़े आन्दोलन का सामना करने को तैयार रहे।

इतिहास के अनुसार 9वीं-10वीं सदी में आशा भील का आशावल (वर्तमान अहमदाबाद) में शासन था। जिसे आज आशा भील नो टेकरो कहते हैं। केलिको मील से लेकर ढाल नी पोल तक आशावल था। उस समय अहमदाबाद नहीं था बल्कि एक जंगल था जिसमें कुछ क्षेत्रफल तक आशा भील का शासन था। उस समय भील समाज के लोग इन जंगलों में रहते थे। भील अनुसूचित जनजाति में आते हैं। गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में इनकी बड़ी संख्या है। आशा भील का शासन 13वीं सदी तक था। कुछ इतिहासकरों के अनुसार 1074 में कर्णदेव सोलंकी के हाथों आशा भील का पतन हो गया था। उसके के बाद कर्ण ने कर्णावती राज्य की स्थापना की।

सुल्तान अहमद शाह बागियों को बहरे औज़ (भरूच) खदेड़ कर लौट रहे थे तो उनका आशावल में रुकना हुआ। नदी किनारे की यह जगह उन्हें बहुत पसंद आई। लिहाजा उनहोंने इसे अपनी राजधानी बनाने का निर्णय ले लिया। क्योंकि आशावल केंद्र में था जहाँ से सत्ता चलाना आसान था। 26 फरवरी 1411 को चार अहमद (सुल्तान अहमद शाह, अहमद खट्टू गज़न बख्श, काजी अहमद और मालिक अहमद) ने मिलकर अहमदाबाद की स्थापना की। 1572 में अकबर बादशाह ने अहमदाबाद पर क़ब्ज़ा कर इसे मुगलिया सल्तनत का भाग घोषित कर दिया।

मंगलवार को जहां एक तरफ आदिवासी अहमदाबाद कलेक्टर ऑफिस में जमे हुए थे तो दूसरी तरफ सरखेज रेलवे स्टेशन के पास दलित महिलाओं ने जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में पूरे दिन धरना दिया। दलित नेता जिग्नेश मेवानी का कहना है कि गुजरात की भाजपा सरकार सरखेज के लोगों से 15 वर्षों में 42 करोड़ का टैक्स वसूलती है लेकिन दलित, मुस्लिम मोहल्लों के साथ भेदभाव करती है। वहां नल, गटर, सड़क का कार्य नहीं करवाती है। म्युनिसिपल कारपोरेशन हमारी मांगों को नहीं मानती है। लिहाजा दलित महिलाओं ने तय किया है कि वो अपनी-अपनी सोसाइटी में भाजपा माटे धारा 144 का बोर्ड लगा कर चुनाव के समय भाजपा के लोगों को सोसाइटी में घुसने नहीं देंगी। राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के सह संयोजक राकेश महेरिया ने जनचौक को बताया कि उन लोगों ने कारपोरेशन को 4 अक्तूबर तक का समय दिया है यदि पानी सीवर इत्यादि के लिए कार्य नहीं शुरू हुआ तो कारपोरेशन को दलित और मुस्लिम घेर लेंगे।

15 अक्टूबर को गांधी नगर में दलितों का महा सम्मलेन होने जा रहा है जिसमें राज्य के अन्य दलित संगठन भाग लेंगे। बताया जा रहा है कि सम्मलेन में बीजेपी के खिलाफ 2017 विधानसभा चुनाव में वोट न करने का प्रस्ताव पास हो सकता है।

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