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यूपी में मुस्लिमों को एक बार फिर से निशाने पर लेने के पीछे 2022 के विधानसभा चुनाव तो नहीं हैं ?

24 करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में जिस प्रकार से संचालित किया गया है, वह अपनेआप में पुलिसिया राज के साए में इतनी बड़ी आबादी को बनाये रखने का कीर्तिमान है। कोरोनावायरस की दूसरी लहर में यह अपने वीभत्स स्वरुप में देश ही नहीं दुनिया के सामने उजागर हो चुका है।

गुजरात मॉडल को सफलतापूर्वक दोहराने की कवायद यूपी में भी की गई। लेकिन गुजरात में जहाँ बड़ी चतुराई के साथ समाज के एक हिस्से को शासन द्वारा अपने पक्ष में लेकर इस मॉडल को लागू किया जाता रहा है, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्त्व में भाजपा के ही विधायकों, सांसदों और नेताओं को परे कर सीधे-सीधे पुलिस प्रशासन के जरिये हर स्थिति से निपटने की हनक ने जितनी भयावह हालात को जन्म दिया है, उसने गंगा के तट पर पूर्वी उत्तरप्रदेश की मजबूरियों को उघाड़कर रख दिया है।

महामारी जब पूरे देश में बड़ी तेजी से अपने पाँव पसार रही थी, उसने उत्तरप्रदेश के भी सभी बड़े शहरों को अपनी जद में जकड़ना शुरू कर दिया था। लेकिन पंचायत और जिला पंचायत के चुनावों की तैयारियों में जिस प्रकार से यूपी सरकार मुस्तैद नजर आई, उससे उसकी 2022 के विधानसभा चुनावों में जीत के प्रति आश्वस्ति को लेकर एक सेमीफाइनल खेलना ज्यादा जरुरी लगा।

हिंदी गोबर पट्टी में जो दिखता है वह बिकता है की तर्ज पर यह मानकर चला जाता है कि जिस पार्टी की सरकार सत्ता में है, उसे ही अधिकतर जिला पंचायतों में जीत मिलती है। कोरोना की वजह से भी और परिणामों के प्रति आश्वस्त होने के कारण जहाँ विपक्षी दलों ने इन चुनावों में अपनी भागीदारी को सीमित रखा, वहीँ सत्ताधारी दल ने बढ़चढ़कर सारे संसाधनों को झोंक दिया था। लेकिन परिणामों ने सभी चुनावी समीकरणों को बुरी तरह से उलट पुलट दिया है। यह एक गंभीर आघात है भाजपा के लिए।

इन चुनावों की वजह से देश के सभी शहरों और महानगरों से गाँवों में मतदाताओं का आना-जाना लगा रहा, और कोरोना की इस दूसरी लहर का यदि सबसे अधिक प्रभाव गाँवों के दूर-दराज के इलाकों पर किसी राज्य में पड़ा तो वह उत्तर प्रदेश इस बार रहा है। गाँव के गाँव बुखार खांसी और साँस लेने में तकलीफ से जूझते रहे।

जिस दौरान लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी, मेरठ जैसे शहरों में ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में बेड के लिए हाहाकार मचा था, गाँवों में कोरोना पूरी तरह से अपने पाँव पसार चुका था, लेकिन उसकी वेदना को सुनने वाला कोई नहीं था। प्रधानमंत्री स्वास्थ्य बीमा का कार्ड हाथ में लिये ग्रामीणों के लिए निजी अस्पतालों में खुद को बचाने का मौका कहाँ हासिल हो सकना था जब शहरों में एक अदद बिस्तर के लिए भारी मारामारी चल रही थी, लिहाजा वे चुपके से मर गये। इनमें से अधिकांश को तो मरते समय भी पता नहीं चला कि वे किस वजह से मारे जा रहे हैं।

पूर्वी उत्तरप्रदेश से आने वाली विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक बलिया, गाजीपुर के कई जिलों से ग्रामीण यदि स्वास्थ्य केन्द्रों तक पहुंचे भी तो उनमें से कई लोग लाइन में खड़े खड़े मर गए। समाचार पत्रों ने इसकी रिपोर्टिंग उस दौरान इसी तरह से की, मानो उन्हें भी इसका कारण नहीं पता, या उन्हें इसे बताने की जरूरत नहीं थी।

यह तो भला हो दैनिक भास्कर जैसे राष्ट्रीय दैनिक अखबार का, जिसने एक आश्चर्यजनक फैसला लेते हुए गंगा में सैकड़ों की संख्या में प्रवाहित हो रही लाशों का जिक्र किया। इसके बाद तो जैसे बम फूट गया। यूपी सरकार ने बक्सर से लाशों के यूपी में तैरने और फिर बिहार सरकार ने इस उल्टी गंगा को बहाने पर विस्तृत जांच के आदेश दे दिए।

बहरहाल पिछले साढ़े चार वर्षों के उत्तर प्रदेश के योगी राज में “भय बिन होहु न प्रीति” के मंत्रोच्चार के साथ चलाई गई सरकार में योगी की छवि एक ऐसे प्रशासक की बनाई गई जो प्रदेश का मुखिया तो है ही, साथ में धार्मिक लिहाज से भी सभी प्रश्नों से परे एक ऐसी सत्ता है जिसे न कभी पहले चुनौती मिली और न मिल सकती है। लेकिन भारत में बचे खुचे लोकतंत्र में नाममात्र के लिए ही सही मुखिया को हर 5 साल में एक बार औपचारिक मतपत्रों में जीत जरुरी है, और इसके लिए अगले 7 महीनों के भीतर राज्य विधानसभा के चुनाव संपन्न कराया जाना अनिवार्य है।

फिर वह कौन सी जादुई छड़ी हो सकती है, जिससे एक बार फिर से योगी के नेतृत्ववाली भाजपा सरकार को यूपी की जनता सर माथे ले। इसको लेकर हाल ही में 24 मई को दिल्ली में केन्द्रीय स्तर पर दिन भर कवायद चली, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, आरएसएस के सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होस्बोले भी मौजूद थे।

चूँकि देश भर में अभी भी कोरोनावायरस का कहर जारी है, और दिन भर में ऐसी सैकड़ों खबरें वैक्सीन की कमी, वैक्सीन की लाइनों और वैक्सीन को लेकर ग्लोबल टेंडर और उसके दायें बायें चलती और चलाई जाती हैं, कि कई बेहद अहम घटनाओं पर ध्यान नहीं जा पाता।

पिछले कुछ दिनों में यूपी में मुसलमानों के खिलाफ चुन चुन कर निशाना बनाए जाने की घटनाएं कथित तौर पर प्रकाश में आई हैं, जिसपर कोई खास तवज्जों नहीं दी गई है। सिर्फ एक बार ट्विटर पर हैशटैग ट्रेंड करता दिखा था कि यूपी में जीत के लिए मुस्लिमों को निशाना बनाए बगैर क्या भाजपा नहीं जीत सकती?

अगर मई के आंकड़ों पर ही गौर करें तो ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें मुस्लिमों को निशाने पर लिया गया है। न्यूज़क्लिक की एक रिपोर्ट के मुताबिक आजमगढ़ में एक युवा मुस्लिम लड़के को सोशल मीडिया पर फिलिस्तीनी जनता के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करने पर पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।

20 मई को पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में पुलिस ने एक मुस्लिम युवा, यासिर अराफात को फिलिस्तीनी लोगों के समर्थन में एकजुटता जाहिर करने के लिए हवालात में बंद कर दिया था। हालाँकि उसे 48 घंटों के भीतर ही जमानत मिल गई, लेकिन पता चला है कि अराफात इससे गहरे सदमे है, क्योंकि उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि सोशल मीडिया पर पोस्ट करने पर पुलिस द्वारा इतना बर्बर व्यवहार किया जा सकता है।

इतना ही नहीं राज्य की राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी में स्थानीय प्रशासन ने हाई कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए एक सौ साल पुरानी मस्जिद को ढहा दिया। मस्जिद के केयरटेकर के खिलाफ एक केस भी दर्ज कर दिया गया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश कि महामारी के दौरान किसी भी तोड़-फोड़ को अंजाम नहीं दिया जाएगा, को धता बताते हुए स्थानीय प्रशासन ने गरीब नवाज़ मस्जिद को ढहा दिया, जो तहसील वाली मस्जिद के नाम से भी जाना जाता था। इतना ही नहीं बल्कि मस्जिद प्रबंधन कमेटी के कुछ लोगों को कड़ी धाराओं के तहत नामजद तक किया गया है।

विभिन्न खबरों के मुताबिक यूपी पुलिस को ध्वस्त मस्जिद के इर्दगिर्द तैनात किया गया है और किसी को भी इस स्थान के भीतर आने की मनाही है। इस बीच कई मुस्लिम ग्रामीणों को भय सता रहा है कि कहीं पुलिस उन्हें भी झूठे केसों में न फंसा दे।

इसी तरह 19 मई को सिद्धार्थ नगर में कथित तौर पर एक स्थानीय भाजपा विधायक और एसडीएम के इशारे पर भीड़ द्वारा एक मुस्लिम पत्रकार की जमकर पिटाई की गई। अमीन फारूकी नामक इस पत्रकार, जिन्होंने एक स्थानीय हिंदी टीवी न्यूज़ चैनल का पत्रकार होने का दावा किया है, का आरोप है कि ड्यूटी के दौरान एसडीएम और स्थानीय विधायक के इशारे पर उसकी पिटाई की गई थी। उन्होंने दावा किया कि राज्य में कोरोना कर्फ्यू के दौरान एसडीएम की कथित कारगुजारियों और अनियमितताओं की रिपोर्टिंग करने के कारण भीड़ से उसकी पिटाई कराई गई।

21 मई को उन्नाव के एक नाबालिग सब्जी विक्रेता, फैसल हुसैन को लॉकडाउन कर्फ्यू का उल्लंघन करने के आरोप में पुलिस वालों ने इतना मारा कि एक घंटे के भीतर ही पुलिस हिरासत में ही उसकी मौत हो गई थी। इस घटना से गुस्से भीड़ ने लाश को राजमार्ग पर रखकर जाम लगा दिया था, और इस संबंध में अभी तक दो पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार भी कर लिया गया है, जबकि तीसरा आरोपी फरार है। गौरतलब है कि कुल छह लोगों के परिवार में फैसल इकलौता कमाने वाला था। घर में उसकी माँ का रो-रोकर बुरा हाल है, उसे एक ऐसे अपराध के लिए सजा दी गई जिसे सब्जी मंडी में बाकी लोग भी अंजाम दे रहे थे, लेकिन उसका अपराध शायद सिर्फ इतना था कि वह मुसलमान था।

24 मई को मुरादाबाद में एक हिन्दू छुटभैय्या भीड़ ने खुद को गौ रक्षक दल का सदस्य होने का दावा करते हुए एक मीट विक्रेता को दिन-दहाड़े पीट डाला। मनोज ठाकुर, जिसने कथित तौर पर इस हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया था ने अपने बारे में दावा किया कि वह भारतीय गौ रक्षक वाहिनी का उपाध्यक्ष है। लेकिन शायद इतना ही काफी नहीं था। पीड़ित के खिलाफ पुलिस ने भी मामला दर्ज करते हुए उसे ‘जानवर की हत्या करने जैसी शरारतपूर्ण घटना’, ‘एक ऐसा कृत्य जिससे संक्रमण फैलने की आशंका है’ और ‘कोविड-19 लॉकडाउन दिशानिर्देशों का उल्लंघन’ जैसी धाराओं में केस दर्ज कर दिया है।

ये सारी घटनाएं इस बात का इशारा करती हैं कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने पुलिस और प्रशासन को खुली छूट दे रखी है और साथ ही हिंदुत्ववादियों को अल्पसंख्यक समुदाय को अपने निशाने पर लेने के लिए छुट्टा छोड़ रखा है। कई विपक्षी दलों ने इन हमलों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ही नहीं बल्कि दलितों के खिलाफ “सुनियोजित” प्रयास बताया है।

प्रदेश के बुद्दिजीवी और सामाजिक कार्यकर्त्ता इसे पिछले वर्षों और विशेषतौर पर हाल के दिनों में कोरोना महामारी से उपजे आम जनसमुदाय में गुस्से से ध्यान भटकाने की मुहिम करार दे रहे हैं। लगातार चार वर्षों तक अयोध्या में लाखों दीपों को दीपावली में प्रज्वलित करने और राम मंदिर के निर्माण में बढ़चढ़कर हिस्सा लेने के अलावा योगी सरकार के पास उपलब्धियों के नाम पर यूपी की जनता के पास जाने के लिए क्या बचा है?

हर गाँव में लोग शोकाकुल हैं, कई घरों में माँ या पिता का साया बच्चों के सर पर नहीं रहा। कुछ जगहों पर तो दोनों माता-पिता ही नहीं रहे। प्रदेश में ऐसे सैकड़ों जिले हैं जहाँ 4, 6, 10, 20 और यहाँ तक कि 50-50 मौतें तक हुई हैं। विशेषकर पूर्वांचल के इलाकों में तो मौत का मातम पसरा हुआ है। 1600 से अधिक की संख्या में तो शिक्षकों, शिक्षा मित्रों और सहायकों की मौत हो चुकी है, जिन्हें जबरन ग्राम पंचायत और जिला पंचायत चुनावों की ड्यूटी पर तैनात किया गया।

ये सभी कारक और हाल ही में पंचायत चुनावों में करारी हार और पश्चिमी यूपी में किसानों के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ मजबूत गुस्से के कारण शायद ही कोई ऐसी वजह बची हो, जिसके नाम पर वोट की भीख मांगी जा सके। इसके लिए एकमात्र उपाय ले-देकर भव्य राम मंदिर के निर्माण और मुस्लिमों के खिलाफ नए सिरे से दमन के जरिये ही बचा है। इसमें कहीं न कहीं गुजरात मॉडल से प्रेरणा भी छिपी है, जिसे हिन्दुत्ववादी बड़े गर्व से कहते हैं कि भले ही गुजरात में कुछ ख़ास न हुआ हो, लेकिन वहां के मुसलमान अब टाइट हैं।

क्या हजारों प्रियजनों की असमय मृत्यु, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में पलक झपकते ही गाँवों में मौतों के अंबार और भय, भूख और दमन की स्मृतियों को एकमात्र मुसलमानों के भय और घृणा के बैरोमीटर को उठाकर यूपी का चुनाव जीता जा सकता है? यह जल्द ही समय बतायेगा।

(रविंद्र सिंह पटवाल अनुवादक, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on May 29, 2021 3:37 pm

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