Sunday, May 22, 2022

इलाहाबाद: रोजी का आखिरी सहारा भी छिना

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फूलपुर से घंटे भर के सफ़र के बाद बस से इलाहाबाद चुंगी पर उतरा ही था कि बैटरी रिक्शा वाले ‘कचेहरी कचेहरी’ चिल्लाते दिखाई पड़े। मेरा मन सन्न रह गया। ये क्या हो गया। चुंगी से कचहरी की सड़क तो इक्का और तांगे से आबाद रहती है फिर ये बैटरी रिक्शावाला कचेहरी कचेहरी कहकर राहगीरों को क्यों पुकार रहा है। माज़रा क्या है। 10 कदम आगे बढ़ा तो कई इक्के तांगे सवारियों के इंतज़ार में खड़े दिखे। मैंने बारी बारी से उनसे बात की। सबसे पहले मैं मुंह में पान का बीरा दबाये इक्कावान बशीर मियां और राजू (घोड़े का नाम) से मुख़ातिब हुआ। बशीर मियां पान की पीक में घुले शब्दों को गुलगुलाते हुये कहते हैं- बैटरी रिक्शा वालों ने तो जीना हराम कर रखा है। वो लोग एक सवारी बैठाकर भाग जाते हैं और हमें सवारी नहीं मिलती। हम लोग परेशान हैं इक्का घोड़ा लेकर कहां जायें।   

बैटरी रिक्शावालों के विरोध के सवाल पर बशीर मियां कहते हैं- “कचेहरी में प्रदर्शन करने के लिये हम लोगों ने एक राय बनाई है हम विरोध प्रदर्शन करेंगे।” नेता अनुग्रह नारायण ने डीएम से लिखवाकर दिया था कि इस रोड़ पर केवल इक्का तांगा चलेगा गाड़ी नहीं चलेगी लेकिन ये लोग जबरदस्ती बिठाते हैं। दारागंज के दरोगा ने आश्वासन दिया है लेकिन ये लोग मान ही नहीं रहे। कमाई के सवाल पर बशीर मियां लाचारी की पोटली खोल कर धर देते हैं। जिसमें लाचारी के कोटे सिक्के खनखनाते हैं। दिन भर में दो-ढाई सौ रुपये मिल जाता है कभी वो भी नहीं मिलता है। जबकि ढाई सौ तीन सौ रुपये तो रोज़ाना के घोड़ा खा जाता है। कहां से खिलायें।

बशीर मियां

बशीर मियां के इक्के के ठीक पीछे राम प्रसाद जी अपने घोड़े ‘बादल’ का लगाम पकड़े चुंगी पर खड़े हैं। हाल चाल पूछते ही राम प्रसाद कहते हैं हम लोग भूखे मर रहे हैं साहेब। घोड़े को खिलाने तक के पैसा नहीं कमा पा रहे हैं। घोड़ा पाले हैं, तो छोड़ नहीं सकते हैं थोड़ा इधर-उधर से पैसा लाकर किसी तरह पाल रहे हैं। राम प्रसाद तमाम इक्कावानों का दुख व्यक्त करते हुए कहते हैं कि इलाहाबाद में सैंकड़ों रोड़ हैं हम लोगों को केवल एक रोड़ मिला है चुंगी से कचहरी उस पर भी रिक्शा वाले सवारी लेकर जा रहे हमें जीने खाने नहीं दे रहे। हालांकि ये सवाल निहायत ही ग़लत था । फिर भी जब मैंने पूछा कि परिवार में आपके बाद क्या कोई और इक्का तांगा चलायेगा। जैसे मैंने उनके ज़ख़्मों पर हाथ धर दिया हो। राम प्रसाद निराश स्वर में कहने लगे नहीं, नहीं जब आदमी भूखै मरेगा तो क्या करेगा परिवार कहां पालेगा। एक परिवार भूखा मर रहा है तो सब थोड़े ही उसी में घुसेड़ के अपना परिवार मरवायेंगे।

राम प्रसाद आगे बताते हैं कि अभी भी कई लोगों के पास घोड़े हैं लेकिन धंधा नहीं है इसलिये लोग इक्का नहीं चला रहे हैं। गांवों में भी इक्का तांगा सब बंद हो गया। सरकार को चाहिये कि वो सुनिश्चित करे कि जिन सड़कों पर इक्का तांगा चल रहा है वहीं गाड़ियां न चलें। और हो सके तो हर शहर, क़स्बे में एक दो रोड इक्का तांगा के लिये सुरक्षित करे। और चंद कदम पर घोड़े की लगाम थामे इक्के की ड्राइविंग सीट पर बैठे नन्हें अली टूटे दाँतों के पीछे से मुस्कुराते हुये मिले। अली ने बताया कि उनके घोड़े का नाम नोखड़ है। और वो भी बड़े होकर इक्का हांकेंगे।

राम प्रसाद

इन्हीं इक्कों के बीच दो सवारियां बिठाये हुये एक टांगा खड़ा है। जिसे बाऊ (घोड़े का नाम) खींचते हैं। और इनकी लगाम छोटे लाल के हाथों में है। बस और ऑटो के इंजन और हॉर्न के कर्कश और पीड़ादयी आवाज़ों के बीच झबड़ीली मूंछों और पिचके गालों के पीछे से अपनी वेदना व्यक्त करते हैं- “ बाबूजी साढ़े नौ बज गये हैं अभी बोहनी नहीं हुई है। एक चक्कर जाते हैं लौटानी खाली लौटना पड़ता है। घोड़े के खाने भर की कमाई नहीं होती। अधेड़ छोटे लाल आगे बताते हैं कि इस रोड़ का हम लोगों ने पचास साल पहले मुक़दमा जीता है। लेकिन कोई सुनवाई नहीं। रिक्शे वाले जबर्दस्ती चल रहे हैं क्या करें। प्रशासन हमारी सुनिबे नहीं करता।”

इसी तरह मो. रसीद, राजू, रईश, साजिद, चुद्धी, बशीरे, सोनू, पप्पू, बाऊ, अभिलाष, डंगर, लल्लन और बाबाजी सबने बारी बारी से अपनी व्यथा कही। इस संदर्भ में एसओ दारागंज धर्मेंद्र दूबे से जब हमने संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि इस बाबत उन लोगों ने कभी थाने में आकर तो नहीं बताया। अगर उन्हें ऐसी शिक़ायत है तो उन्हें बताना चाहिये था मुझे। मैं उनकी समस्या का समाधान अवश्य करता। लेकिन इस तरह की कोई बात कभी मेरे संज्ञान में नहीं आई।

जब मैंने उन्हें सूचना दी कि इक्का तांगा वाले कचहरी में विरोध प्रदर्शन करने का कार्यक्रम बना रहे हैं तो उन्होंने कहा कि प्रोटेस्ट करें या क़ानूनी कार्रवाई करें वो अलग चीज है लेकिन उन्हें लोकल पुलिस को तो बताना चाहिये ना। कभी भी इस प्रकार की कोई शिक़ायत नहीं आई मेरे सामने अब तक। बैटरी रिक्शा तो पूरे शहर के लिये नासूर है इन्हें हटाया जाता है, भगाया जाता है चालान भी किया जाता है उनका लेकिन। उनसे (तांगा, इक्का वालों से) कह दीजिये आकर हमसे मिल लें थाने में।  

एक ज़माना था कि इक्कों और तागों में नध सरपट दौड़ते घोड़ों के पैरों की टाप संगीत रचती थी। इक्का तांगा वालों पर बनी फिल्म ‘नया दौर’ का गाना- ‘मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार……..’ , फिल्म ‘बार रे बाप’ का गीत ‘पिया पिया पिया मोरा जिया पुकारे हम भी चलेंगे सइंया साथ तुम्हारे……….’, फिल्म हावड़ा ब्रिज का गीत -‘ये क्या कर डाला तूने दिल तेरा हो गया….’ और फिल्म शोले का वा लाजवाब गीत ‘कोई हसीना जब रूठ जाती है तो और भी हसीन हो जाती है…’ में से यदि घोड़ों की पैरों की टाप को निकाल दें तो गाना धराशायी हो जायेगा। कहने का लब्बोलुआब यह कि जीवन में संगीत की मिठास श्रम से घुलता है, मशीनी गाड़ियां न सिर्फ़ लोगों के जीवन में जहर घोलती हैं बल्कि कई नस्लों के अस्तित्व को संकट में डाल लोगों को कुचल डालती हैं।

कभी बाबूगंज बाज़ार से फूलपुर तक कई इक्के चलते थे। इन्हीं में से एक थे जुल्ला। घोड़े वाले इक्कावानों के बीच जुल्ला के इक्के की घोड़ी का अलग जलवा था। हम स्कूल जाते तो उनके इक्के पर ही बैठकर जाया करते थे। लेकिन बीस साल से इस सड़क पर इक्का- तांगा चलना बंद हो गया है। जुल्ला अब बहुत बूढ़े हो चले हैं। बाबूगंज बाज़ार में प्लास्टिक व हवाई चप्पलों का ठेला लगाते हैं। जब कभी मिलते हैं घर के हर सदस्य का नाम लेकर उसका हाल पूछते हैं। इक्का का जिक्र छिड़ते ही जुल्ला कहते हैं ज़िंदग़ी भर इक्कावान बना रहा बुढ़ापे में दुकानदार होना बदा था।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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